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“जाति के कारण मेरे गाँव के एक बुज़ुर्ग को कुर्ता उतरवाकर ट्रैक्टर साफ कराया गया”

ट्रैक्टर

ट्रैक्टर

मैंने जिस गाँव में जन्म लिया है, उस गाँव के लोगों के वीरता के किस्से दूसरों के मुंह से सुनकर बड़ी खुशी महसूस होती थी। उस गाँव का एक सच ऐसा भी था, जिससे हम बचपन में अनजान थे मगर जैसे-जैसे हम बड़े हुए, सारी चीज़ें सामने आने लगीं।

राजपूत बाहुल्य गाँव था और गाँव के राजपूतों की अमीरी व बहादुरी के किस्से मशहूर थे। उसी गाँव में एक तबका ऐसा भी था, जिनका दमन व शोषण पुराने समय से होता आया था। उनके दमन और शोषण के किस्से सुनकर हमें लगता था कि वाकई में कोई किसी के साथ ऐसा कैसे कर सकता है?

ट्रैक्टर साफ करवाकर ज़बरदस्ती गंदा कुर्ता पहनाया

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

मोहल्ले में एक बुज़ुर्ग थे, जो रिश्ते में हमारे परदादा लगते थे। ऐसा ही एक किस्सा उन्होंने बताया कि बचपन में उनके पिता नया कुर्ता पहनकर एक शादी में जा रहे थे। जब उनके पिता वह नया कुर्ता पहनकर अपने ही गाँव से गुज़र रहे थे, तभी सामने से एक राजपूत व्यक्ति ट्रैक्टर लेकर आ रहा था।

उन्होंने आगे कहा, “मेरे पिताजी को नए कपड़ों में आता देख वह व्यक्ति आग-बबूला हो उठा और जातिसूचक गालियां देते हुए कहने लगा कि चमारों के दिन आ रहे हैं, उतार यह कुर्ता और ट्रैक्टर साफ कर इससे।

उन्होंने उस व्यक्ति का बिना कोई विरोध किए अपने नए कुर्ते से उसका ट्रैक्टर साफ किया और उस व्यक्ति के कहे अनुसार उसी गंदे कुर्ते को पहनकर आगे बढ़ गए।

हालात अब भी बदले नहीं हैं

हम जब उनकी इस बात को सुनते थे, तो कहते थे कि ये सब पुरानी बातें है। उस ज़माने में लोग पढ़े-लिखे नहीं थे इसलिए ऐसी बातें किया करते थे मगर अब समय बदल गया है, अब ऐसा नहीं है।

मगर ऐसा नहीं था। मेरी सोच गलत थी। उन लोगो की हरकत अभी भी नहीं बदली थी। सन् 2008 की बात है, गाँव मे प्रधानी के चुनाव थे और सीट अनुसूचित जाति में आई थी, जिसके हिसाब से प्रधान पद का उम्मीदवार सिर्फ अनुसूचित जाति का व्यक्ति ही हो सकता था।

इस वजह से प्रधान पद के एक उम्मीदवार व्यक्ति जिनकी उम्र लगभग 70 साल थी, अनुसूचित वर्ग की भंगी जाति से थे। उनका घर गाँव के बिल्कुल शुरू में था, जहां से पूरे गाँव का निकलना होता था।

एक रोज़ चुनाव प्रचार के लिए अपने समर्थकों के साथ वह गाँव में घूम रहे थे। गाँव के बीच मे एक मेडिकल स्टोर था, जहां हर समय गाँव के चार 4-6 लोग मौजूद रहते थे। उस दिन भी इत्तेफाक से लोग वहां बैठकर चाय पी रहे थे।

उसी समय प्रधान पद के उम्मीदवार वहां पहुंचे। स्टोर पर मौजूद लोगों से भेंट हुई और स्टोर मालिक चाय का एक कप देते हुए उन्हें भी पास बिठाकर बातें करने लगे। यहां तक तो सब ठीक था मगर इस बीच प्रधान पद उम्मीदवार भूल गए कि वह अनुसूचित जाति से हैं और सामने बैठे सारे लोग ठाकुर हैं।

उन्होंने अपना कप उन सभी लोगों के कपों के साथ ट्रे में रख दिया। यह देख स्टोर मालिक भड़क उठा और बोला,

इतने बड़े कब से हो गए तुम? प्रधानी के लिए खड़े हो तो अपनी औकात भूल जाओगे क्या?

प्रधान पद के उम्मीदवार को यह सुनकर काफी दुख हुआ। उनके पास कोई जवाब नही था और वह हाथ जोड़े हुए चुपचाप वहां से उठ गए। इस तरह की ना जाने कितनी ही घटनाएं हैं, जिन्हें मैंने अपने गाँव मे देखा, सुना और महसूस किया है।

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