“अपने सपने के भारत में मैं महिलाओं के जीवन से इन कड़वी कहानियों को खत्म करना चाहती हूं”

मेरी एक दोस्त को जन्म के बाद कूड़ेदान में फेंक दिया गया था, वजह थी उसका लड़की होना। उसका परिवार लड़की से जुड़ी तमाम सामाजिक परेशानियों को अपने घर की चाहरदिवारी के अंदर नहीं लाना चाहता था।

समाज के दबाव की वजह से मेरी मॉं मुझे अबॉर्ट नहीं करवा पाई। समाज को मेरी चिंता नहीं थी, बल्कि उन्हें मेरी जगह एक बेटे की उम्मीद थी। समाज ने वजह दी कि दो बेटियों के माता-पिता के बुढ़ापे के सहारे के लिए एक बेटा चाहिए।

यह दो घटना आज से 27-28 साल पहले की है। अब आपको आज की बात बताती हूं। एक दोस्त के रिश्तेदार के घर बेटी का जन्म हुआ लेकिन उनके परिवार में खुशी उस कदर नहीं दिखी, जो एक बेटे के जन्म पर दिख सकती थी। उन्हें शायद मलाल है कि उनके घर बेटे ने जन्म नहीं लिया।

एक दोस्त जो समाज में खुद लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, उन्होंने अपनी प्रेग्नेंसी के समय मुझे बातों-बातों में कहा था कि सच बताऊं तो एक बार को मैं चाहती हूं कि मुझे बेटा ही हो। वजह, समाज में लड़कियों को लेकर असुरक्षा, यौन शोषण जैसी घटनाएं। उनका कहना था कि इन घटनाओं से अपनी बच्चियों को बचाना माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती होती है, बेटी होने पर मुझे भी हर दिन इस डर से गुज़रना पड़ेगा।

फोटो प्रतीकात्मक है।

अब आप सोचेंगे कि मैं ये कहानियां क्यों बता रही हूं। दरअसल, गणतंत्र दिवस पर बात करते हुए किसी ने मुझसे पूछा था, “इस गणतंत्र दिवस मैं अपना भारत कैसा देखना चाहती हूं”।

इस सवाल के साथ ही मेरे ज़हन में ये कहानियां आईं, ये कहानियां इसलिए क्योंकि मैं एक ऐसा भारत चाहती हूं, जहां इन कहानियों का कोई अस्तिव ही ना हो।

यह किसी एक परिवार से जुड़ी कहानी नहीं है

एक बार को ये कहानियां पारिवारिक लगेंगी, एक खास परिवार से जुड़ी हुईं लेकिन इन कहानियों को क्या कुछ परिवार तक सीमित करके देखा जा सकता है, जवाब है नहीं। यह हमारे भारतीय समाज की सच्चाई है, एक लड़की और एक महिला की सच्चाई है।

ऊपर की दो घटनाएं आज से 27-28 साल पहले की हैं और बाकि की घटनाएं आज के समय की। इतने साल बदले मगर महिलाओं की स्थितियों में कोई बदलाव नहीं आया। इन सालों में कई नए कानून आएं, योजनाएं बनीं, कई आंदोलन हुए मगर वास्तविक स्थिति अभी भी वही है।

पुरुषवादी मानसिकता से ग्रसित परिवार में बेटियों के जन्म पर शोक या मातम तो पच भी जाता है लेकिन जब एक प्रगतिशील परिवार, लैंगिक समानता की बात करने वाला परिवार भी बेटी के जन्म से डरे तो चिंता गंभीर हो जाती है।

इन परिस्थितियों के लिए क्या सरकार ज़िम्मेदार है?

लेकिन इन सबके पीछे ज़िम्मेदार किसे ठहराया जाए? क्या इन सबमें हमारी सरकार की भी कोई भूमिका है? जवाब है हां। सरकार महिलाओं की इन परिस्थितियों के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार है।

इस बात को समझने के लिए मैं यहां आंकड़ों की बात नहीं करूंगी, किसी रिपोर्ट की बात नहीं करूंगी, मैं बात करूंगी अपने अनुभवों की, अपने से जुड़ी कुछ घटनाओं की।

सेक्शुअल हरासमेंट की शिकायत पर पुलिस से नहीं मिला सपोर्ट

अपने साथ हुए सेक्शुअल हरासमेंट की घटना के बाद मैंने पुलिस में शिकायत करने की कोशिश की। उस वक्त मुझे सीधे पुलिस स्टेशन जाने की हिम्मत नहीं हुई थी, इसलिए मैंने वुमेन सेल को कॉल करना बेहतर समझा। फोन पर बात कर रही महिला अफसर ने मुझसे इतने सवाल किए कि मुझे अफसोस होने लगा कि आखिर मैंने इन्हें कॉल ही क्यों किया।

वह मुझसे बार-बार कहती रहीं कि आप जिस इलाके की बात कर रही हैं, उस इलाके में ऐसी कोई घटना हो ही नहीं सकती है। पहले से ही मानसिक रूप से परेशान होते हुए मुझे पुलिस का ऐसा रवैया और परेशान करने लगा, अंतत: मैंने शिकायत का फैसला वापस ले लिया। तब से आज तक मुझे इस बात का पूरा यकिन रहता है कि किसी भी तरह की घटना होने पर मुझे पुलिस की कोई मदद आसानी से नहीं मिलने वाली है।

इस सच्चाई से सिर्फ मैं ही नहीं समाज का हर तबका परिचित है, शायद इसलिए वह डरता है, एक बेटी के जन्म से।

महिला होते हुए सड़कों पर मैंने कई घटनाओं का सामना किया है

इन दिनों जामिया काफी चर्चाओं में है और मैं खुश हूं कि जामिया कैंपस आज राजनीतिक रंग में रंगा हुआ है, क्योंकि मैंने जामिया में गुज़ारे अपने तीन सालों में राजनीति को कैंपस से बिलकुल गायब देखा है।

एक महिला होते हुए कैंपस से राजनीति के गायब होने से मुझे काफी नुकसान भी सहना पड़ा है, खासकर तब ज़्यादा दुख होता था जब JNU जैसी यूनिवर्सिटी में पूरी रात लड़कियों को बेफिक्र होते हुए घूमते देखती थी और हमें रात के 8 बजे हॉस्टल में कैद कर दिया जाता था।

वजह, हमारा लड़की होना, हमें कुछ हो गया तो हमारी ज़िम्मेदारी कौन लेगा। उन तीन सालों में मैंने 8 बजे के बाद दिल्ली को नहीं देखा।

फोटो प्रतीकात्मक है।

इतनी सख्ती के बाद भी सुरक्षा के मामले में मैं जामिया को फिसड्डी ही मानूंगी। मुझे याद है रात के 7:30 बजे मैं अपने हॉस्टल लौट रही थी। हॉस्टल से मुश्किल से 20 कदम पहले कुछ लड़कों ने मुझे घेर लिया, वे भद्दे कमेंट्स कर रहे थे, अश्लील इशारे कर रहे थे। मैं उस स्थिति में कुछ नहीं कह सकती थी, क्योंकि उस इलाके में मैं कई यौन शोषण की घटनाओं के बारे में सुन चुकी थी और मुझे डर था कि मेरे विरोध पर कहीं मेरे साथ भी कुछ ना हो जाए।

मैं सर झुकाकर चलती रही और वे लोग मेरा पीछा करते रहे। हॉस्टल के गेट पर पहुंचने पर मैंने देखा कि हमारे गार्ड आराम से हॉस्टल के अंदर गप्पे मार रहे हैं।

घर पर बेटी होने पर हमारा समाज डरता है कि कहीं उनकी बेटी को भी इस तरह की घटना का सामना ना करना पड़े। यह डर लड़कियों की शिक्षा को भी प्रभावित करता है। लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें चाहरदिवारी में बंद करने के बदले सरकार एक सुरक्षित माहौल क्यों नहीं बना पाती है?

मेंस्ट्रुअल लीव की सुविधा नहीं

फोटो प्रतीकात्मक है।

हमारे घर में हम तीन महिलाएं कार्यरत हैं। मेरी मॉं पेशे से शिक्षिका हैं, मेरी बहन सरकारी बैंक में मैनेजर है और मैं मीडिया सेक्टर में काम कर रही हूं। मेरी मॉं के स्कूल और मेरे ऑफिस में मेंस्ट्रुल लीव का प्रावधान है (हालांकि शायद ही किसी दूसरे मीडिया संस्थान में यह सुविधा है) मगर मेरी बहन के बैंक में ऐसी कोई भी सुविधा नहीं है। उसे पीरियड्स के दर्द में भी या तो ऑफिस जाना पड़ता है या फिर अपने मेडिकल लीव के तहत छुट्टी लेनी पड़ती है। दुनियाभर में मेंस्ट्रुअल लीव पर तमाम बातें होने के बाद भी कहां है हमारी सरकार?

पीरियड्स से जुड़ी तमाम स्टिग्मा और सुविधाओं की कमी को देखते हुए समाज इसे एक परेशानी समझ बैठता है और वह डरता है कि उनके घर में बेटी आने पर उन्हें भी इस तरह की तमाम झंझटों का सामना करना पड़ेगा।

“बेटी हो, शादी के बाद मॉं-पापा को नहीं देख पाओगी”

हमारे माता-पिता को बचपन से ही यह ताने सुनने को मिलते रहे हैं कि ओह आपका कोई बेटा नहीं है। इसके पीछे बेचारगी का भाव साफ नज़र आता है और इस बेचारगी में उनका मकसद यह कहना होता है कि अब आपके बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा।

इन सबके बीच मेरी बहन ने घर खरीदा है, हमारे परिवार का पहला अपना घर। अब समाज इसकी तारीफ करते हुए भी कह रहा है, “देखो बेटी होते हुए भी इतना कुछ कर रही लेकिन शादी के बाद क्या करेगी? क्या इसका पति लड़की के माता-पिता को उसके घर में रहना पसंद करेगा?”

इन सबके पीछे वही मानसिकता है कि बेटी पराया धन है, ना ही बेटी पर माता-पिता की संपत्ति का कोई अधिकार है, ना ही बेटी शादी के बाद अपने माता-पिता को आर्थिक मदद करने के काबिल है।

इसको लेकर कानून भी आए हैं लेकिन ज़मीनी स्तर पर वे कितना लागू हो पाए हैं? क्या सरकार का काम सिर्फ कानून बना देने भर से है या समाज को उसके प्रति जागरूक करने की ज़िम्मेदारी भी है?

दीदी की शादी में पैसे की मांग

मैं बिहार की रहने वाली हूं और बिहार से ताल्लुक रखने की वजह से दहेज प्रथा की कहानियां हमारे लिए नई नहीं हैं। हमारे घर में पिछले दो-तीन सालों से दीदी के लिए लड़के की तलाश जारी है। लड़के की इस तलाश में अमूमन केस में पैसों की मांग भी शामिल रही है। ये मांग सीधे तौर पर नहीं होती, घुमा-फिराकर होती है।

हम लगातार इन पैसों की शर्तों को मानने से इनकार कर रहे हैं और देखते हैं आगे और कितने साल इस तरह की परिस्थितियों से गुज़रना पड़ता है।

कितने ही घरों में आज भी लड़कियों के होने पर इसलिए शोक मनाया जाता है कि उनकी शादी के लिए इतने रकम कहां से आएंगे। कई माता-पिता लड़कियों की पढ़ाई पर पैसे खर्च नहीं करते, उनका तर्क होता है कि तुम्हारी शादी के लिए पैसे जमा करने हैं।

अब बताइए कहां है हमारा दहेज प्रथा के खिलाफ वाला कानून?

इन सारी घटनाओं को सरकारी प्रयासों से रोका जा सकता है लेकिन जब हमारी सरकार महिलाओं पर लाठियां बरसाना जानती हो, जो सरकार महिलाओं के आंदोलन को बिका हुआ आंदोलन बता सकती है, उनसे क्या ही उम्मीद की जा सकती है।

फिर भी मैं उम्मीद करती हूं कि एक दिन हमारे देश में लड़कियों के जीवन से ये कहानियां खत्म हो जाएं, इन कहानियों का अस्तिव ही ना रहे, मुझे ऐसे ही भारत की तलाश है।

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