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“यूनिवर्सिटी में 128 सालों के इतिहास को तोड़कर मैं कैसे बनी पहली महिला अध्यक्ष”

ऋचा सिंह

ऋचा सिंह

यह सफर एवरेस्ट पर चढ़ने जैसा है, यह यात्रा बहुत कठिन और विपरीत परिस्थितियों वाली होती है। आप जैसे-जैसे अपने कदम आगे की ओर बढ़ाते हैं, विपरीत परिस्थितियां आपको नीचे की ओर धकेलती हैं।

सबसे बड़ी चुनौती विपरीत परिस्थितियों से हर कदम पर लड़ने की होती है। हमारे संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय और अवसरों की समता की बात कही गई है।

मगर महिलाओं के लिए ना तो किसी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय की बहस होती है और ना हीं उनके लिए अवसरों की समता पर कोई बात करना चाहता है।

जैसे चल रहा है, चलने दो वाली मुद्रा में ज़्यादातर चीज़ें चलाई जा रही हैं। ज़्यादा सवाल-जवाब करने पर आपको समाज बिगड़ी हुई लड़की का तमगा उपहार स्वरूप दे सकता है।

लेकिन मुझे यह मंज़ूर नहीं था, मैं सवाल करना चाहती थी। अपने सवालों का जवाब चाहती थी। यही कारण था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ही एम.फिल गोल्ड मेडलिस्ट रहने के बाद, विश्वविद्यालय में ही नौकरी लग जाने के बाद भी मेरे दिमाग में एक सवाल कौंधता था।

कॉलेज कैंपस में एक कार्यक्रम के दौरान ऋचा सिंह। फोटो साभार- फेसबुक, ऋचा सिंह

विश्वविद्यालय में सिर्फ लोकतंत्र पर विमर्श ही नहीं होता है, बल्कि राजनीति के चार सिद्धान्तों को भी पढ़ाया जाता है। सेमिनार, कार्यक्रमों में मंचो से लड़कियों की समानता, गरिमा, “यत्र नार्यस्तु  पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” के लोकप्रिय श्लोक, महिला सशक्तिकरण पर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं।

बुद्धजीवी, शिक्षक आपको नारी होने की ताकत का एहसास अपने व्याख्यानों से कराते हैं। वहीं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय जिसकी छात्र राजनीति के गरिमापूर्ण इतिहास का वर्णन पूरे देश की राजनीति में होता है।

इस सबके बीच मेरा सिर्फ एक सवाल था! पूर्व के ऑक्सफोर्ड, इस प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय के 128 सालों के गरिमामई छात्रसंघ के इतिहास में एक भी महिला अध्यक्ष क्यों नहीं हुई?

जवाब तो मिलना नहीं था और यह भी समझ में आया कि जवाब गढ़ना पड़ेगा। इसलिए नौकरी छोड़कर पीएचडी में एडमिशन लिया और कूद पड़ी छात्रसंघ चुनावों में।

यहीं उस सवाल का जवाब मिला कि लड़कियां छात्रसंघ चुनाव में हिस्सा क्यों नहीं लेती हैं। आखिर देश को जितनी ज़रूरत आईएस, पीसीएस, डॉक्टर, इंजीनियर शिक्षक, कवि और वैज्ञानिको की है उतनी ही ज़रूरत बेहतरीन पढ़े-लिखे नेताओं की भी तो है।

मगर राजनीति में धनबल, बाहुबल, पैसा, पॉवर का खुला खेल और विशेषकर राजनीति में पुरुषों की मोनोपॉली का होना बहुत सारी लड़कियों को राजनीति के सपने से बहुत दूर ले जाता है।

आप वोट दीजिए, कैम्पेन करिए, ज़्यादा हो तो भाषण दे दीजिए मगर ‘नेतृत्व’ के बारे में सोचिएगा भी मत! आप जेएनयू या दिल्ली यूनिवर्सिटी नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में हैं, रूढ़ियों को सहेजना जहां भौकाल माना जाता है।

यह सब इस मानसिकता से कारण ही है कि इतनी अक्ल और क्षमता लड़कियों में कहां कि वे नेतृत्व कर सकें, नेता हो सकें?

ऋचा सिंह। फोटो साभार- फेसबुक, ऋचा सिंह

लड़की जब जन्म लेती है तो उसके चारों तरफ एक सामाजिक, पारिवारिक और नैतिक चक्रव्यूह होता है। समाज इतनी चतुराई और मज़बूती से उस चक्रव्यूह का निर्माण करता है कि कोई भी लड़की उसे तोड़ ना सके।

इसका आभास तब होता है जब कोई भी लड़की इस चक्रव्यूह को तोड़कर अपनी स्वतंत्र इच्छा का निष्पादन करने का निश्चय कर लेती है।

मैंने जब निर्णय लिया कि मैं छात्र संघ का चुनाव लडूंगी और पहली चुनी हुई महिला अध्यक्ष बनूंगी तो मुझे उस चक्रव्यूह के प्रथम द्वार का अंदाज़ा लगा जो मेरे घर से शुरू होता है। इसके बाद घर के बाहर का समाज, लड़कियों के लिए बनाए गए नियम, उसके अनेकों द्वार मुझे चुनौतियां देते रहें और मैंने उनसे जूझने का निर्णय लिया।

पूर्व के ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ को अपना चुना हुआ महिला अध्यक्ष देने में 128 साल लग गए। यह है शिक्षा जगत के शीर्ष संस्थान में इस ‘चक्रव्यूह’ की मज़बूती की स्थिति।

मैं यह कह सकती हूं कि मैंने उस चक्रव्यू के सभी दरवाज़े तोड़ने की ज़िद्द पाली, उस चक्रव्यूह में जाकर पितृसत्तात्मक सत्ता को चुनौती दी जो यह मानती है कि  किसी लड़की का जीतना उसकी अपनी काबिलियत, संघर्ष या प्रक्रिया ना होकर एक भाग्य आधारित घटना होती है।

हमारे समाज की सबसे दिक्कत की बात यह है कि सिद्धांत और धरातल में बहुत भेद है। 21वीं सदी में भी लड़कियां स्वतंत्र रूप से अपना कार्य नहीं कर सकती हैं। वे भयभीत हों ना हों मगर सामाजिक ताना-बाना उन्हें स्वत्रंत रूप से कार्य नहीं करने देता है।

ऐसा क्यों? क्योंकि इसी देश में निर्भया की घटना और ड्यूटी से लौटती डॉक्टर को 21वीं सदी के समाज द्वारा बर्बरतापूर्वक मार दिया जाता है या जला दिया जाता है।

संविधान कहता है कि महिलाओं को बराबरी का हक है मगर धरातल पर स्थिति क्या है? इसे इस बात से समझा जा सकता है कि 17वीं  लोकसभा में 50 प्रतिशत आबादी का महज़ 14 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है। सवाल यह है कि सक्रिय राजनीति में महिलाओं की भागेदारी इतनी कम आखिर क्यों है?

इसके बहुत सारे कारण हैं मगर उनमें से प्रमुख हैं पितृसत्तात्मक सोच, समाजिक स्थानों पर पुरुषों की मोनोपॉली, धनबल-बाहुबल की राजनीति। आपको इन सबसे आए दिन जूझना पड़ता है।

ऋचा सिंह। फोटो साभार- फेसबुक, ऋचा सिंह

चुनाव लड़ने के लिए बड़ी गाड़ियां, ढ़ेर सारे पैसे चाहिए। इनकी व्यवस्था अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है
लेकिन आपको इस चुनौती को स्वीकार करना पड़ता है, क्योंकि यही इसकी सच्चाई है।

मुझे यह सवाल बहुत खटकता था फिर मुझे समझ आया कि पैसा और बाहुबल की राजनीति को हम महिलाओं को ही चुनौती देनी होगी। हमारे सपने किसी धनबल-बाहुबल के मोहताज नहीं हैं। हमारे पास जो है, उसे अपनी ताकत बनाना होगा।

मतलब यह कि मैं बोल सकती हूं, लिख सकती हूं, ज़मीन पर आंदोलन और संघर्ष कर सकती हूं। मैंने तय किया मेरे रास्ते यही होंगे और मैं इन्हीं रास्तों पर चल पड़ी।

पुरुष प्रधान समाज बार-बार आपकी काबिलियत पर शक करेगा। आपके हौंसले को तोड़ने का प्रयास करेगा लेकिन डटे रहना है, क्योंकि इस देश को महिला नेताओं, महिला नेतृत्व की ज़रूरत है।

जिनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ महिलाओं के प्रतिनिधित्व की ही नहीं है, बल्कि समाज के प्रतिनिधत्व की भी है क्योंकि आधी आबादी और पूर्ण नागरिक के बतौर देश और समाज के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है।

यह भी सच है कि इस सफऱ में पितृसत्तात्मक सोच आड़े तो आती है लेकिन कई पुरुष कंधे से कंधा मिलाकर पितृसत्ता को चुनौती देते हुए आपके साथ भी खड़े भी होते हैं।

सफर जारी है, क्योंकि मैं आम लोगों की, आम लड़कियों की तकलीफों की गवाह हूं। इसको जिया है मैंने। अब मैं लोगों की तकलीफों से मुक्ति के सफर और संघर्ष की हमसफ़र बनना चाहती हूं और इसके आगे बाकी सारी चुनौतियां बहुत कम लगती हैं।

चलिए गोपाल दास नीरज की कविता की पंक्तियों पर आपको छोड़ जाती हूं।

जब चलने के लिए धूल तक ललकारती हो

पंथ की कठिनाइयों से मान लूं हार मुमकिन नहीं।


नोट: YKA यूज़र ऋचा सिंह इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रथम निर्वाचित महिला अध्यक्ष रही हैं।

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