JNU की वे 6 खासियत, जो इसे दूसरी यूनिवर्सिटीज़ से अलग बनाती हैं

1966 के संसद में अधिनियम से परित होने के तीन साल बाद 22 अप्रैल 1969 जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जो JNU के नाम से जाना-पहचाना जाता है।

देश के शिक्षा मंत्री रहे प्रख्यात न्यायविद् मोहम्म दाली करीम छागला ने सितंबर 1965 को सर्वप्रथम राज्यसभा के समक्ष इस शिक्षण संस्थान की अवधारणा को प्रस्तुत किया था। उस समय गरीबों, वंचितों और पिछड़ों को आधुनिक विषयों में न्यूनतम शुल्क पर उच्च शिक्षा, छात्रावास आदि सुविधा देने के साथ ही इस विश्वविद्यालय का प्रारंभिक उद्देश्य, भारत को पुन: विश्वगुरु के रूप में पुनर्स्थापित करना था।

अपनी स्थापना के तीन साल बाद अस्तित्व में आया JNU, जिसका अकादमिक सफर अरावली की पहाड़ियों पर ओल्ड कैंपस से शुरू हुआ, पहले ओल्ड कैंपस फिर न्यू कैंपस और नदियों के नाम पर बने हॉस्टलों में रहने वाले हर स्टूडेंट के ज़ेहन में JNU के उसके सफर की कहानी अलहदा है, जो उसके जीवन के खूबसूरत दौर की कहानी है।

यहां यह सवाल किया जाना चाहिए कि वे कौन सी यादें छात्र-छात्राओं के ज़ेहन के बसी हुई हैं, जिसके कारण जब भी JNU पर किसी भी तरह का हमला होता है तो एलुमिनाई भी यहां के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। वास्तव में ये वे यादे हैं, जिनको JNU ने बनाने का काम किया है और उन यादों को बनाने में JNU की पॉलिसी की बहुत बड़ी भूमिका है, जो JNU को छोड़कर और किसी यूनिवर्सिटी में नहीं अपनाई जाती है।

क्या है JNU की पॉलिसी, जो इसे दूसरी यूनिवर्सिटी से अलग बनाती हैं

1. पिछड़े इलाकों से आने वाले स्टूडेंट्स को अतिरिक्त नंबर

JNU ने स्थापना जिस पार्लियामेंट एक्ट के माध्यम से हुई है, उसके अनुसार पिछड़े ज़िलों से आने वालों को यहां की नामांकन प्रक्रिया में अतिरिक्त नंबर दिए जाते हैं। मसलन, आप उड़ीसा के कालाहांड़ी ज़िले या झारखंड के दुमका से या बिहार के पूर्णिया ज़िले से हैं, तो आपको पांच नंबर मिलेंगे, क्योंकि वे इलाके पिछड़े हैं।

JNU में यह कोशिश की जाती है कि भारत के सभी राज्यों से स्टूडेंट्स पढ़ने आ सकें, इसलिए बिहार-झारखंड-उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्यों के छात्र-छत्राओं की संख्या अधिक होती हैं।

2. लड़कियों को प्रोत्साहन

लड़कियों की उच्च शिक्षा में भागीदारी बनाने के लिए यहां लड़कियों को नामांकन के लिए कुछ अतिरिक्त नंबर दिए जाते हैं, इसलिए यहां लड़कियों का अनुपात लड़कों से अधिक है।

3. सोशल साइंस के मल्टी डिसीप्लिनरी रिसर्च का एकमात्र संस्थान

JNU संभवत पूरे भारत में सोशल साइंस के मल्टी डिसीप्लिनरी रिसर्च का एकमात्र संस्थान है। यूनिवर्सिटी में अनेक विदेशी भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, अंडर ग्रैजुएट कोर्स सिर्फ विदेशी भाषाओं में होते हैं, बाकी सारे कोर्स मास्टर्स से शुरू होते हैं।

4. भाषा के मामले में कोई भेदभाव नहीं

भाषा के आधार पर किसी भी कोर्स में किसी स्टूडेंट के साथ भेदभाव नहीं किया जाता अपितु उनको दूसरी भाषा सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

यह बात सच है कि गॉंव-कस्बों से आए स्टूडेंट्स को शुरुआत में भाषाई समस्या से जुझना पड़ता है पर टीचर-स्टूडेंट कम्यून मिलकर सक्रियता से इस समस्या से संघर्ष करते हैं। ये सारी बातें JNU में उन तबके के बच्चों को प्रोत्साहित करती हैं कि वह भी अपनी पढ़ाई का सपना संसाधनों के अभाव में देख सकता है, क्योंकि औसतन वार्षिक 556 करोड़ रुपये अर्थात् प्रति एक स्टूडेंट 6.5 लाख रुपये का व्यय JNU करता है।

5. अनोखी शैली का छात्र संघ चुनाव

पूरे देश में JNU के छात्र संघ का चुनाव अपने आप में अलहदा है, क्योंकि चुनाव कराने के लिए स्टूडेंट्स ही चुनाव समिति बनाते हैं और वही समिति चुनावी प्रक्रिया को पूरा करती है। इसमें प्रशासन का हस्तक्षेप ना के बराबर होता है। हाल की छिट-पुट हिंसा की घटनाओं के इतर आज तक हिंसा या धांधली की खबर नहीं आई है।

हाल के प्रशासन ने यहां चुनावी कैम्पेन के लिए बने पोस्टरों को हटवा दिया। इस तरह के पोस्टर्स स्टूडेंट्स स्वयं ही बनाते रहे हैं और इसके ज़रिए चुनाव प्रचार भी करते रहे हैं।

यहां के छात्र संघ चुनाव जीत चुके कई स्टूडेंट्स राजनीतिक दलों में भी सक्रिय रहे हैं। JNU को धुर वामपंथी बताने वाले भूल जाते हैं कि इस कैंपस से विद्यार्थी परिषद के संदीप महापात्रा ने एक वोट से चुनाव जीता था।

चुनाव में डिबेट की अपनी परंपरा है, जिसमें स्टूडेंट्स सरकार की नीतियों की आलोचना करने की पूरी छूट होती है। हर साल छात्र संघ चुनाव से चुनकर आए स्टूडेंट्स प्रतिनिधि JNU के अपनी परंपरा को बनाए रखने और उसको और अधिक बेहतर बनाने के लिए संघर्षरत रहते हैं, वे किसी भी हाल में अपने स्पेस को खोने को तैयार नहीं होते हैं।

6. JNU के माहौल में बेखौफ लड़कियां

पिछले दिनों JNU में हुई हिंसा की घटना के पहले तक JNU कैंपस वह जगह रही है, जहां रात के अंधेरे में लड़कियां आराम से घूमती हैं और लाइब्रेरी से बैखौफ अपने हॉस्टल जा सकती हैं।

जीएसकैश नाम से काम करने वाला आयोग JNU की लड़कियों को वह हिम्मत देता है कि वे किसी भी यौन शोषण की शिकायत कर सकती हैं। इस आयोग में स्टूडेंट्स ही नहीं प्रशासन और शिक्षकों को भी दोषी पाए जाने पर सज़ा होती है, यह अपने आप में अनोखा है। यही कारण है कि यहां पढ़ने वाली लड़कियों का प्रतिशत किसी और यूनिवर्सिटी की तुलना में ज़्यादा है।

यहां के गंगा, गोदावरी, साबरमती ढाबे पर लड़के-लड़कियों को गंभीर विषयों पर बहस करते हुए आसानी से देखा जा सकता है। विविध विषयों पर बहस करने की यही परंपरा यहां के स्टूडेंट्स को इन्टरडिसिपलीनरी बनाता है।

हर सरकारों के दौर में JNU के बारे में यह कहा जाता रहा है कि JNU पर दबाव बढ़ेगा और डर है कि देश की सबसे बेहतरीन यूनिवर्सिटियों में गिना जाने वाला JNU पहले जैसा आज़ाद और प्रगतिशील नहीं रह सकेगा लेकिन हर सरकार की रिपोर्टों में JNU को बेहतरीन शोध संस्थान माना जाता है।

क्यों नाराज़ रहती हैं सरकारें JNU से?

JNU की स्थापना भले ही कॉंग्रेस के शासन काल में कॉंग्रेस नेता के नाम पर हुई लेकिन JNU की राजनीति अपनी शुरुआती दौर से ही वामपंथी झुकाव के तरफ रही है। अपनी स्थापना के दशक के कुछ साल बाद ही आपातकाल के दौर में यहां से सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने छात्र राजनीति से अपना पांव पसारा।

आपातकाल के दौर में इसके विरोध में ही नहीं, आरक्षण विरोधी राजनीति के दौर में भी JNU ने अपनी छवि आरक्षण समर्थक यूनिवर्सिटी के रूप में बनाई। वामपंथी राजनीति की तरफ झुकाव के कारण दूसरे राजनीतिक दलों की विचारधारा के साथ JNU का संघर्ष हमेशा से बना रहता है। फिर चाहे कश्मीर, गाय, देशभक्ति, राष्ट्रवाद, सस्ती शिक्षा और सांप्रदायिक राजनीति हो, JNU का हर विषय पर मुखर प्रतिरोध हर सरकार को चिढ़ाती है।

मुख्यधारा मीडिया में और सोशल मीडिया में JNU की प्रतिरोध छवि को देश विरोधी छवि बताकर पुराने किस्से को उधेड़ने की कोशिश हो रही है। इंदिरा गॉंधी सरकार को अस्सी के दशक में विश्वविद्यालय को 46 दिनों तक बंद कराने के बाद छात्रावास खाली कराने के लिए पुलिस बल की सहायता लेनी पड़ी थी।

1983 में JNU स्थित एक कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी और उनके संबोधन का स्टूडेंट्स ने जमकर विरोध किया। तब 300 से अधिक स्टूडेंट्स को गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। उसी वर्ष दुर्व्यवहार के अन्य मामले में तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष एन.आर. मोहंती सहित दो स्टूडेंट्स के निष्कासन पर विवाद इतना बढ़ा कि पुलिस को हिंसक JNU स्टूडेंट्स पर लाठीचार्ज करना पड़ा।

उस समय 700 स्टूडेंट्स को जेल जाना पड़ा था, जिनमें प्रख्यात अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी भी शामिल थे, जिन्हें गत वर्ष ही नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

ज़ाहिर है कि सरकारी नीतियों पर हमेशा सवाल पूछने और उसके विरोध करने के कारण JNU का रिश्ता सरकारों के साथ हमेशा प्रतिरोधात्मक रहा है। JNU की यही प्रतिरोधात्मक छवि यहां के स्टूडेंट्स के अंदर वाद-विवाद और बहस की उस संस्कृति का निमार्ण करती है, जो JNU को जीवंत बनाती है और यहां के स्टूडेंट्स को बेखौफ होना सिखाती है।

JNU सिर्फ किताबें पढ़ने से बेहतरीन नहीं बना है, यहां का बौद्धिक खुलापन स्टूडेंट्स को अलग ढंग से गढ़ता है, जो अक्सर हर राजनीति को चुनौती देते हैं और अपने सोचने-समझने की क्षमता को निखारते हैं।

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नोट: इस लेख को लिखने के लिए JNU से निकलने वाली पत्रिकाओं का सहारा लिया गया है।

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