क्यों ‘गली बॉय’ फिल्मफेयर के इतने अवॉर्ड्स डिज़र्व करती है

रैपिंग दुनियाभर में संगीत का एक पॉपुलर फॉर्म है। यह गलियों से ऊपर उठकर आया और अब समाज के हर वर्ग में पसंदीदा संगीत फॉर्म बन गया है। भारत में भी रैपिंग में डिवाइन और नेज़ी ने काफी नाम कमाया है।

ज़ोया अख्तर की पुरस्कृत ‘गली बॉय’ इसी दुनिया को महसूस कराने वाली शानदार फिल्म है। गली बॉय झुग्गी बस्ती में रहने वाले एक साधारण शख्स की कहानी है, जिसकी ज़िन्दगी काबिलियत के दम पर बदल जाती है। इस फिल्म फेयर अवॉर्ड में “गली बॉय” को 13 अवॉर्ड मिले हैं। जिसके बाद कई लोग इसकी आलोचना भी कर रहे हैं कि एक ही फिल्म को इतने अवॉर्ड मिलना सही नहीं है। चलिए इसी बीच ये जानते हैं कि गली बॉय इतने अवॉर्ड्स डिज़र्व करती है या नहीं।

मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ का शुमार हिंदी सिनेमा की फिल्मों में से एक है। मुंबई की झुग्गियों में सांस लेने वाली कठिन ज़िन्दगियों का यथार्थ इससे बेहतर शायद ही दिखाया गया हो। अस्सी की दशक में आई यह फिल्म यथार्थ का जादुई असर रखती है।

 

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रणवीर सिंह की फिल्म के निर्माण में सलाम बॉम्बे ज़रूर पहली प्रेरणा रही होगी, क्योंकि हम ‘गली बॉय’ देखते वक्त झोपड़-पट्टियों से पटी पड़ी धारावी को सांस लेते हुए महसूस कर पाते हैं।

सिनेमेटोग्राफर जय ओज़, प्रोडक्शन डिज़ाइनर सुज़ैन ने धारावी के जीवन को जीवंत दिखाया है लेकिन स्वयं ज़ोया भी धारावी को एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर नज़रशानी करती नहीं मालूम होती हैॆ। उन्होंने फिल्म को झुग्गियों में पले-बढ़े किसी शख्स की तरह दिखाया है। फिल्म के पीछे यह मेहनत ही दरअसल उसे खास कर गई है। फिल्म धारावी को भी एक किरदार मानकर चली है।

धारावी के मुराद की कहानी है ‘गली बॉय’

कहानी मुंबई के धारावी के मुराद (रणवीर सिंह) की है। मुराद की मेडिकल स्टूडेंट, सफीना (आलिया भट्ट) से दोस्ती है। सफीना रूढ़िवादी उच्च मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जबकि मुराद एक मामूली से मुस्लिम परिवार का है।

एक दिन उसकी मुलाकात रैपर एमसी शेर (सिद्धांत चतुर्वेदी) से होती है। शेर मुराद को रैप करने के लिए प्रेरित करता है। यहीं से उसकी ज़िन्दगी में बदलाव की नींव पड़ जाती है। इसके बाद आगे क्या होता है, यह बाकी फिल्म की कहानी है।

गरीबी से उठकर शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचने वाले रैपर्स के जीवन से प्रभावित ‘गली बॉय’ भीड़ में खोए हुनरमंदों की कहानी है। एक साधारण से ड्राइवर के लड़के मुराद (रणवीर सिंह) के अपने सपनों को पहचानने की कहानी है। मुराद सपनों को पंख देकर उड़ना सीखता है। फर्श से अर्श तक का सफर तय करता है।

मुराद के रूप में परफेक्ट रोल अदा किया है रणवीर ने

अभिनय पक्ष की बात करें तो सबसे पहले शीर्षक रोल करने वाले रणवीर सिंह की तरफ ध्यान जाता है। मुराद के रूप में रणवीर ने किरदार की बारीकियों को नज़दीक से पकड़ा है। रैपर के रूप में वह छा गए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वह महज़ भूमिका निभा रहे हैं।

वहीं आलिया भट्ट भी फॉर्म में नज़र आईं। दोनों मुख्य लीड कलाकारों ने कमाल का काम किया है। हालांकि सहायक अभिनेता सिद्धान्त चतुर्वेदी अपने अभिनय से सभी को चौंकाते हैं। वहीं मुराद के पिता के रोल में विजय राज ने भी ध्यान आकर्षित करने वाला काम किया है। एक बेहतरीन फिल्म का धीरे-धीरे हरेक पहलू दमदार महसूस होने लगता है।

सामान्यतया गली बॉय किस्म की कहानियां की थीम ऐसी ही होती हैं। फिल्म खेल आधारित हो या फिर संगीत, उनकी पटकथा दरअसल कामयाबी की कहानी होती है।

ज़्यादातर सक्सेस स्टोरीज़ खास तकनीक का उपयोग करती हैं। ज़ोया अख्तर की ‘गली बॉय’ में भी वही तमाम बारीकियां देखने को मिलती हैं। रीमा कागती और ज़ोया अख्तर की कहानी बांधे रखने वाली है। मुराद का किरदार और उसके आस-पास की दुनिया का बारीकी से चित्रण है। फिल्म जुनून, महत्वाकांक्षा को दर्शाती है साथ ही गरीबी, सामाजिक स्तर, बाल अपराध, बहु-विवाह इत्यादि पर भी टिप्पणी करती है किन्तु मुख्य स्वर ज़िन्दगी की जीत में यकीं है।

रीमा कागती-ज़ोया अख्तर की पटकथा इसे बहुत प्रेरक फ्रेम से दिखाती है। यह कहानी अपने जुनून को पूरा करने की है। उसके पीछे तब तक भागने की है, जब तक वो सच्चाई ना बन जाए। हर मुश्किल का सामना करके अपनी किस्मत पलटना फिल्म का सार है। रैप की जड़ें अमेरिका को जाती हैं, वहां जब रैप म्यूज़िक आया तो उसके जनकों को अंदाज़ा भी नहीं था कि वो दबी-कुचली आवाज़ों को कितनी बड़ी शक्ति दे रहे हैं। भोगे हुए यथार्थ को अपने समूचे रॉ-फॉर्म में पेश करने की छूट रैप देता है। अभिव्यक्ति का ऐसा अनूठापन कहीं दूसरी जगह नहीं है।

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