“चुनाव जीतने के लिए अपनी राजनीतिक धारा से भटक गएं केजरीवाल”

भाजपा ने बहुत हाथ-पैर पटकने, काफी नफरत और सांप्रदायिकता फैलाने पर 8 सीटों पर जीत दर्ज कराते हुए पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव के मुकाबले 5 विधायकों की बढ़त बनाई, जबकि आम आदमी पार्टी ने 62 सीटों पर जीत हासिल की है।

दिल्ली के इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी जितनी सांप्रदायिक हो सकती थी वह हो गई। ऐसा पहली बार हो रहा था कि देश की राजधानी में ऐसे नारे और ऐसे भाषण दिए जा रहे थे। भाजपा और कॉंग्रेस ने शाहीन बाग और नागरिकता कानून को लेकर अपना पक्ष साफ तौर पर जनता के सामने रख दिया था।

नागरिकता कानून और शाहीन बाग के मुद्दे पर चुप रहें केजरीवाल

वहीं आम आदमी पार्टी ने संसद में नागरिकता कानून का विरोध किया लेकिन संसद से बाहर अपना पक्ष ठीक से स्पष्ट नहीं किया। अरविंद केजरीवाल ने इन मुद्दों पर अपना पक्ष ठीक से स्पष्ट ही नहीं किया, चाहे वह नागरिकता कानून से संबंधित हो, शाहीन बाग या जामिया हो लेकिन जब उनसे एक टीवी एंकर ने हनुमान चालीसा पढ़ने को बोला तो उन्होंने तुरंत पढ़ दिया।

एक विपक्ष के तौर पर जो काम विभिन्न राजनीतिक दलों को करना चाहिए उसे आज स्टूडेंट्स और महिलाएं कर रही हैं। जब उन स्टूडेंट्स पर पुलिस द्वारा बर्बरता की जाती है, तो उस राज्य का मुख्यमंत्री या शिक्षा मंत्री वहां जाता तक नहीं है, केवल एक ट्वीट से काम चला लेता है।

शाहीन बाग पर अरविंद केजरीवाल का बयान बहुत शर्मनाक था, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर दिल्ली पुलिस उनके पास होती तो 2 घंटे में शाहीन बाग खाली करवा देते। ‘आप’ एक विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पा रही है लेकिन जो उस भूमिका में है, ‘आप’ उनके भी खिलाफ है।

प्रदर्शनों से निकलकर आए केजरीवाल का आज प्रदर्शनों को समर्थन नहीं

केजरीवाल यह भूल जाते हैं कि आज जिन प्रदर्शनों को वह हटाने की बात कर रहे हैं, उन्हीं प्रदर्शनों के रास्ते से ही होते हुए वह दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे थे और इसी कारण आज तीसरी बार वह दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं।

बीजेपी राम का इस्तेमाल करती है, केजरीवाल ने हनुमान का किया इस्तेमाल

इस चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने एक नया प्रयोग भी किया, जिसका वह हमेशा से विरोध करते आए थे। इस चुनाव में वह बीजेपी की रामभक्ति के खिलाफ अपनी हनुमानभक्ति लेकर आ गएं। उनका मीडिया के साथ हनुमान मंदिर जाना और एक चैनल पर हनुमान चालीसा पढ़ने तक तो ठीक था। लेकिन आप के विधायक सौरभ भारद्वाज ने NDTV पर रवीश कुमार के शो पर यह दावा किया कि उनके कार्यकर्ता जगह-जगह जय हनुमान के नारे लगाते थे।

ये नारा भाजपा के जय श्रीराम नारे के सामने या उससे प्रेरित होकर गढ़ा गया था। एक सेक्युलर पार्टी द्वारा ऐसे नारे लगाना और उसके मुखिया द्वारा इसी तरह का धार्मिक भाषण देना, थोड़ा सोचने पर मजबूर करता है। 

चुनाव जीतने के बाद केजरीवाल का अपने राजनीतिक मंच से यह कहना कि उनका साथ बजरंगबली ने दिया, तो उनके भाषण का यह हिस्सा योगी आदित्यनाथ के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान के एक भाषण के उस हिस्से से मिलता हुआ था, जिसमें उन्होंने यह कहा था कि उनके साथ अली नहीं बजरंगबली है।

दोनों नेताओं का इतिहास और राजनीति बिल्कुल अलग है। दोनों में समानता स्थापित नहीं की जा सकती है लेकिन दोनों भाषणों में यह समानता है कि दोनों ही भाषणों में बजरंगबली को राजनीतिक मंच से अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल किया गया।

कश्मीर से 370 हटाए जाने पर केंद्र सरकार का दिया था समर्थन

अब थोड़ा 6 महीने पीछे जाते हैं, जब भाजपा की केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर राज्य को दो हिस्सों में विभाजित करके उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया था। अरविंद केजरीवाल जो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का अक्सर परचम बुलंद करते हैं, उन्होंने केंद्र सरकार के इस कदम का स्वागत और समर्थन यह कहते हुए किया था कि इससे क्षेत्र में शांति स्थापित होगी।

370 हटे हुए अब 6 महीने से ज़्यादा का समय बीत गया है। कश्मीर के लोग अब भी बिना इंटरनेट के कर्फ्यू में ज़िंदगी बिता रहे हैं लेकिन केजरीवाल इस पर भी कुछ नहीं बोले।

शरजील इमाम पर भी केजरीवाल का निराशाजनक रवैया

दिल्ली चुनाव से पहले शरजील इमाम का मुद्दा ज़ोर पकड़े हुए था। शरजील जो कि सिर्फ चक्का जाम करने की बात कर रहा था जो कि प्रदर्शनों का एक तरीका हुआ करता था। इसको अपनाते हुए आज़ादी से पहले और बाद में देश में कई प्रदर्शन हुए हैं। उस चक्का जाम को देशद्रोह का नाम देकर उसपर देशद्रोह के मुकदमे कर दिए गएं। केजरीवाल इसपर यह कहते हैं कि शरजील असम को देश से अलग करके देश तोड़ने की बात कर रहा है, इसलिए गृहमंत्री की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि उसे जल्द-से-जल्द गिरफ्तार किया जाए।

शरजील इमाम

जबकि पूरा वीडियो देखने पर पता चलता है कि वह सिर्फ चक्का जाम करने की बात कर रहा था। हालांकि उस बयान से कोई भी असहमत हो सकता है मैं भी हूं लेकिन उसने देश तोड़ने जैसी कोई बात कही ही नहीं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि जो अरविंद केजरीवाल शरजील के धर्म की वजह से उसको लेकर ऐसे बयान देते हैं, उन्हीं की सरकार ने सवर्ण क्रांतिकारी नेता कन्हैया कुमार की फाइल अभी तक रोक रखी है। अब इसे केजरीवाल का इस्लामोफोबिया नहीं कहे तो क्या कहें?

भाजपा के नेताओं ने केजरीवाल को आतंकवादी तक भी कहा। इसके बावजूद वह अपने मुद्दों की बात करते रहें। राजनीति में मुद्दों की ही बात होनी चाहिए लेकिन केजरीवाल ने अपने चुनाव में एक बार भी प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना नहीं साधा, जबकि इसके लिए केजरीवाल के पास नागरिकता कानून जैसे मुद्दे थे।

370 और शरजील जैसे मुद्दों पर सरकार का साथ देते हुए, शाहीन बाग, जामिया और नागरिकता कानून पर चुप्पी साधते हुए, नरेंद्र मोदी के बारे में मौन रहते हुए और हनुमानभक्ति की राजनीति करते हुए केजरीवाल ने बहुत हद तक हिन्दू बहुसंख्यक आबादी और लोकसभा में भाजपा को वोट देने वाले वोटरों को अपने साथ लाने का प्रयास किया है, जिसमें वह सफल भी होते हुए मालूम दिखते हैं।

चुनाव के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि केजरीवाल अब नागरिकता कानून के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों को लेकर क्या रुख अपनाते हैं। क्या वह भी कई गैर-भाजपा सरकारों की तरह दिल्ली विधानसभा में नागरिकता कानून के विरोध में रिज़ॉल्यूशन पारित करवाएंगे या नहीं।

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