क्या है असली राष्ट्रवाद और कौन होते हैं असली राष्ट्रवादी?

लेख के पहले और दूसरे भाग में भारत में राष्ट्रवाद की व्याख्या प्रस्तुत की गई, इसमें आयातित राष्ट्रवाद और ब्रिटिश प्राच्यवाद से प्रभावित आज के राष्ट्रवाद पर विस्तृत विमर्श किया गया था। साथ ही, असली भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या दी गई, जो सिद्धांतों पर आधारित था/है।

किसी भी तरह के संकीर्ण विचारों के लिए भारतीय राष्ट्रवाद में कोई जगह नहीं है और इसी वजह से भारतीय राष्ट्रवाद समाहित करने की नीति पर चलता है। यूरोपियन राष्ट्रवाद की तरह भारतीय राष्ट्रवाद कभी भी किसी अन्य समूह से नफरत के सिद्धांत पर आधारित नहीं रहा, नफरत से उपजे राष्ट्रवाद को जिन्गोइज़्म कहा जाता है और यह राष्ट्रवाद का विकृत स्वरूप है। प्रस्तुत तीसरे और अंतिम भाग में आज के राष्ट्रवाद/जिन्गोइज़्म की पड़ताल की गई है।

क्या आप सच में राष्ट्रवादी हैं?

पहले और दूसरे भाग से जोड़ते हुए यह लेख कुछ सवालों से शुरू होता है।

  • क्या हम भारतवासी एक दूसरे से प्यार करते हैं?
  • क्या किसी गरीब, दीन-हीन व्यक्ति को देखकर हमारे मन में यह विचार आता है कि मेरे देश के नागरिक को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं।
  • क्या जब हम किसी किसान के बारे में कुछ अप्रिय सुनते हैं, तो हमारा मन व्यथित होता है?
  • क्या किसी महिला के साथ कोई अप्रिय घटना घटती है, तो हमारा मन कुंठा और रोष से भर जाता है बिना if या but किये?
  • यही सवाल मॉब लिंचिंग, हिन्दू-मुस्लिम बाइनरी, साम्प्रदायिक दंगे, दलितों पर हमला, गिरती अर्थव्यवस्था, सरकार की आलोचना इत्यादि पर भी लागू होते हैं?
  • क्या हम तार्किक होकर इन सभी मुद्दों पर एक प्रजातांत्रिक राय रखते हैं?

इन सब सवालों का या इनसे मिलते जुलते सवालों का जवाब अगर ना है तो हम राष्ट्रवादी नहीं हैं, जिन्गोइस्ट हैं।

आजकल जो राष्ट्रवाद हम भारतीयों को परोसा जा रहा है और जिसकी जड़ यूरोप में है। वह राष्ट्रवाद किसी से नफरत पर आधारित है। कुछ लोग राष्ट्रवादी हैं क्योंकि वे पकिस्तान से नफरत करतें हैं, देश के अल्पसंख्यको से नफरत करते हैं, देश में दलित पिछड़ों को मिलने वाले आरक्षण से उन्हें नफरत हैं, महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों, रेप इत्यादि की घटनाओं पर एक तरफा राय रखते हैं इत्यादि।

दंगे, फोटो साभार- Getty images

ऐसा राष्ट्रवाद नफरत पर आधारित होता है, प्रेम पर नहीं और यह भारतीय राष्ट्रवाद बिल्कुल भी नहीं है, हालांकि इसे भारतीय राष्ट्रवाद बोलकर ही परोसा जा रहा है। यह राष्ट्रवाद की जिन्गोइस्ट अवधारणा है।

दूसरी बात में कुछ सवाल;  क्या हम किसी से नफरत करते हैं? बिहार vs हरियाणा, पंजाब vs उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र vs उत्तर भारतीय, साउथ vs नार्थ, ईस्ट vs नार्थ, वगैरह हम सभी इस क्षेत्रवाद से घिरे हुए हैं और अपने राज्य, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपने खान पान इत्यादि को दूसरे राज्यों से कई गुना बेहतर मानते हैं, एक दूसरे के प्रति नफरत को पालते हैं?

वहीं दूसरी ओर  हिन्दू-मुस्लिम बाइनरी, साम्प्रदायिक दंगे, जाति आधारित दंगे, महिलाओं पर अत्याचार, महिलाओं के विरुद्ध बढती हुई हिंसा एवं रेप के मामलों पर या तो एक तरफा राय रखते हैं या आंख बंद कर लेते हैं?

अगर इनका जवाब हां है तब भी हम “भारतीय राष्ट्रवादी” नहीं हैं, जिन्गोइस्ट हैं। हाल के कुछ मुद्दों पर चर्चा करते हैं, यह जानने के लिए कि क्या वाकई में जिसे हम राष्ट्रवाद मान रहे हैं, वह राष्ट्रवाद ही है?

क्या किसानों के लिए आपका दिल पसीजा

कुछ समय पहले किसान तमिलनाडू के किसान दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे थे। क्योंकि उस समय तमिलनाडू में भीषण अकाल जैसी स्थिति थी, वहां बारिश ना होने की वजह से किसानों को सबसे ज़्यादा परेशानी का सामना पड़ा था।

किसान
किसान

सवाल यह है कि हममें से कितने लोग यह बात जानते हैं? और जो लोग जानते हैं उनमें से कितने लोग उन किसानों से मिलने गये कि ये मेरे देश के नागरिक हैं और किसी परेशानी से घिरे हुए हैं। हमें इनकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ मिलानी है ताकि इन किसानों को न्याय मिल सके? अगर नहीं गए या उनकी परेशानी नहीं सुनी, या उनकी परेशानी जानकार हमें कोई फर्क नहीं पड़ा तो हम राष्ट्रवादी नहीं हैं। यही बात देश के अन्य किसानों और उनकी समस्याओं पर भी लागू होती है।

जल विवाद पर क्यों खामोश हैं?

हम जानते हैं के पंजाब और हरियाणा में जल विवाद कई साल पुराना है। अभी सन 2016 में जब दोनों राज्यों में बीजेपी की सरकार थी, तब यह विवाद और गहराया था। पंजाब ने हरियाणा को नदियों का जल देनें से फिर से साफ मना किया और विवाद गहरा गया। दोनों ही राज्यों में उस समय बीजेपी का शासन था। केंद्र में बीजेपी थी, लेकिन अपने को राष्ट्रवादी घोषित करने वाले दल के मुखिया ने एक शब्द नहीं बोला।

यही नहीं कर्नाटक और तमिलनाडू में भी जल विवाद कई सालों से चला आ रहा है और सन 2016 में ही विवाद और ज़्यादा गहराया, लेकिन केंद्र में सत्ताधारी सरकार ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। जो दल, जिस दल का नेता अपने को राष्ट्रवादी घोषित करते हों वे इन दोनों मुद्दों पर चुप क्यों रहे? हमारे देश के नेता ने विवादित जगहों पर जाकर बयान क्यों जारी नहीं किया कि यह मेरा देश, मेरा राष्ट्र है और मेरे राष्ट्र में ऐसी किसी भी विवाद के लिए कोई जगह नहीं है? तो इन विवादों में भी राष्ट्रवाद की झलक तक नहीं दिखी।

मॉब लिंचिंग एवं अन्य दंगों पर मूक क्यों हैं?

देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं होती हैं, साम्प्रदायिक या जातिगत दंगे होते हैं, महिलाओं पर अत्याचार होता है, किसान मजबूर हैं, बेरोज़गारी बढ़ रही है और हम देशवासी और देश के नेता चुप रहते हैं। जो यह दावा करते हैं के वे राष्ट्रवादी हैं, जो यह दावा करते हैं कि उनके लिए राष्ट्र पहले आता है, तो फिर इतने राष्ट्रीय मुद्दों पर चुप्पी क्यों? शुरुआत मॉब लिंचिंग और विभिन्न दंगों से करते हैं। नीचे दिए गए टेबल इस बात को प्रमाणित करता है कि सन 2014 से मॉब लॉन्चिंग की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

मॉब लिंचिंग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
मॉब लिंचिंग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

इन घटनाओं पर एक आम राय बननी चाहिए के मॉब लिंचिंग गलत है और देशवासियों को इसका पुरज़ोर विरोध करना चाहिए, लेकिन क्या सभी ने एक सुर में विरोध किया? नहीं, ऐसी घटनाओं पर हम सभी बंटे हुए हैं। यह जानते हुए भी भारत में कानून का शासन है।

इस मॉब (भीड़) को इंसाफ करने का अधिकार किसने दिया? चाहे वह राजस्थान हो, उत्तर प्रदेश हो, झारखंड हो या देश का कोई भी राज्य? इस भीड़ को अगर शक था भी, तो यह तथाकथित अपराधी को पास के पुलिस स्टेशन क्यों नहीं ले गई या 100 नंबर डायल क्यों नहीं किया? अगर ये दोषी थे तो इसकी सज़ा इन्हें कानून द्वारा स्थापित प्रकिया से दी जाएगी या ये भीड़ खुद देगी?

आप तर्क के आधार पर इस सवाल का जवाब खोजिये और सोचिये कि यह जिन्गोइज़्म हमें किस दिशा की तरफ ले जा रहा है।

दलितों और महिलाओं पर हिंसा के बढ़ते मामले

दलितों पर हमले की घटनाएं भी तेज़ी से बढ़ी हैं और यह पहले से ज़्यादा संगठित तरीके से की जा रहीं हैं। National Herald 15 अप्रैल 2018 में सरूर अहमद द्वारा लिखे लेख के हिसाब से भारत में दलितों के विरुद्ध हिंसा या अत्याचार में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

देश में आरक्षण के खिलाफ भी कई संगठन बने हुए हैं और आरक्षण का विरोध करने वालों की संख्या काफी बढ़ी है, इसके अतिरिक्त दलित महिलाओं के विरुद्ध भी यौन हिंसा में बढोतरी हुई है। आरक्षण क्यों ज़रूरी है यह जाने बिना उसका विरोध, दलित महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा या दलित समुदाय के किसी व्यक्ति/व्यक्तियों को बंधक बना के मारना/पीटना या जान से मारना आज आम बात हो गई है। क्या यह राष्ट्रवाद हो सकता है? नहीं, ऐसी घटनाएं सिर्फ नफरत की वजह से होती हैं और नफरत राष्ट्रवाद नहीं, जिन्गोइज़्म सिखाता है।

सवर्ण आंदोलन
SC ST एक्ट के खिलाफ सवर्णों का भारत बंद

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा या यौन शोषण के मामले में भी हम सभी बंटे हुए हैं। हाल के वर्षों में ये देखने में आया है के जब कभी महिलाओं के विरुद्ध कोई अप्रिय घटना घटती है, तब हम एक सुर में ऐसी किसी घटना की निंदा नहीं करते हैं, हम पहले अपराधी का धर्म, जाति या राजनीतिक संबंध देखते हैं, फिर तय करते हैं के के घटना की निंदा करनी है या नहीं, किसी भी देश के लिए इससे ज़्यादा शर्मनाक कुछ और नहीं हो सकता।

हमारे लिए महिलाओं की सुरक्षा महत्वपूर्ण होनी चाहिए, उनको बराबरी का हक दिलवाने के लिए संघर्ष करना चाहिए इत्यादि लेकिन होता इसके ठीक विपरीत है। पिछले कुछ वर्षों में जब भी किसी भी महिला के विरुद्ध बलात्कार, हत्या या छेड़ छाड़ का मामला सामने आया है, तब हमने वहां सबसे पहले अपराध करने वाले की पहचान खोजी है, अगर वे किसी अन्य धर्म या जाति से निकला तब सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक खूब हंगामा किया, लेकिन अगर ऊंची जाति या सधर्मी निकला तब हमने चुप्पी साध ली। ये कैसा विरोध है?

यहां तक की अगर अपराधी कोई रसूख वाला राजनीतिक व्यक्ति निकला, तब हममें से कई लोगों ने महिला में ही दोष निकालना शुरू कर दिया। कभी महिला को जला दिया जाता है, कभी एक्सीडेंट करवा दिया जाता है, कभी आरोप लगाकर जेल में डाल दिया जाता है और हम चुप रहते हैं। हम वहां महिला सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं होते, बल्कि सधर्मी, सजातीय या समान विचारधारा वाले दल के व्यक्ति की वजह से या तो लड़की में ही दोष निकालते हैं या खुले आम आरोपी को निर्दोष साबित करने के लिए जुलूस निकालते हैं।

देश में बढ़ते बलात्कार के खिलाफ प्रदर्शन

नतीजा महिलाओं के विरुद्ध अप्रिय घटनाएं बढ़ती जाती हैं और हम सभी मूकदर्शक बने रहते हैं। अगर सच्चे अर्थों में हम राष्ट्रवादी होते तो ऐसी घटनाएं होती ही नहीं, अगर होती भी तो कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया से दोषी को सज़ा दिलाने के लिए मांग करते।

सच्चे अर्थों में राष्ट्रवाद अपने देश की उपाश्रित (Subaltern) जनता की आवाज़ बनने से आता है, अगर हम किसी पीड़ित की आवाज़ नहीं बन पा रहे हैं या आवाज़ बनने में सेलेक्टिव हैं, तब हम जिंगोइस्ट हैं, राष्ट्रवादी नहीं।

यह सारी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि हममें से कई भारतीय आपस में प्यार नहीं नफरत करते हैं और इसी नफरत की वजह से ऐसी घटनाएं होती हैं। फिर एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप होता है लेकिन समस्याओं को खत्म करने के लिए कोई सटीक कदम नहीं उठाया जाता।

इन घटनाओं को जिनगोइस्ट अंजाम देते हैं

अगर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले सच्चे राष्ट्रवादी होते, तो ऐसी घटनाएं होती ही नहीं। इस तरह की घटनाओं को जिन्गोइस्ट ही अंजाम देते हैं। वहीं दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रवाद में ऐसी किसी अप्रिय घटना के लिए कोई जगह नहीं है। फिर ये कैसा राष्ट्रवाद है? और भारत का राष्ट्रवाद आखिर है क्या? जो हमे पिछले पांच सालों से परोसा जा रहा है क्या वही भारत का राष्ट्रवाद है? नहीं, यह भारत का राष्ट्रवाद नहीं है और जैसा ऊपर कहा गया, ये उधार का राष्ट्रवाद है, जो यूरोप के राष्ट्र और राष्ट्रवादी सिद्धांतों से प्रभावित है और आयातित है।

भारत के राष्ट्रवाद को समझने के लिए शुरुआत राष्ट्रगान से करते हैं, हमारे देश का राष्ट्रगान किसी भी अन्य देश के राष्ट्रगान से ज़्याजा वृहत्तर है, समावेशी है। हमारा राष्ट्रगान देश के हर राज्य को अपने में सम्मिलित करता है, यह भारत देश को एक यूनिट नहीं मानता बल्कि यह राष्ट्रगान वास्तविक रूप में देश की विविधता का सम्मान करता है।

बाकी देशों के राष्ट्रगान सिर्फ देश की बात करते हैं, देश के विभिन्न राज्यों की नहीं। यह राष्ट्रगान उम्मीद करते हैं कि सभी राज्य के निवासी एक राष्ट्र में आकर मिल जाएं, ये देश अपने विभिन्न राज्यों का नाम लेने से घबराते हैं के कहीं से अलगाव की भावना ना उठने लगे, इसलिए देश या राष्ट्र के लिए समर्पण भाव इनके राष्ट्रगान में प्रदर्शित होता है, लेकिन भारतीय राष्ट्रगान सभी राज्यों को उनकी विविधता के साथ भारतीय राज्य में समाहित करता है, सभी राज्यों उनकी संस्कृति, भाषा इत्यादि को पूरा सम्मान देता है और इसी वजह से हमारा राष्ट्रगान ज्यादा समावेशी है।

भारत में ब्रिटिश शासन, फोटो साभार- सोशल मीडिया

दूसरे, भारतीय राष्ट्रवाद एकता के सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन भारतीय राष्ट्रवाद इस एकता को धर्म, जाति, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्रीय पहचान इत्यादि के आधार पर स्वीकार नहीं करता, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद मूल्यों के आधार पर इस एकता को स्वीकार करता है। यह विविधता का सम्मान करता है और सभी तरह की संस्कृतियों को, धर्म को, भाषाओँ को, क्षेत्रीय पहचान को अपने में समाहित करता है।

भारतीय राष्ट्रवाद किसी एक खास संस्कृति को, किसी एक खास भाषा को, किसी एक खास धर्म को या किसी क्षेत्र विशेष को बाकी सब पर थोपता नहीं हैं। लेकिन अगर कोई व्यक्ति या समूह या कोई संगठन किसी खास पहचान को बाकी सभी पर थोपने का प्रयास करते हैं या बाकी संस्कृतियों को भाषाओं इत्यादि को अपने से कमतर समझते हैं, तब यह भारत का राष्ट्रवाद नहीं है। ये व्यक्ति, समूह या संगठन उधार के यूरोपियन राष्ट्रवाद (Borrowed Nationalism) से प्रभावित हैं। कम शब्दों में जिन्गोइस्ट।

तीसरा, भारतीय राष्ट्रवाद शुरू से कुछ सिद्धांतों पर आधारित रहा है, जो एकता एवं समरूपता के सिद्धांत पर आधारित था, भारतीय औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश के खिलाफ इसलिए संघर्ष नहीं कर रहे थे, क्योंकि उनका रंग हमारे रंग से अलग है। बल्कि आज़ादी की लड़ाई इस आधार पर लड़ी जा रही थी क्योंकि ब्रिटिश शासन अत्याचारी था, क्योंकि औपनिवेशवाद अन्यायी था और किसी देश को गुलाम बनाना समानता, स्वतंत्रता, न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ था।

सिद्धांतों पर आधारित राष्ट्रवाद

आज का भारतीय राष्ट्रवाद भी सिद्धांतों पर ही आधारित है, ये हमें देश और देशवासियों से प्यार करना सिखाता है, भले ही देशवासी किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र, या संस्कृति का हो। भारतीय राष्ट्रवाद में किसी के प्रति नफरत के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति, समूह या संगठन किसी अन्य से नफरत के भाव रखता है तो यहां भी वोे सभी भारतीय राष्ट्रवाद के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध जा रहे हैं।

80 के दशक से भारतवासियों को यही विचार राष्ट्रवाद के नाम पर संघ परिवार द्वारा परोसा जा रहा है,जिसकी गति पिछले पांच सालों में बढ़ गई है। और ये कतई भारतीय राष्ट्रवाद नहीं है, ये उधार का यूरोपियन राष्ट्रवाद है जो सिर्फ जिन्गोइस्ट भावनाओं को भड़काता है।

फोटो साभार- Getty images

चौथा, भारतीय राष्ट्रवाद के उपरोक्त गुणों की वजह से ही हम भारतीय सभी देशों का, उनकी संस्कृति का सम्मान करते हैं। यही राष्ट्रवाद हमें विभिन्न देशों से जोड़ता है, उनसे अलग नहीं करता। आज़ादी के संघर्ष के समय भी इसी राष्ट्रवाद ने हमें दूसरे विदेशी देशों से जोड़ा, चाहे वे अफ्रीका हो या लैटिन अमेरिका हो या जापान हो, रूस हो वगैरह।

पांचवा, भारत का राष्ट्रवाद आतंरिक रूप से एकजुटता पर बल देता है, भारतीय राष्ट्रवाद किसी व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म, भाषा इत्यादि के आधार पर अलग नहीं करता, बल्कि सभी का सम्मान करता है और समाहित करता है। भारतीय राष्ट्रवाद सभी भारतियों को उनके धर्म, भाषाई, क्षेत्रीय, सांस्कृतिक इत्यादि पहचानों के आधार पर उन्हें बांटता नहीं है, बल्कि जोड़ता है।

क्या है असली राष्ट्रवाद?

अब पिछले लगभग 6 वर्षों से जो राष्ट्रवाद के नाम पर हम भारतियों को परोसा जा रहा है, उसकी तुलना यहां की जाए, क्या आप मानेंगे कि जो राष्ट्रवाद हमे दिखाया जा रहा है, वहीं असली भारतीय राष्ट्रवाद है? नहीं, इसे संकीर्ण या उधार का यूरोपियन राष्ट्रवाद कहना ज़्यादा उचित होगा, जो अपने देश की ज़मीन से कोसों दूर हैं, जो खड़ा तो भारत में है लेकिन बड़ी आशा से यूरोप के राष्ट्र के सिद्धांत को देख रहा है, वे सिद्धांत जो आज खुद यूरोप में प्रासंगिक नहीं रहा।

यूरोप में आज अगर कोई कहे के वो राष्ट्रवादी है, तो सुनने वाले उस व्यक्ति को शक की नज़र से देखेंगे, यह सोचते हुए कि यह शक्स किसी समुदाय, संस्कृति, भाषा या रंग के खिलाफ है और कभी भी आक्रामक हो सकता है और शायद किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पुलिस भी बुला लें।

आज बहुसंख्यक यूरोपियन अपने को राष्ट्रवादी नहीं कहता/कहती क्यूंकि यूरोप के राष्ट्रवाद ने एक दूसरे से नफरत का पाठ ही पढ़ाया, इसलिए सभी यूरोपियन देश राष्ट्रवाद के सिद्धांत को पीछे छोडकर एक साथ मिल गये और यूरोपियन यूनियन बनाई ताकि सभी यूरोपियन राज्य एकजुट होकर रह सके।

वहीं दूसरी ओर यूरोप से बिलकुल अलग भारतीय राष्ट्रवाद विविधता में एकता की बात करता है, यह किसी धर्म, जाति, सम्प्रदाय या संस्कृति के विरुद्ध नहीं है। लेकिन जिन्गोइस्ट आज भी यूरोप के बीते हुए इतिहस में राष्ट्रवाद को खोजते हैं, भारतीय राष्ट्रवाद नकारात्मक नहीं है लेकिन जिस राष्ट्रवाद को भारतवासियों को परोसा जा रहा है वो नकारात्मक है, हिंसक है, द्वेष से भरा है और आपसी भाई चारा खत्म करना चाहता है।

अगर इस देश में साम्प्रदायिक दंगे होते हैं, और कोई दल या संगठन इसका चुनावी फायदा लेना चाहता है तो क्या आप इसे राष्ट्रवाद कहेंगे? अगर आपका जवाब हां है, तो आप जिन्गोइस्ट है और आपको श्रीलंका को देखना होगा, श्रीलंका, एक ऐसा देश जो मानव विकास दर में दक्षिण एशिया में एक समय सर्वश्रेष्ठ था, जो एक सशक्त देश था, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर था, यह देश आज कहां है?

जब देशहित के मुद्दों पर आवाज़ नहीं उठी

इस देश में 50 के दशक में एक आन्दोलन शुरू हुआ, जिसका नारा था, श्रीलंका में रहना है तो सिंहला सिंहला कहना है वगैरह और नतीजा, सिंहला-तमिल जनसंख्या के मध्य संघर्ष। इस संघर्ष ने श्रीलंका को अंदर तक तोड़ दिया। हमारे देश में भी कुछ ऐसे ही विचार हमारे दैनिक जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, जैसे भारत में यदि रहना है वन्दे मातरम कहना है, जय श्री राम सबको बोलना है, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद नहीं, भारत माता की जय बोलो वगैरह।

दो देशों (नाज़ी जर्मनी और श्रीलंका) का हाल इतिहास में छिपा है, अब हमें तय करना है कि देश को किस दिशा में ले जाना है। पाकिस्तान या बांग्लादेश को आंख दिखाना राष्ट्रवाद नहीं हो सकता, उन पर आतंकवादी घटना की वजह से की गई सैनिक कार्यवाही भी राष्ट्रवाद की श्रेणी में नहीं आती। इसे विदेश संबंध के परिप्रेक्ष्य में रखा जा सकता है, लेकिन अगर किसी दल का नेता सैनिकों की शहादत के नाम पर वोट मांगता है तो क्या आप इसे राष्ट्रवाद कहेंगे? अगर आपका जवाब हां है, तो यही दल, यही नेता अमेरिका को आंख क्यों नहीं दिखा पाते?

अमेरिका से हुए विभिन्न व्यापार समझौतों में भारत अपनी आवाज़ क्यों नही बुलंद कर पाता है? क्यों अमेरिका की सही गलत हर बात मान लेता है? इस राष्ट्रवाद को उस समय क्या हो जाता है जब अमेरिका सामने होता है?

अभी कुछ ही दिन पहले भारत ने इरान पर अमेरिकी शर्तों को मान लिया है। राष्ट्रवाद यह सिखाता है कि देश किसी के आगे नहीं झुकेगा और देशहित में जो सही होगा वो किया जायेगा। फिर ईरान के मामले में ये देशहित/राष्ट्रहित कहां गया? या नेरोबी में हुए आर्थिक सम्मेलन में क्यों भारत अमेरिका की सभी शर्तें मानने पर विवश हुआ? क्यों भारत ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए आवाज नहीं उठाई?

मुझे भारतीय होने पर गर्व है

अंत में; मुझे भारतीय होने पर गर्व है, क्योंकि भारत एक ऐसा देश है, जिसने दुनिया को यह दिखाया कि एक गरीब देश में सच्चा राष्ट्रवाद आ सकता है, जो किसी से नफरत नहीं करता बल्कि सबका सम्मान करता है, जो यह दिखा सकता है कि एक गरीब देश भी सबसे बड़ा प्रजातंत्र बन सकता है।

एक समय प्रजातंत्र के बारे में यह माना जाता था कि यह सिर्फ विकसित देशों में ही फल फूल सकता है। भारत ने आज़ादी के बाद से अब तक प्रजातंत्र को सफलतापूर्वक चलाया और उसको मज़बूती दी। यह देश के इसी राष्ट्रवाद का परिणाम है जिसकी यहां चर्चा की गई, जो विविधताओं का सम्मान करता है।

उस दौर में कई विचारक यह मानते थे केि गहरी विविधताओं वाला देश कभी मज़बूत नहीं हो सकता और विभिन्न टुकड़ों में बंट जाता है। भारत को आज़ादी मिलने के बाद भी कुछ विचारकों ने यह माना था कि भारत बहुत समय तक एक आज़ाद एवं संगठित राज्य के रूप में नहीं रह पाएगा और कई टुकड़ों में बंट जाएगा, क्योंकि यह विविधताओं से भरा हुआ है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

राष्ट्रवाद ने भारत को बचाया है

आज भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक देश है। यह भी इसी राष्ट्रवाद का परिणाम है, जो सभी को समाहित करता है, खुद भारतीय प्रजातंत्र एवं धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा सभी मतों, धर्मों, संस्कृतियों इत्यादि को अपने में समाहित करते हैं। यह भारत की खूबसूरती है, भारत कई भागों में टूटने से इसलिए नहीं बचा क्योंकि भारतीय राष्ट्रवाद ने देश पर एक तरह की कोई खास पहचान थोपी या किसी धर्म विशेष की पहचान सभी पर थोपी या किसी एक क्षेत्र विशेष की संस्कृति, भाषा सभी भारतियों पर थोपी, या सबको एक विचार में पिरोने का कार्य किया।

भारत बचा रहा क्योंकि भारतीय राष्ट्रवाद ने सभी संस्कृतियों, धर्मों, भाषाओँ, क्षेत्र, इत्यादि को पूरा सम्मान दिया, अपने में सबको समाहित किया। एक व्यक्ति भारत में तमिल या बंगाली या गुजरती या मराठी होने के साथ साथ भारतीय भी है, इन सभी की विभिन्नताओं का सम्मान भारतीय राष्ट्रवाद ने किया। मुझे गर्व है भारतीय होने पर, लेकिन साथ ही साथ जब देश में कुछ गलत होता है तो मुझे शर्म भी आती है।

किसी भी व्यक्ति को अगर अपने देश पर गर्व है तो उसे कुछ गलत होने पर शर्म भी आनी चाहिए, अगर शर्म नहीं आती तो हम राष्ट्रवादी होने का ढोंग कर रहे हैं, और देश को आगे बढने से रोक रहे हैं। इस गर्व और शर्म के मिश्रण से ही हम सभी भारत को एक आदर्श देश बना सकते हैं। भारत ने विश्व को विभिन्नताओं (धर्म, संस्कृति, भाषा इत्यादि) का सम्मान करना सिखाया है, विभिन्नताओं को राष्ट्र में समाहित करना सिखाया है, विभिन्नताओं को किस तरह देश की धारा में जोड़ते हैं, यह सिखाया है।

असली राष्ट्रवाद को जनता तक पहुंचाने की जरूरत है

यह बात अक्षरशः सही है के आने वाले समय में भारत विश्व गुरु बनेगा, लेकिन उस आधार पर नहीं जिस आधार पर आरएसएस या संघ परिवार का जिन्गोइज़्म कहता है, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद विश्व को ये सिखाएगा के विभिन्नताओं का, अलग पहचान का, सभी संस्कृतियों का सम्मान कैसे किया जाता है और इन सभी को एक राष्ट्र में एक साथ पिरोकर कैसे रखा जाता है। पिछले कुछ वर्षो में भारत के इस राष्ट्रवाद पर जो जिन्गोइस्ट द्वारा हमले किये गये हैं, उससे भारतीय राष्ट्रवाद विचलित नहीं होगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर

परेशानी यही है, कुछ दल और विचारक (जिनमें मार्क्सवादी प्रमुख हैं) या तो यूरोपियन अनुभव देखकर राष्ट्रवाद से डरे हुए हैं, और इसे हिंसक, नकारात्मक मानते हैं या कुछ दल (कांग्रेस इत्यादि) संघ परिवार की ही तरह एक समानांतर राष्ट्रवाद को खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं, ये दोनों ही गलत हैं, और ये दोनों ही संघ परिवार को सीधा फायदा पहुंचा रहे हैं।

आज के समय में भारत के असली राष्ट्रवाद को जनता तक पहुंचाने की ज़रूरत है और यही संघ परिवार के एकाकी उधार के जिन्गोइस्ट राष्ट्रवाद का प्रभावकारी जवाब होगा। संकीर्णता या संकीर्ण विचारों की उम्र बहुत छोटी होती है और और संकीर्ण विचार हमेशा विजयी मुद्रा में खड़ा नहीं रह सकता।

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यह लेख पूर्व में 27 मई 2019 को डॉ अनुराग पांडेय द्वारा “इंडियन डेमोक्रेसी” में  प्रकाशित हुआ है। लेखक अनुराग पांडेय दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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