महिला दिवस पर पीएम मोदी का सम्मान ठुकराने वाली लिसिप्रिया कौन हैं

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8 मार्च को देश अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा था। भारत सरकार द्वारा कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, जिनका उद्देश्य महिला सशक्तिकरण से संबंधित विषय पर चर्चा करना था।

उन कार्यक्रमों के ज़रिये महिलाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने के लिए प्रोत्साहित करना था, समाज को उनकी अहमियत के बारे में सार्वजनिक चर्चा करने का दिन था।

इसी कड़ी में भारत सरकार द्वारा 3 मार्च को #SheInspiresUs मुहिम चलाई गई। इस मुहिम का उद्देश्य था ऐसी महिलाओं को ढूढंना जो अपने काम के ज़रिये लोगों में प्रेरणा बन गई हैं।

3 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट करके ऐलान किया कि 8 मार्च को मेरे सोशल मीडिया अकाउंट्स प्रेरणादायक महिलाओं को समर्पित किए जाएंगे।

लिसिप्रिया कंगजुम ने क्यों ठुकराया पीएम मोदी का सम्मान?

लिसिप्रिया कंगजुम
लिसिप्रिया कंगजुम। फोटो साभार- सोशल मीडिया

इस मुहिम के अंतर्गत 7 मार्च को भारत सरकार द्वारा, पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की 8 वर्षीय जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता लिसिप्रिया कंगजुम को भी शामिल किया गया।

लिसिप्रिया को 8 मार्च के दिन उनके कामों के लिए सम्मानित करने का प्रस्ताव भारत सरकार के तरफ से आया लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

इसके बाद सोशल मीडिया पर भूचाल मच गया। एक तरफ कुछ लोग उनके इस निर्णय की सराहना कर रहे थे, तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग आलोचना भी कर रहे थे।

लिसिप्रिया का कहना है कि सरकार मेरी बात सुनती नहीं है और आज उन्होंने मुझे प्रेरणादायक महिलाओं की श्रेणी में शामिल किया है। लिसिप्रिया की बातों से स्पष्ट होता है कि वह अपने कामों के लिए किसी सम्मान की इच्छा नहीं रखती हैं।

क्या हैं लिसिप्रिया की मांगें?

लिसिप्रिया
लिसिप्रिया कंगजुम। फोटो साभार- सोशल मीडिया

लिसिप्रिया एक पर्यावरण कार्यकता हैं, जो भारत सरकार से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाने की मांग को लेकर जुलाई 2018 से आंदोलन चला रही हैं। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अगर हम वक्त रहते सचेत नहीं हुए, तो आने वाले भविष्य में यह हमारे लिए सबसे बड़े संकट के रूप में नज़र आएगा।

23 सितंबर 2019 को यूनाइटेड नेशन द्वारा क्लाइमेट ऐक्शन सम्मिट आयोजित किया गया था। भारत ने भी इस सम्मिट में हिस्सा लिया था। भारत के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा था,

हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हम जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। बात करने का समय खत्म हो गया है, दुनिया को अब काम करके दिखाना होगा।

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ काम करने की बात तो लिसिप्रिया भी जुलाई 2018 से कह रही हैं लेकिन उनकी चिंता को सरकार की ओर से नज़रअंदांज़ किया कर दिया जा रहा है। शायद जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर सरकार की ओर से सकारात्मक रुख ना पाकर, लिसिप्रिया ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रस्तावित सम्मान को अस्वीकार करने का निर्णय लिया होगा।

इससे पहले लिसिप्रिया स्कूल छोड़कर क्लाइमेट चेंज के खिलाफ अभियानों का नेतृत्व कर चुकी हैं। गौरतलब है कि लिसिप्रिया कंगजुम डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम अवॉर्ड और भारत शांति पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी हैं।

जलवायु परिवर्तन का अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है?

फोटो साभार- सोशल मीडिया
फोटो साभार- सोशल मीडिया

हाल के दिनों में भारत के गुजरात और राजस्थान में कई ऐसे इलाके देखे गए, जहां टिड्डीयों के हमलों के कारण फसल की बर्बादी हुई है। इसका ज़िम्मेदार जलवायु परिवर्तन को बताया जा रहा है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण बेमौसम बारिश हो रही है, जिससे टिड्डों की संख्या काफी बढ़ गई है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले वर्ष टिड्डी हमलों के वजह से 3,92,093 हेक्टयर ज़मीन की हरियाली खराब हो गई थी।

जलवायु परिवर्तन के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है। सेंटर फॉर रिसर्च एंड क्लीन एयर और ग्रीनपीस द्वारा जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक हर साल भारत की अर्थव्यवस्था को 1.05 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त भार उठाना पड़ता है। इससे देश में विकास से जुड़े संकट सामने आने लगते है।

शरणार्थियों की मुश्किलें भी बढ़ रही हैं

फोटो साभार- सोशल मीडिया
फोटो साभार- सोशल मीडिया

इन दिनों शरणार्थियों को नागरिकता देने के मसले पर खूब राजनीति हो रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण लोग विस्थापित होने के लिए मजबूर हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं आ जाती हैं, जिससे लोग स्थाई तौर पर अपना घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

वर्ल्ड माइग्रेन रिपोर्ट 2020 के मुताबिक सबसे ज़्यादा लोग भारत में विस्थापित हुए हैं। दुनियाभर में इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। अगर समय रहते हैं जलवायु परिवर्तन के खिलाफ ठोस पहल नहीं हुई तो वैश्विक स्तर पर शरणार्थियों के लिए संकट बढ़ जाएगा।

तो क्या जलवायु परिवर्तन के कारण 10 करोड़ लोग गरीब हो जाएंगे?

गरीबी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

जुलाई 2019, में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया था कि देशभर में पिछले पांच सालों से एक करोड़ नौ लाख पेड़ काटे गए एवं विरोध करने पर कई लोगों को गिरफ्तार भी किया गया।

6 अक्टूबर 2019 को मुंबई में 60 घंटे के अंदर 2,141 पेड़ काटे गए। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में यह सब कुछ स्वीकार्य नहीं है। सरकार को इस मसले पर गंभीरता दिखाने की ज़रूरत है।

हाल में वैज्ञानिकों ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इस बार अत्यधिक गर्मी पड़ने वाली है। वर्तमान में लगभग 110 करोड़ लोग गर्मी का समाना करने में असमर्थ हैं। वैज्ञानिकों ने बताया है कि भविष्य में इन परिस्थितियों से निपटने के लिए मौजूदा स्थिति में नए प्रयोग करने होंगे।

आईएफडी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन 2030 तक तकरीबन दस करोड़ लोगों को गरीबी की गर्त में धकेल देगा। इससे आने वाले भविष्य में गरीबी घटने के बजाय बढ़ने के संकट दिखते है। प्राकृतिक आपदाएं भी इस गरीबी को बढ़ावा देती हैं।

हमारे देश में ज़्यादातर लोग जीविकोपार्जन के लिए किसानी पर निर्भर रहते हैं। जलवायु परिवर्तन की चपेट में कृषि भी आ चुका है। जलवायु परिवर्तन की चपेट में ना सिर्फ ज़मीन है, बल्कि समुन्द्र भी आ चुके हैं। पिछले दो दशकों के दौरान समुन्द्र में तेज़ी का प्रवाह देखा गया है।

क्लाइमेट चेंज कानून की आखिर क्यों है ज़रूरत?

फोटो साभार- सोशल मीडिया
फोटो साभार- सोशल मीडिया

जलवायु परिवर्तन की वजह से संकटों की सूची लंबी होती जाएगी लेकिन इन संकटों से निपटने के लिए हमारे पास उपायों की कमी हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूनाइटेड नेशन में जाकर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ काम करने का आश्वासन देकर आते हैं लेकिन 8 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता लिसिप्रिया की मांग को नज़रअंदाज़ कर देते है।

जिस तरह की परिस्थिति पर्यावरण में बन चुकी है, इसको ध्यान में रखते हुए भारत की संसद को क्लाइमेट चेंज कानून बनाना ही पड़ेगा, नहीं तो स्थिति गंभीर ही जाएगी। अभी पर्यावरण से संबंधित विभिन्न रिपोर्ट हमें आगामी भविष्य के संकट के बारे में आगाह कर रहे हैं, सरकार वक्त रहते नहीं गंभीर होती है तो परिणाम भयावह होंगे।

लिसिप्रिया अपने लक्ष्य को लेकर केंद्रीत हैं। संसद के बाहर वो पोस्टर लेकर सरकार से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाने की मांग कर चुकी हैं। महिला दिवस के एक दिन पहले प्रस्तावित सम्मान को अस्वीकार करके उन्होंने अपने आंदोलन को धार दिया है।

जब लिसिप्रिया ने सरकार द्वारा प्रस्तावित सम्मान स्वीकारने से मना कर दिया, तो कुछ नेताओं ने अपनी राजनीति साधनी शुरू कर दी। उन्होंने जवाब में कहा कि प्रिय राजनेताओं और राजनीति पार्टियों, मुझे इसके लिए तारीफ नहीं चाहिए। इसके बजाय अपने सांसदों से कहिए कि मौजूदा सत्र में मेरी आवाज़ उठाएं। मुझे अपने राजनीतिक लक्ष्य और प्रोपगेंडा साधने में इस्तेमाल मत कीजिएगा। मैं आपके पक्ष में नहीं हूं।

लिसिप्रिया के बयान से स्पष्ट जाता है कि वो किसी राजनीतिक दल का टूल नहीं बनने वाली हैं मगर हां उन्होंने नेताओं की राजनीतिक दुकान को बंद ज़रूर कर दिया है।

पर्यावरण के प्रति कितने गंभीर हैं हमारे राजनेता?

नरेन्द्र मोदी
नरेन्द्र मोदी।

भारत जैसे विकासशील देश में पर्यावरण से संबंधित मुद्दे को राजनीतिक तरजीह नहीं मिलती है। अगर हमारे राजनेता पर्यावरण के प्रति थोड़े भी गंभीर होते तो हाल में हुए आम चुनाव 2019 के चुनाव प्रचार में ‘जलवायु परिवर्तन’ शब्द का इस्तेमाल करते मगर दुर्भाग्य रहा कि किसी शीर्ष नेता के मुख से ‘जलवायु’ शब्द नहीं निकला।

अभी दिल्ली के विधानसभा चुनाव में हमने सियासी ध्रुवीकरण को देखा। हर राजनीतिक दल लोकलुभावन वायदे कर रही थी लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने पर्यावरण से संबंधित मुद्दों को अपने भाषण में शामिल नहीं किया।

शुक्र है कि ऐसे मुद्दे राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में शामिल हो गए। पता नहीं इस पर कुछ काम होगा या सिर्फ कोरे आश्वासन होंगे। ये वही दिल्ली है जहां कुछ दिनों पहले प्रदूषण के कारण हेल्थ इमरजेंसी घोषित करना पड़ा था। अब एक बार फिर कोरोना वायरस के कारण हेल्थ इमरजेंसी घोषित करना पड़ा है।

वर्तमान परिस्थितियों को देखकर लगता है कि जलवायु परिवर्तन से ज़्यादा जलवायु प्रलय का संकट विश्व पर मंडरा रहा है। अगर पेरिस समझौते में आने वाले देशों ने समझौता अपना लिया होता तो आज पर्यावरण की परिस्थिति कुछ और होती।

भारत के राजनेताओं को 8 वर्षीय लिसिप्रिया आईना दिखा रही हैं। राजनेताओं को ज़रूरी है कि अपने भूल को स्वीकारते हुए जलवायु परिवर्तन के खिलाफ ठोस पहल करें।

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