“RSS के शिशु मंदिर में हमें गाँधी की विचारधारा कभी नहीं पढ़ाई जाती थी”

मैंने 12 साल तक शिशु मंदिर में पढ़ाई की है। बचपन में शाखाओं में भी भाग लिया है, कुष्ठ रोग के टिकट भी बांटे हैं, प्राकृतिक आपदा आने पर सड़कों पर चंदा मांगने भी गया हूं। एक लेखक होने के नाते मैं कह सकता हूं कि मैंने शिशु मंदिर को काफी करीब से देखा है।

मैं जिस शिशु मंदिर में पढ़ता था, उससे बेहद करीब एक मस्जिद थी, जिससे जुड़ा रास्ता स्कूल से भागने का शॉर्टकट हुआ करता था।

स्कूल से वैसे तो हम लोग भागते नहीं थे लेकिन पास की स्टेशनरी से कई बार कुछ सामान लाना पड़ता था, क्योंकि अगर आपके पास हर सब्जेक्ट के लिए अलग कॉपी और किताब ना हो या आप पेंसिल, रबर या कटर भूल गए हों तो करारी मार पड़ती थी।

शिशु मंदिर में शिक्षकों का हाल

विद्यालय
प्रतिकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

शिशु मंदिर में जो शिक्षक थे, वे बड़े मेहनती थे। उनमें से कुछ को आज भी शायद लगता होगा कि उन्होंने अपना जीवन देश सेवा और राष्ट्र निर्माण में अर्पित कर दिया है लेकिन सच यह है कि उनकी तनख्वाह बहुत ही कम थी। 

उनमें से कई साइड इनकम के लिए बीड़ी बनाया करते थे (बीड़ी और देशी शराब उद्योग हमारे छोटे से शहर के सबसे बड़े उद्योग हैं) और अतिरिक्त कमाई के लिए ट्यूशन भी किया करते थे।

मैं इसे सबसे अच्छे प्रकार की ऊपरी कमाई कहूंगा लेकिन पता नहीं कब यह एक पैटर्न बन गया। अगर किसी को प्रैक्टिकल में ज़्यादा नंबर चाहिए, तो उसे इनडायरेक्टली ट्यूशन आने के लिए मजबूर किया जाने लगा।

सवाल पूछने पर पड़ती थी डांट

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

संविदा शिक्षक की भर्तियां आने लगी थीं और जो उसका एग्ज़ाम निकाल लेते थे, वे उस राह चले जाया करते थे। इसमें सुरक्षा ज़्यादा और काम कम होता था। घरवाले कितने खुश होते हैं ना जब नौकरी में काम कम हो और पैसा ज़्यादा मिले? इसके साथ नौकरी से निकाले जाने का डर भी ना हो। शायद मध्य प्रदेश बोर्ड की शिक्षा पद्धति इसी पर आधारित है।

इसमें सिलेबस को जान-बूझकर आसान बनाया जाता है, ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा बच्चों को पास दिखाया जा सके। युग बोध और शिवलाल की गाइडों से हमें पढ़ाया गया था। जो प्रश्न परीक्षा में आने वाले हैं, उसके नोट्स बनाकर दे दिए जाते थे कि बस यही पढ़ना है। 

एक-दो बार हमें डांट भी पड़ी है कि जो चीज़ एग्ज़ाम में नहीं आने वाली है, उसे पढ़ने या उसके बारे में सवाल पूछने की तुम्हारी हिमाकत कैसे हुई? वैसे परीक्षा का समय आने पर हमारे शिक्षक सुबह 4 बजे ही घर पर पधारकर जांचते थे कि हम वाकई जागे हुए हैं या नहीं?

हम में से ज़्यादातर उनके आने के वक्त जाग जाया करते थे और उनके जाने के बाद खर्राटे मारा करते थे। वैसे मुझे लगता नहीं है कि उन मेहनती शिक्षकों को यह अतिरिक्त काम करने के लिए ओवर टाइम मिला करता होगा।

भोजन से पहले पढ़ा जाता था मंत्र

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया
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ज़्यादातर शिक्षकों को या तो पान खाने की आदत थी या फिर जर्दा तम्बाकू। इसी तरह एक तम्बाकू रगड़ने वाले शिक्षक, जो हमें भूगोल पढ़ाया करते थे, उनके बारे में हमें बाद में पता चला कि वह स्कूल के रसोईया भी थे।

स्कूल के एक फंक्शन में उनकी इस पाक कला का हमें अंदाज़ा हुआ, वरना हम तो उनके भूगोल से बचते ही रहते थे मगर भूगोल उस दिन पहली बार स्वादिष्ट लगा था।

हमारे टीचर्स को जगमगाता हुआ सफेद धोती कुर्ता पहनकर स्कूल आना पड़ता था ताकि वे बच्चों को साफ व स्वच्छ कपड़े ना पहनने पर डांट और मार सकें। नाखून कटे हों और सभी बच्चे टिफिन लेकर आए हैं या नहीं, इस पर भी खास ध्यान दिया जाता था।

सब एक कतार में बैठकर पहले भोजन मंत्र पढ़ते थे फिर मिल बांटकर खाते थे। हमारे कई सारे शिक्षक अधिक समय ना मिल पाने के कारण टिफिन नहीं ला पाते थे। इसलिए कई बार वे बच्चों की टिफिन चेक करने के बहाने उसमें से एक-दो पूड़ी ले जाया करते थे।

धूमधाम से मनाई जाती थी जयंतियां

शिशु मंदिर में जयंतियां काफी धूमधाम से मनाई जाती थीं। हमें उस दिन ज़्यादा मज़ा आता था, क्योंकि पढ़ाई नहीं होती थी। एक बार मैंने शिवाजी जयंती पर मराठी में भाषण दिया था जबकि मुझे मराठी का ‘म’ भी नहीं आता था।

क्या अर्थ का अनर्थ हुआ होगा आप अंदाज़ा लगा सकते हैं? मैंने शिवाजी के गोरिल्ला युद्धों के बारे में पढ़ा था, जिसमें पता चला था कि वह बहुत महान थे लेकिन यह मुझे आज तक समझ नहीं आया कि किसी भी प्रकार की महानता का पैमाना क्या हो?

अगर बड़ा साम्राज्य महानता का पैमाना है, तो सबसे महान ब्रिटिश साम्राज्य कहलाएगा। अगर एक व्यक्ति की बात करें तो इतिहास के हिसाब से चंगेज़ खान ने सबसे बड़े क्षेत्र में कब्ज़ा किया था।

चापलूसी में चाटुकारिता के गीत

रानी लक्ष्मीबाई ने कोई जंग नहीं जीती थी लेकिन बहुत बहादुरी से लड़ने वाली प्रथम भारतीय महिलाओं में से एक थीं। इसलिए वह भी महान कहलाईं।

या फिर यूं कहा जाए कि जिस जगह जितने अच्छे कहानीकार पैदा हुए, उन्होंने अपने-अपने क्षेत्र के राजा की चाटुकारिता करते हुए चापलूसी के गीत लिखे और उनके समय के राजा-रानी को उन्होंने महानतम बना दिया।

संघ पहले बैन था, यह बात हमें नहीं पढ़ाई गई

एक और खास बात यह थी कि मेरे शिशु मंदिर में शायद 4-5 मुस्लिम ही पढ़ा करते थे। सरदार और ईसाई एक भी नहीं थे। मुझे उस समय बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह अनुपात एक बहुत घिनौनी प्रकिया के तहत था।

हम में से किसी को नहीं बताया गया था कि राष्ट्रीय स्वयं संघ को आज़ादी के समय अपनी घिनौनी विचारधारा के लिए बैन किया गया था। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि अगर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठन ना होते, तो हो सकता था कि बंटवारा भी नहीं हुआ होता।

शिशु मंदिर
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

ऐसे संगठनों के कारण ही जिन्ना (जो कि खुद भले ही कट्टर मुस्लिम नहीं थे) को एक करके पाकिस्तान की आवाज़ बुलंद करने का मौका मिला। अगर यह बात शिशु मंदिरों में पढ़ाई जाती कि संघ पहले बैन था, तो शायद वे भारत में जिस तरह फैले हुए हैं, वैसे नहीं फैल पाते।

ऐसा इसलिए, क्योंकि हमारा समाज एक बार कलंक लगने के बाद किसी चीज़ को स्वीकार नहीं करता है। खैर, सचोने वाली बात यह है कि क्या बैन हटने के बाद संघ की विचारधारा में कुछ बदलाव आया?

यह नहीं बताया गया कि गाँधी के हत्यारे स्वयं सेवक के ही उपज थे

गाँधी
महात्मगा गाँधी। फोटो साभार- Getty Images

शिशु मंदिर में गाँधी की आत्मकथा कभी नहीं पढ़ाई गई, बल्कि एक अलग से किताब पढ़ाई गई जिसका नाम सहायक वाचन था। यह कभी नहीं बताया गया कि गाँधी के हत्यारे इसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ही उपज थे।

आज जब बीजेपी सत्ता में है, तो गोडसे की जयंती मनाने जैसी बातें सामने आ रही हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे मुस्लिम आतंकवादी उनके आतंकवादी संगठनों के लिए हीरो हैं।

सावरकर की जयंती हमारे स्कूल में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी। सावरकर एक लेखक थे और उन्होंने 1857 की क्रांति पर किताब लिखी थी लेकिन वह किताब कभी स्कूल में पढ़ाई नहीं गई।

मैं एक बार अपने ओबीसी मित्र के घर गया था। उसके घर पर सिर्फ भीम साहित्य थी। जबकि अपने घर में मैंने वे किताबें कभी देखी भी नहीं थी। मेरे घर की ज़्यादातर किताबें धार्मिक थीं। जैसे- कादम्बिनी, विज्ञान प्रगति, मुल्ला नसरुद्दीन के किस्से, जय प्रकाश चोकसे के “गोया कि” वाले आर्टिकल्स और चम्पक आदि।

अटल जी के गुज़रने से पहले जब मैं आरएसएस के कुछ लोगों से मिला

अटल विहारी वाजपेई
अटल विहारी वाजपेई। फोटो साभार- सोशल मीडिया

अटल जी के गुज़रने से पहले मैं कुछ आरएसएस के लोगों से मिला था। चूंकि मैं ब्राह्मण हूं और शिशु मंदिर से हूं इसलिए वे कुछ ज़्यादा ही खुलकर अपने इरादे मेरे सामने रख रहे थे। वे मेरी लेखनी की कीमत लगाकर उसका दुरुपयोग करना चाह रहे थे।  

अटल जी का हमेशा से बहुत सम्मान रहा है मगर उनका कवि हृदय आरएसएस के इतने करीब होने के बावजूद भी उन्हें कट्टर होने से बचाता रहा है, वरना बहुत ही कम लोगों के लिए इससे बचना संभव रहा होगा।

मैं शिशु मंदिर में ही क्यों पढ़ा?

अब सवाल यह है कि मेरे माता-पिता ने मुझे शिशु मंदिर में ही क्यों भर्ती किया? इसके पीछे कोई लंबा गणित नहीं था। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण था कि स्कूल घर से बहुत नज़दीक था। दूसरा, मेरे बड़े भाई भी उसी स्कूल में थे और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण था कि इसी शिशु मंदिर से उस समय सबसे ज़्यादा बच्चे मेरिट में आते थे। 

हालांकि हमारे माता-पिता का यह सपना हम दोनों भाई कभी पूरा नहीं कर पाए मगर हां, इतनी संतुष्टि ज़रूर है कि हमें होशियार बच्चों में गिना जाता था। इंग्लिश मीडियम स्कूल में हमें इसलिए नहीं भेजा गया था, क्योंकि वे हमारे घर से दूर थे। फीस उनकी ज़्यादा थी और दिमाग के एक कोने में माता-पिता को धर्मांतरण का डर भी था।

लड़के-लड़कियों को हमारे स्कूल में अलग कर दिया गया

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

2003 तक स्कूल को-एड था। लड़के-लड़कियां या फिर शिशु मंदिर की भाषा में कहूं तो सारे भाई-बहन साथ में पढ़ते थे। 2003 में बंटवारा हुआ और लड़कों को मोतीनगर से पगारा भेज दिया गया। उस समय मोतीनगर से पगारा की दूरी काफी अधिक थी।

यह दूरी सिर्फ स्कूलों के बीच नहीं, बल्कि जाने कितने दिलों के बीच हो गई थी। पगारा भारत के सबसे बड़े शिशु मंदिरों से एक है। इसकी वैसी हवा नहीं बन पाई, जैसी मोतीनगर की थी। चूंकि वहां आसपास लड़कियां नहीं थीं, इसलिए लड़कों और शिक्षकों की भाषा कुछ ज़्यादा ही खराब हो गई थी। 

जब बड़ा हुआ तो पता चला कि यह बंटवारा भी एक सोची समझी साज़िश के तहत होती रही है। आरएसएस में तो लड़कियों का आना प्रतिबंधित है और उसके लिए तो उन्होंने अलग से राष्ट्र सेविका समिति बना रखी थी। जिसकी वेशभूषा में काफी अंतर है। दो अपोज़िट सेक्स बिना किसी बंधन के समाज में एक साथ रह सकते हैं, यह आरएसएस की सोच के खिलाफ है।

शिशु मंदिर में खेल का अस्तित्व

एक खास बात आपने देखी होगी कि किसी भी शिशु मंदिर से कभी कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी नहीं निकला है। इसका कारण बड़ा ही सामान्य है, क्योंकि शिशु मंदिर की कोई अपनी क्रिकेट, फुटबॉल या हॉकी की टीम नहीं होती थी।

टीम गेम के नाम पर सिर्फ कबड्डी, खो-खो या थोड़ा बहुत हैंडबॉल था। ऊंची और लंबी कूद के लिए सुविधाएं उपलब्ध नहीं थे।

स्कूलिंग और देशभक्ति का रस

स्कूलिंग में देशभक्ति का रस भी सोच समझकर मिलाया जाता है। देश प्रेम में संस्कृति का तड़का भी लगा दिया जाता है ताकि आप किसी भी संस्कृति के बारे में ना तो पढ़ें, ना जाने और ना समझे। 

दूसरी संस्कृतियों को अछूत बना दिया जाता है। अगर कोई गलती से दूसरी संस्कृतियों के संपर्क में आ जाता है, तो उसे पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित बताकर बायकॉट किया जाने लगता है।

मेरे स्कूल से मेरी बहुत यादें जुड़ी हैं। मैं उन्हें स्कूल से अलग करके नहीं देख सकता। मुझे मेरे स्कूल से कोई शिकायत भी नहीं है। ज़रा सा भी नफरत की भावना नहीं है। शिशु मंदिर में 6 पीरियड्स के बाद सातवां पीरियड सदाचार का होता था। मैंने सदाचार वाला विषय थोड़ा ज़्यादा अच्छे से पढ़ा है, जो वे शायद नहीं चाहते थे।

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