“एक तरफ धर्म दूसरी तरफ विकास, किसको चुनेगी दिल्ली की आवाम”

दिल्ली के पिछले (2015) विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के राजनीतिक कौशल्य की हवा केजरीवाल ने निकाल दी थी। उस चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में 67 सीटें मिलीं, तो भापजा को महज़ 3 सीटों पर संतोष करना पड़ा था।

अब इस बार केजरीवाल अपने पांच साल के काम के आधार पर मैदान में उतरे हैं, जिनमें उनके प्रमुख मुद्दे हैं- फ्री बिजली, फ्री पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यापक बदलाव, जिनकी सराहना देश-विदेश में भी हो रही है।

तो वहीं भापजा के पास कोई मुद्दा ही नहीं है और ना ही केजरीवाल के बराबर का कोई चेहरा है, जो केजरीवाल को चुनौती दे सके। जहां तक बात है दिल्ली भापजा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी की, तो उनका व्यक्तिगत चेहरा कहीं से भी केजरीवाल के आस-पास भी नहीं पहुंच सकता है कि वह केजरीवाल के सामने मुकाबला कर सकें।

जाति और धर्म के नाम पर चुनाव लड़ रही है भाजपा

लेकिन अब भाजपा इस चुनाव को जाति और धर्म के नाम पर अपने पक्ष में करने में लग गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह केजरीवाल के सामना करने के लिए मैदान में हैं। हां, भापजा को कुछ सीटों का फायदा हो सकता है।

भाजपा के पास वर्तमान में गिनती के लिए तो कई राज्यों में उनकी सरकारे हैं लेकिन बड़े राज्यों में केवल उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और असम में ही भाजपा की सरकार है। बाकी और जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है, वे सभी छोटे राज्य हैं।

इसकी वजह से बौखलाहट तो साफ दिखाई दे रही है। जिस भाजपा के लिए लग रहा था कि उसका हराना असंभव है, वह भाजपा एक झटके में बड़े राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में हार रही है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान गृह मंत्री अमित शाह मोहल्ले-मोहल्ले में जाकर सभा कर रहे हैं। इससे साफ समझ आ रहा है कि एक के बाद एक राज्य हारने के बाद भाजपा बहुत ज़्यादा बौखलाहट में है।

भाजपा के द्वारा चुनाव के समय में किया गया अधिकांश वादा ज़मीन पर उतर नहीं पाया है। इस सरकार ने हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा, हर राज्य में AIIMS खोलने, देश का काला धन वापस लाने का वादा और मंहगाई पर लगाम लगाने जैसे वादे किए थे। सबके सब भाजपा के वादे चुनावी जुमले साबित हुएं।

आज देश में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति है लेकिन भाजपा के पास अपनी कमियां दूर करने का एक हथियार है, जिसका इस्तेमाल वह हर चुनाव में करती रही है।

देशभर में भाजपा की स्थिति

2014 के लोकसभा चुनाव में जीत के बाद भाजपा का चुनाव चक्र चला। हर राज्यों में भाजपा को बड़ी कामयाबी मिली, भाजपा को एकाएक हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, असम, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बड़ी कामयाबी मिली।

वहीं मणिपुर, गोवा में कॉंग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर आई। मणिपुर के 60 सदस्यों वाली विधानसभा में कॉंग्रेस 28 सीट जीतने के बाद बहुमत के आंकड़ों से केवल 3 सीट पीछे थी लेकिन सरकार भाजपा की बनी गई। उसी प्रकार गोवा के 40 सदस्यों वाले विधानसभा में कॉंग्रेस को 17 सीटें मिली और 13 सीट जीतने वाली भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हो गई।

दरअसल, इन दोनों राज्यों में राज्य भवन का दुरुपयोग हुआ, जबकि राज्यपाल की यह ज़िम्मेदारी होती है कि सबसे बड़े दल को पहले सरकार बनाने का मौका दिया जाए लेकिन राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया और भापजा को सरकार बनाने में एक तरह से राज्यभवण का पूरा समर्थन मिला, जिसके दम पर सरकार बन गई।

वहीं अरुणाचल प्रदेश की घटना इन सबसे बिलकुल अलग थी, वहां पर कॉंग्रेस के पेमा खांडू मुख्यमंत्री थे, विधानसभा में कॉंग्रेस के 47 विधायक थे लेकिन मुख्यमंत्री खांडू समेत पीपीए के 33 विधायक बीजेपी में शामिल हो गएं। इस तरह भापजा को एक और राज्य की सत्ता मिल गई।

बिहार में भी भाजपा के खिलाफ नहीं चल सकी महागठबंधन की सरकार

बिहार में भाजपा को 2015 में महागठबंधन के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी लेकिन 20 महीने ही महागठबंधन की सरकार चल पाई थी। नितीश कुमार ने लालू यादव के भरोसे और बिहार की जनता के द्वारा दिए गए जनादेश के साथ धोखा किया और रातों-रात भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली और अपने को भाजपा के सामने गिरवी रख दिया।

“देश में बस एक ही पार्टी, भाजपा”

अब भापजा के दोनों सेनापति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे अमित शाह के सिर पर जीत का सेहरा बंधा। प्रिंट मीडिया और टेलीविज़न पर जमकर इन दोनों के राजनीतिक कौशल्या की चर्चा होने लगी। आम आदमी के मुंह से सुनने को मिलने लगा कि देश में अब किसी पार्टी का कुछ नहीं चलेगा, बस एक पार्टी है, भाजपा जो हर जगह राज करेगी।

प्रधानमंत्री ने भी चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि कॉंग्रेस मुक्त भारत होने जा रहा है। अब इस देश से कॉंग्रेस हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी।

फिर भाजपा के दिन बदलने लगे

अहंकार में चूर भाजपा को शायद यह नहीं पता था कि यह सत्ता किसी की बपौती नहीं होती है, कब किसको जनता कहां पहुंचा देगी, यह कोई नहीं जानता है। अभी पांच साल भी पूरे नहीं हुए थे कि यह चक्का उलटा घूमना शुरू हुआ।

सबसे पहला धक्का भाजपा को गुजरात में लगा, जिस गुजरात मॉडल के नाम पर 2014 में भाजपा को जीत मिली थी, उसी गुजरात विधानसभा चुनाव में किसी तरह भाजपा जीत पाई। अब बारी थी 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव की, भाजपा के लिए मज़बूत किला माने जाने वाले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा, साथ में राजस्थान का किला भी ढह गया।

कर्नाटक में चुनाव हुए, वहां भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी लेकिन बहुमत से दूर रह गई। वहां कॉंग्रेस, जेडीएस ने गठबंधन करके सरकार बनाई और कुमारास्वामी सिर्फ 37 विधायक और कॉंग्रेस के समर्थन से कर्नाटक के एक्सिडेंटल मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो गएं।

लेकिन इस सरकार को गिराने के लिए भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी, अंत में कॉंग्रेस-जेडीएस के 17 विधायकों को तोड़ने में कामयाब हो गई और अंत में कुमारस्वामी की सरकार विधानसभा में बहुमत नहीं सिद्ध कर पाई। कुमारास्वामी को इस्तीफा देना पड़ा, फिर भाजपा के बी.एस. येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो गएं।

लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा की रणनीति

भाजपा ने 2019 लोकसभा चुनाव को राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद मुद्दे को आधार बनाकर चुनाव लड़ी। यहां राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद कहीं-ना-कहीं विकास पर भारी पड़ा। भाजपा 2014 से अधिक मज़बूत पार्टी बनकर उभरी, अपने दम पर भाजपा पहली बार 300 प्लस का आंकड़ा पार करने में कामयाब हो गई।

अब फिर से चुनाव हुए महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में, इन तीनों राज्यों में भी भाजपा की सरकार थी और भाजपा ने आर्टिकल 370 और 35 A को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा लेकिन चुनाव नतीजों से भाजपा के लिए कोई खुशी देने वाला परिणाम नहीं मिला।

हरियाणा में कॉंग्रेस और भाजपा में मुकाबला कांटे का रहा। किसी को भी बहुमत नहीं मिल सकी। जेजेपी यहां पर किंगमेकर की भूमिका में थी। जेजेपी के समर्थन से भाजपा को सरकार बनाने में कामयाबी मिल गई। वहीं महाराष्ट्र के रन में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिला लेकिन मुख्यमंत्री के पद को लेकर खींच-तान में भाजपा-शिवसेना का गठबंधन टूट गया और शिवसेना को कॉंग्रेस-एनसीपी का समर्थन मिल गया, जिससे उद्भव ठाकरे का महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने का सपना भी पूरा हो गया और भाजपा के हाथों से महाराष्ट्र की सत्ता चली गई।

झारखंड का विधानसभा चुनाव हुआ, जिसमें भाजपा और महागठबंधन के बीच लड़ाई थी। महागठबंधन में कॉंग्रेस, जेएमएम और राजद थे। इस चुनाव में भी 65 प्लस का दावा करने वाली भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा।

हद तो तब हो गई जब भाजपा के मुख्यमंत्री भी चुनाव हार गएं और झारखंड में हेमंत सोरेन की अगुवाई में महागठबंधन सरकार बन गई।

भाजपा के इन उतार चढ़ाव वाले दौर के बीच अब देखना है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में उसकी क्या स्थिति होती है। धार्मिक रंग देकर अपनी विफलता की जवाबदेही से भापजा बच भी जाती है तो क्या चुनाव में इसका लाभ मिल पाएगा? अब दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद पता चलेगा कि दिल्ली की जनता ने किस मुद्दे के आधार पर अपनी सरकार का चुनाव किया है। एक तरफ धर्म दूसरी तरफ विकास।

 

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