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“गे हूं, पत्नी का गुनहगार भी हूं मगर मुझे शादी के बंधन में बांधने वाला यह कैसा समाज?”

Gay Love

Gay Love. Pic Credit- Agents Ofd Ishq

छुपते-छुपाते, दुनिया की नज़रों से दूर, रात के अंधेरे में जब दो दिल मिलते हैं, तो वह समां जैसे थम सा जाता है। सर्दी और बारिश की ऐसी ही एक रात में जब मैं रज़ाई में, हीटर के सामने अपने लैपटॉप में कुछ काम कर रहा था, तो मेरे मोबाइल की जलती-बुझती रौशनी ने मुझे बताया कि कोई अजनबी मुझसे मिलना चाहता है।

एक रात बस एक दफा मिले थे। बरसात की वो रात आज भी याद है। उसके घुंघराले बाल, बेहद संवेदनशील और तहज़ीब भरा व्यवहार जैसे मेरे दिल और दिमाग में छा गया था।

आज भी बारिश है और मुझे दूसरी पहाड़ी के पार जाना है। पता नहीं कैसे जाऊंगा? पहुंच भी पाउंगा या नहीं? तैयार हुआ, थोडा इत्र लगाया और लम्बी काली जैकेट पहने, छाता लिए निकल पड़ा।

उससे बेइंतेहां प्यार करने की मेरी चाहत थी

मैं एक बार फिर अपने ख्वाब से मिल रहा था और इस ख्वाब को शब्दों में पिरोना आसान नहीं हैं मगर इस दफा, मेरा ख्वाब कुछ बदला हुआ था। उसके कटे बाल, पहले से कम वज़न जैसे कुछ बयां कर रहे थे या शायद बहुत कुछ बयां कर रहे थे।

कभी वो मेरी गोद में सर रखता तो कभी मेरे सीने से लिपट जाता, बार-बार मेरा हाथ चूमता और अपने सीने में छुपा लेता। कहता, हमारी सारी रातें ऐसी क्यों नहीं होतीं? पूरी रात मेरे हाथ को अपने सीने में लगाए चूमता रहा और मैं उसे सुनता और देखता रहा।

मैं भी उसे बहुत प्यार करना चाहता था मगर खुद को रोक रहा था। मुझे पता था कि सुबह होते ही हम फिर से अजनबी हो जाएंगे, क्योंकि हम दोनों ने समाज के नियम तोड़ें हैं, हम महिलाओं के साथ शादी के रिश्ते में हैं और उससे भी पहले दो पुरुष हैं।

कभी लगता है कि मैं गे हूं तो कभी लगता है नहीं!

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Agents Of Ishq

मेरे ख्वाब की ख्वाबगाह उसने खुद सजाई थी। चारों तरफ, उसके बनाए हुए चित्र दीवारों से हमें ताक रहे थे, रंगों का बेहद खूसूरत इस्तेमाल और हर ख्वाबगाह के उर्दू, सूफी नाम उसकी शख्शियत के बारे में कुछ कह रहे थे। इसे खाना बनाना, रंगों से खेलना, गाना गाना और खेती बेहद पसंद है।

इतना खूबसूरत इंसान, जिसके पास हर गुण है मगर आज कुछ टूटा हुआ है। वह कहता है, “मैं अपनी पहचान के दो हिस्सों में झूल रहा हूं। कभी लगता है कि मैं गे हूं और कभी नहीं हूं। रोज़ खुद से झूठ बोलता हूं कि अभी कुछ ही महीने हुए हैं मेरी शादी को और मेरी पत्नी हमेशा कहती है कि तुम क्यों कभी मुझसे प्यार का इज़हार नहीं करते?”

उसके साथ बिस्तर पर रोज़ एक सज़ा होती है। वह बताता है, “मैं अपनी पत्नी का गुनहगार हूं मगर क्या समाज के बनाए नियम मुझ पर थोपे नहीं गए? शायद किसी तरह जी लूंगा यह ज़िन्दगी! आज बहुत हल्का महसूस हुआ बात बताकर।”

हम फिर से अजनबी बन गए

उसने आगे कहा, “दिमाग पर बहुत बोझ है और यह बोझ अंदर ही अंदर मुझे खा रहा है। शादी से पहले दिल्ली में एक व्यक्ति से मिला, मुलाकात सिर्फ 15-20 मिनट की होगी मगर सोचा शादी के बाद शायद मौका ना मिले। जिससे मिला उसने भी मुझे सुख देने में कोई कसर ना छोड़ी, टूटकर मुझे प्यार किया।”

खैर, तड़के सुबह अंधेरे में मेरे जाने का समय आ गया। हमने कपड़े पहने और ज़ोर से एक-दूसरे को गले लगाया। मैंने उसके होंठों पर चूमा और हम बाहर आ गए। बाहर चांद जैसे हमें निहार रहा था। वापस रास्ते में कई सवाल, थोड़ा दुःख और थोड़ी खुशी के साथ में आगे बढ़ता रहा।

अगले दिन उसके मैसेज या कॉल का इंतज़ार किया मगर मेरा ख्वाब अब खत्म हो चुका था। उसका कोई संदेश नहीं आया मेरे मैसेज का जवाब भी नहीं आया क्योंकि हम फिर से अजनबी थे।

सोचता हूं हमारी ज़िन्दगी ऐसी दोहरी पहचान के साथ कब तक चलेंगी? क्या हमारी ज़िन्दगी प्यार की तलाश में ही बीत जाएगी? हां, हम गुनहगार हैं अपनी पत्नी के मगर उन नियमों का क्या जो समाज ने हम पर थोपे हैं और जिन्हें हमें सारी ज़िन्दगी ढोना पड़ेगा।  शायद सारी ज़िन्दगी हमें S.W.A.G. में ही रहना पड़ेगा, सेक्रेटली वी आर गे।


सीक्रेट राइटिंग्स द्वारा लिखित और सानिका धाकेफालकर द्वारा चित्रित

नोट: लेखक की उम्र 32 साल है और वो हिमाचल के एक कस्बे में रहते हैं। वो LGBTQIA+ समुदाय के लिए हेल्पलाइन चलाते हैं और सेक्स, सेक्सुअलिटी, जेंडर, पितृसत्ता के मुद्दों पर लिखते, पढ़ते और बातचीत करते रहते हैं। गे हुक-उप Apps के माध्यम से वो लोगों से मिलते रहते हैं और उन्हें लोगों की रोमेंटिक और सेक्स कहानियाx सुनना पसंद है, वे कहानियां जो हम सिर्फ अजनबियों को सुना पाते हैं।

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