#Periodपाठ: स्वस्थ नारी स्वस्थ देश – हक़ से स्वस्थ

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सेवा में ,

श्रीमान जिला कलेक्टर महोदय,

जयपुर (राजस्थान )

विषय – मासिक धर्म (माहवारी ) स्वच्छता प्रबंधन एवं जागरूकता के सम्बन्ध में।

प्रिय,

जोगाराम जांगिड़ जी।

मैं एक गैर सरकारी संगठन मिट्टी (MIITTI FRAGRANCE OF THE NATION ) में कार्यरत हूँ जो कि राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण जीवन की आधारभूत विसंगतियों ( शिक्षा ,कृषि ,स्पोर्ट्स और महिला सशक्तिकरण की दिशा में कार्य करता है।

महोदय मैंने राजस्थान के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करते हुए अनुभव किया कि लैंगिक असमानता ग्रामीण जीवन की सामाजिक स्तर पर सबसे बड़ी समस्या है। लैंगिक असमानता में जो महिलाओं से सम्बंधित सबसे बड़ी समस्या मासिक धर्म (माहवारी ) एवं स्वच्छता प्रबंधन से जुडी हुई है जो आज भी आजादी के 71 सालों के बाद भी ग्रामीण जीवन की सामाजिक व्यवस्था में अन्धविश्वास,गलत धारणाओं एवं पुरानी रूढ़ियों की संस्कृति के आवरण में मौजूद है। मासिक धर्म के बारे में शारीरिक विज्ञान, अवैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामजिक स्तर पर असमानता एवं अन्धविश्वास ,जागरूकता के अभाव के कारण इसका प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर पड़ता है।

मासिक धर्म (माहवारी ) महिलाओं एवं किशोरियों से जुडी एक शारीरिक प्रक्रिया है जो कि महिलाओं की गरिमा एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं का एक अभिन्न अंग है।

भारत में 355 मिलियन मासिक धर्म वाली महिलाओं की संख्या है जो कि हमारे देश की आबादी का 30 % है। हमारे समाज में शुरू से ही मासिक धर्म ( माहवारी ) प्रक्रिया को एक शर्म का विषय माना जाता है। इन गलत धारणाओं एवं अंधविश्वासों के कारण ग्रामीण ही नहीं शहरी क्षेत्रों की महिलाएं और लड़कियाँ भीअपने परिवार में  खुल कर शर्म और झिझक के कारण शरीर में होने वाली शारीरिक प्रक्रिया मासिक धर्म के बारे में बात नहीं करती। जिसके कारण ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में महिलाएं गंदे कपडे, बिना स्वच्छता के उपयोग करती हैं। ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में महिलाओं, लड़कियों को मासिक धर्म की अवधि में सामाजिक जीवन के स्तर से बहिष्कृत कर दिया जाता है।  केवल ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियां या महिलायें ही मासिक धर्म के बारे में बात करने पर शर्माती ,असहज महसूस करती है वरन शिक्षित लड़कियां ,महिलाएं ,स्कूल के अध्यापक, कॉलेज यहां तक कि चिकित्सा क्षेत्र में कार्य करने वाले चिकित्साकर्मी मासिक धर्म के बारे में खुल के बात करने पर असहज होते हैं।

एक गैर सरकारी संगठन दसरा जो कि महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में कार्यरत है उसकी एक रिपोर्ट बताती है कि हर साल हमारे देश में 23 मिलियन लड़कियां मासिक धर्म एवं उससे जुडी जानकारी एवं जागरूकता के अभाव में अपनी पढाई बीच में ही छोड़ देती हैं। इस रिपोर्ट के और भी चौकाने वाले तथ्य ये भी हैं कि 70 % महिलाएं अपनी बेटियों को मासिक धर्म (माहवारी ) को एक दूषित प्रक्रिया के रूप में बताती हैं और  ठीक वही दूसरी ओर 71 % किशोरवय लड़कियां मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन के बारे में जानती ही नहीं।

मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन की जानकारी एवं जागरूकता के अभाव के कारण महिलाएं एवं लड़कियां विभिन्न बीमारियों, असहनीय दर्द, सर्वाइकल कैंसर, पीरियड अनियमितता, खून की कमी ,मानसिक एवं प्रजनन क्षमता पर प्रभाव आदि से ग्रसित रहती हैं।

यूनिसेफ की 2014 की एक रिपोर्ट बताती है की तमिलनाडु राज्य में 79 % लड़कियां मासिक धर्म एवं  इससे जुडी प्रक्रिया से अनजान थी। ठीक यह आंकड़ा कुछ राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश में  66 %,राजस्थान में 56 % पश्चिम बंगाल में 51 %  है।

 

एक रिपोर्ट के अनुसार 2002 ,2005, 2008 ,2012 के सर्वेक्षण में पाया गया कि हमारे देश में महिलाओं से जुडी हुई बीमारियो  में  उनका मुख्य कारण मासिक धर्म के बारे में जानकारी का अभाव एवं उससे जुडी हुई सामाजिक भ्रांतियां थी। देश में हर साल 60,000 सर्वाइकल कैंसर का आंकड़ा है इसमें से दो तिहाई भाग मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन की सुविधाओं की कमी एवं जागरूकता के अभाव के कारण होते हैं।

WHO  और UNICEF ने 2014 में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन के बारे में जागरूकता और महिलाओं की बुनियादी सुविधाओं और उनके मूलाधिकारों की रक्षा के लिए 28 मई को मासिक धर्म स्वच्छता दिवस बनाने एवं   वैश्विक स्तर पर अन्य देशों के लिए दिशा निर्देश जारी किये। जिससे आमजनमानस एवं महिलाओं में मासिक धर्म (माहवारी ) के बारे में सामाजिक स्तर पर फैली हुई प्राचीन रूढ़ियाँ ,प्रथाएं के बारे में जागरूकता फैले।

 

सरकार ने आमजनमानस एवं महिलाओं को जागरूक करने के लिए अनेक योजनाएं ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में चला रखी हैं। स्वच्छ भारत अभियान के मुख्य सिद्धांतों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन मुख्य रूप से था इसलिए सरकार ने मासिक धर्म एवं महिलाओं से जुडी हुई बुनियादी सुविधाओं को प्रमुखता से रखा गया जिसके चलते पूरे भारत में शौचालय निर्माण  एवं जन जागरूकता का कार्य किया। सरकार अब समाचार पत्रों, टी वी, रेडियो और मीडिया के माध्यम से इस के बारे में जन अभियान चला रही है ।  जिसके चलते आमजनमानस में धीरे धीरे जागरूकता आने लगी है जिससे महिलाएं एवं लड़कियां इस के बारे में खुल के बात कर रही हैं। मासिक धर्म से जुड़े अपने अनुभवों को दूसरों को बता कर जागरूकता कर रही हैं । अब महिलाये अपने अधिकारों एवं बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज उठाने लगी हैं, अब स्कूल, कॉलेज में खुले मंच पर समाज में फैली हुई सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देने लगी हैं। अब महिलाएं और पुरुष सेक्स ,मासिक धर्म ( माहवारी ) जैसे मुद्दों पर खुल के बात करने लगे हैं और महिला सशक्तिकरण की दिशा में महिलाओं के संघर्ष एवं उनकी आवाज को मुखर कर रहे हैं। #OpenLetterContest

लेकिन फिर भी आज ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर मासिक धर्म एवं महिलाओं से जुडी हुए बुनियादी सुविधाओं की कमी, जागरूकता का अभाव है। इसके लिए हमें अपने सामाजिक, पारिवारिक स्तर पर इस से जुडी हुई प्रक्रिया पर खुल के बात करने की आवश्यकता है जिससे हमारे सामाजिक स्तर में सुधार आये। सरकार ने विशेषतया ग्रामीण क्षेत्रों में मासिक धर्म एवं महिलाओं की बुनियादी सुविधाओं के लिए  “सुविधा ” नाम से सेनेटरी पैड उचित दाम पर उपलब्ध करने ,आशा सहयोगिनियों ,आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को विशेष प्रशिक्षण देने के नजदीकी स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रबंध किये हैं। स्कूलों, कॉलेजो में महिलाओं की सुरक्षा एवं उनके अधिकारों के लिए राज्यों को विशेष दिशा निर्देश दे रखे हैं।#OpenLetterContest

सबरीमाला मंदिर वाद जो महिलाओं के अधिकारों से सम्बंधित था। यह प्रथा सदियों से प्रचलित थी इस  प्रथा में महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने पर रोक थी इसलिए कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं ने इस पर जनहित याचिका उच्चतम न्यायलय में दायर की जिसके अंतिम निर्णय में न्यायालय ने इस प्रथा को महिलाओं के सामाजिक जीवन स्तर पर कलंक माना और मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने की अनुमति दी जिससे महिला सशक्तिकरण को एक नयी दिशा मिली है।  कुछ स्वयं सेवी संस्थायें एवं कुछ गैर सरकारी संगठन महिलाओं की आवाज को उठाने एवं उनके जीवन स्तर को स्वस्थ बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं उन के इस साहस एवं जज्बे  को मैं सलाम करता हूँ।

कुछ फिल्मकारों ने भी ऐसी सामाजिक बुराइयों जो हमारे समाज में फैली हुई  हैं उन प्रथाओं के लिए सामाजिक जागरूकता जनहित में प्रसारित करने के लिए अपना अमूल्य योगदान दिया है।  श्री नारायण सिंह ने  टॉयलेट एक प्रेम कथा,  आर बाल्की ने मासिक धर्म ( माहवारी ) से जुडी हुई भ्रान्तिओं को दूर करने के लिए  पैडमैन  एवं गुनीत मोंगा ने 2018 में  पीरियड एन्ड ऑफ़ सेंटेंस  नाम की डाक्यूमेंट्री बनाई जिसे बेस्ट डाक्यूमेंट्री का ऑस्कर अवार्ड मिला  जिसमें उन्होंने महिलाओं के नारकीय संघर्ष को वैश्विक स्तर पर दिखाया और उनके अधिकारों की आवाज को दिशा दी।

मैं अपने अनुभवों एवं विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों के कार्य करने के दौरान जिन समस्याएं को देखा एवं जमीनी स्तर पर फैली हुई सामाजिक रूढ़ियों ,प्रथाओं के बारे में जागरूकता फैलाने एवं इन मुद्दों पर खुले तौर पर बात करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव साझा करना चाहूंगा जो कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में कारगर साबित होंगे। #OpenLetterContest

1 . सरकारी एवं गैर सरकारी विद्यालयों ,कॉलेजों में महिलाओं की सुरक्षा एवं उन की बुनियादी सुविधाओं ( स्वच्छ अलग पुरुष महिला शौचालय एवं उन की बुनियादी सुविधाओं के लिए एक मेडिकल किट ,एक कॉउंसलर उन की समस्याओं एवं उनके समाधान )के लिए एक वीमेन सेल होनी चाहिए जिससे महिलाओं एवं लड़कियों में आत्मविश्वास आये जिससे वो अपने मूलाधिकारों एवं अपनी बुनियादी सुविधाओं के बारे में जागरूक हो।

2. सरकारी एवं गैर सरकारी विद्यालयों ,कॉलेजों , सार्वजनिक स्थानों जैसे रेल्वे स्टेशन ( देश का भोपाल पहला जिला है जिसने महिलाओं की बुनियादी अधिकार के लिए रेल्वे स्टेशन पर सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन लगाई हैं जिसे उन्होंने हैप्पी नारी का नाम दिया है )  बस स्टैंड, पार्क में महिलाओं की सुरक्षा के लिए सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन लगायी जाए जिससे वो मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन में अपनी सहभागिता निभाए।

3. सरकारी एवं गैर सरकारी विद्यालयों  विशेषतया रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महीने के दो शनिवार की बाल सभा में  स्वास्थ्य से सम्बंधित चर्चा की जाए जिससे जमीनी स्तर एवं वहां के स्थानीय लोगों की मानसिकता में परिवर्तन आये।

4. हमारी शिक्षा नीति में पुरुष एवं महिलाओं के विभेद को समाप्त करने के लिए पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा का विषय एवं उन से जुडी भ्रांतियों को दूर करने एवं जागरूकता के लिए जोड़ा जाये।

5. सरकारी एवं गैर सरकारी विद्यालयों ,कॉलेजों में दो महीने में एक बार कार्यशालाएं ,संगोष्ठी एवं स्वास्थ्य जांच चिकित्सा कैंप लगवाए जाए जिनसे समय समय पर उन की चिकित्सीय जाँच हो सके और वो स्वस्थ भारत का निर्माण कर सके।

6. ग्रामीण एवं शहरी नगर प्रशासन अपने अपने स्तर पर महिलाओं से जुड़े जन संवादी कार्यक्रम कराये जाए जिससे महिला सशक्तिकरण को बल एवं महिलाओं को सम्मान मिले।

7. हम अपने पाठ्यक्रम की पाठ्य नीति में ऐसे स्वाबलंबी कार्यक्रमों को प्रमुखता दे जिससे सरकारी एवं गैर सरकारी विद्यालयों के बच्चों का सर्वांगीण विकास  एवं उनके जीवन के लिए एक स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो सके।

8. देश का हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वो महिलाओं का सम्मान करे ,महिला विरोधी प्रथाओं का विरोध करे, स्थानीय स्तर पर अपने परिवार एवं अपने आस पास के लोगों को सामाजिक स्तर पर व्याप्त बुराइयो के बारे में जागरूक करे।

9. सेनेटरी पैड वेस्ट मैनेजमेंट के कारगर तरीको पर भी ध्यान दे क्योंकि सेनेटरी पैड के उपयोग के बाद उसके सुनियोजित तरीके से निस्तारण के उपाय ना होने के कारण इस वेस्ट से टॉक्सिक फुम्स फैलता है जिससे भी महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए अच्छी गुणवत्ता वाले बायो रीसाइकिल पैड बनाये जाए जिससे उनकी पहुंच और खपत अधिक होगी।

10 . सेनेटरी पैड पर लगने वाले 12 % कर को भी महिलाओं का बुनियादी अधिकार होने के कारण हटाया जाए उसे एक महिला के बुनियादी अधिकार जैसे – बिंदी,  सिन्दूर ,मंगलसूत्र के जैसे माना जाए।

11 . ग्रामीण एवं शहरी नगर प्रशासन को महिलाओं से जुडी हुई सभी योजनाओं की समीक्षा के लिए एक कमेटी का गठन किया जाए जिसमे उस योजना से जुड़े अधिकारी एवं सदस्यों के साथ एक स्थानीय व्यक्ति को कमेटी में जोड़ा जाए जिससे उन योजनाओं की जमीनी स्तर पर समीक्षा हो सके।

12 . विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को महिला शिक्षा एवं उनके सशक्तिकरण की दिशा में मजबूती प्रदान करने के लिए  हर 28 मई को सरकारी गैर सरकारी विद्यालय ,कॉलेजो में मासिक धर्म स्वच्छता पखवाड़ा के एक सप्ताह का कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए जाये।

 

इसलिए मेरा आप से पुरजोर निवेदन है कि आप शिक्षा एवं पंचायती राज विभाग के साथ मिलकर इन सुझावों पर कार्य करें जिससे महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहन मिले क्योंकि  ” एक स्वस्थ नारी ही एक स्वस्थ देश का निर्माण करती है।  ”

आपके जवाब की प्रतीक्षा रहेगी।

भवदीय

चक्रेश धाकड़

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