सर्दियों में धूप की कमी से होने वाला रोग विंटर ब्लू क्या है

सर्दियों में प्रकृति के चक्र में जब बदलाव होता है तो उसका सीधा प्रभाव लोगों की दिनचर्या और उनके मूड पर पड़ता है। सर्दियों के मौसम में लोगों में अवसाद के लक्षण अचानक बढ़ जाते हैं, जिसे एसएडी कहा जाता है। यह एक प्रकार का सीजनल डिसआर्डर है, जो मौसम के बदलने के कारण शुरू होता है।

प्रकृति और मन का गहरा संबंध होता है क्योंकि प्रकृति हमेशा अपना प्रभाव मनुष्य के व्यवहार पर डालती है। सर्दियों के मौसम की बात करें तो भले ही यह मौसम लोगों के लिए सुहावना होता है मगर इस मौसम में भी लोगों के स्वास्थ्य पर अनेक प्रभाव देखे जाते हैं।

चूंकि इस मौसम में दिन की लंबाई कम होती है, जिस वजह से लोगों को सूरज की पर्याप्त रौशनी नहीं मिल पाती है और वे ज़्यादातर समय घर पर रहना पसंद करते हैं, जिसकी वजह से उनके अंदर डिप्रेशन यानी अवसाद के लक्षण बढ़ने लग जाते हैं।

डिप्रेशन के पेशेन्ट्स में विंटर ब्लू होने की अधिक संभावनाएं

सर्दियों में बैठे लोग
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

सर्दियों के मौसम में शुरू हुई इस स्थिति को सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर यानी एसएडी या विंटर ब्लू के नाम से जाना जाता है। यह अवसाद की एक अलग इकाई नहीं है मगर इसे उप-प्रकार के रूप में देखा जाता है। यह उन लोगों में ज़्यादा देखा जाता है, जो पहले से ही अवसाद के दायरे में होते हैं।

पुरुषों की तुलना में यह स्थिति महिलाओं में ज़्यादा देखी जाती है। हाल ही में आई एक मेडिकल सर्वे के मुताबिक 40 प्रतिशत महिलाओं में एसएडी के लक्षण देखने को मिलते हैं।

जो महिलाएं गृहणी हैं, उनमें कामकाजी या ऑफिस जाने वाली महिलाओं की तुलना में एसएडी के लक्षण ज़्यादा देखे जाते हैं क्योंकि हमेशा घर के कामों में उलझा हुआ होने के कारण वे बाहर की दुनिया से कट जाती हैं और अवसाद के गिरफ्त में चली जाती हैं।

इसके साथ ही 18 से 30 साल तक के युवा भी एसएडी के शिकार होते हैं। अधिकांश युवाओं में अवसाद के लक्षण रोज़गार, नौकरी या शादी को लेकर होते हैं, जो इस मौसम में और भी ज़्यादा बढ़ जाते हैं।

मूड स्विंग होना आम बात है

डिप्रेशन से परेशान युवक की प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार : Flickr
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार : Flickr

एक रिसर्च के मुताबिक सूरज की रौशनी कम होने और आसमान में काले बादल छाये रहने के कारण हमारे दिमाग में सेरोटोनिन केमिकल (एक प्रकार का न्यूरोट्रांसमीटर) का निर्माण कम होता है, जिसका सीधा असर हमारे मूड पर पड़ता है।

वहीं, जब यह केमिकल कम बनता है, तो मूड नॉर्मल नहीं रह पाता है। इससे व्यक्ति को उदासी, बेचैनी और डिप्रेशन होना शुरू हो जाता है। हमारे शरीर में सेरोटोनिन के उत्पादन में विटामिन डी मुख्य भूमिका निभाता है।

धूप की कमी के कारण विटामिन डी का उत्पादन पूरी तरह से नहीं हो पाता है, जिस कारण हमारे शरीर में सेरोटोनिन का स्तर कम होने लगता है और व्यक्ति दिन में भी कम एनर्जी और सुस्ती महसूस करने लगता है। हालांकि कुछ लोगों में यह केमिकल ज़्यादा असर करता है और कुछ पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है।

थकान भी है एक वजह

डिप्रेशन
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Pixabay

हम सब जानते हैं कि सर्दियों में लोगों की दिनचर्या बदल जाती है। सोने और जागने का चक्र गड़बड़ हो जाता है, जिससे थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। सर्दियों में सूरज की रौशनी कम होने के कारण मस्तिष्क ज़्यादा मात्रा में मेलाटोनिन हॉर्मोन बनाने लगता है, जिससे उनींदापन बढ़ जाता है क्योंकि इस हॉर्मोन का सीधा संबंध रौशनी और अंधेरे से होता है।

सर्दियों में जब सूरज जल्दी ढल जाता है, तब हमारा मस्तिष्क मेलाटोनिन हॉर्मोन बनाने लगता है, जिस कारण शाम होते ही नींद और जम्हाई आने लगती है और हम जल्दी बिस्तर पर जाना चाहते हैं। इसके साथ सर्दियों में शारीरिक सक्रियता भी थोड़ी कम हो जाती है, जिस कारण थकान महसूस होने लगता है।

वहीं, ध्यान ना देने के कारण कभी-कभी यह थकावट और आलस गंभीर संकेत के रूप में उभरकर सामने आता है।

एसएडी के लक्षणों की अगर बात की जाए तो इसमें बेहद सामान्य लक्षण देखने को मिलते हैं। जैसे- थकान, सिर में दर्द, बिना बात के गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन बढ़ जाना, आलस आना, किसी भी काम में मन ना लगना, रोज़मर्रा के कामों को करने में भी अरुचि होना, अकेलापन महसूस होना, भूख या वजन में बदलाव होना तथा बिना बात के तनाव लेना।

सर्दियों के मौसम में लोगों के खानपान का शेड्यूल बिगड़ जाता है और वे ज़्यादा चीनी, फैट, सोडियम व कैलोरी से भरपूर पदार्थ खाने लग जाते हैं। जिस कारण उनमें मधुमेह और हृदय की समस्या बढ़ जाती है, जिससे दिल और दिमाग पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

एसएडी से बचाव कैसे करें?

  • एसएडी से बचने के लिए खाने में न्यूट्रिशन्स से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए।
  • इसके साथ ही ऐसे कामों को करना चाहिए जिससे स्वयं को खुशी मिले।
  • इसके लिए आप अपने पसंद के कार्य कर सकते हैं। जैसे- संगीत सुनना, किताबें पढ़ना आदि।
  • दोस्तों और परिवारजनों के साथ समय बिताना भी एक अच्छा उपाय है, क्योंकि इससे अकेलापन बंट जाता है और अवसाद में कमी आती है।
  • एक्सरसाइज या शाम में टहलने से भी अवसाद के लक्षणों में कमी आती है।

इलाज में शामिल चीज़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr
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विटामिन डी यह एसएडी के लिए एक रामबाण औषधि के तरह कार्य करता है। धूप की रौशनी में बैठने पर शरीर प्रचुर मात्रा में विटामिन डी का निमार्ण करता है, जिससे अवसाद में बहुत कमी आती है क्योंकि प्राकृतिक रौशनी से शरीर में सेरोटोनिन अर्थात मूड को नियमित करने वाले रसायन का स्तर बढ़ता है, जो एसएडी को कम करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है।

लाईट थेरेपी- 1980 के दशक से ही लाईट थेरेपी को एसएडी के लिए अच्छा इलाज माना जाता रहा है। धूप की कमी के कारण होने वाली इस समस्या को दूर करने के लिए मरीज़ को कृत्रिम रौशनी दी जाती है। सुबह के समय लाईट बॉक्स के सामने बैठने से मरीज़ को लक्षणों में आराम मिलता है, क्योंकि शरीर इसके अनुरुप ही हॉर्मोन का निमार्ण करता है.

साइकोथेरेपी- सीबीटी या कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी साइकोथेरेपी का एक प्रकार है, जो एसएडी के इलाज में बेहद फायदेमंद होता है। इसमें पारम्परिक सीबीटी का इस्तेमाल एसएडी के लिए किया जाता है। इसमें व्यक्ति के नकारात्मक सोच या विचारों को पहचाना जाता है और बिहेवियर एक्टिवेशन नामक तकनीक से उसमें सकारात्मक सोच को प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे मरीज़ को अवसाद से निकलने में काफी राहत मिलती है।

एंटीडिप्रेसेन्ट- डिप्रेशन और कभी-कभी एसएडी के गंभीर मामलों में इलाज के लिए एंटीडिप्रेसेन्ट दवाएं दी जाती हैं। सर्दियों में अगर लक्षण शुरू होने से पहले ये दवाएं शुरू कर दी जाएं तो परिणाम बेहतर हो सकते हैं।

नोट: पटना की क्लीनिकल साइकॉलोजिस्ट डॉ. बिंदा सिंह से बातचीत के आधार पर यह स्टोरी लिखी गई है।

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