Site icon Youth Ki Awaaz

राजस्थान के घुमंतू समुदाय के लोगों का जीवन कोरोना से हुआ है बुरी तरह प्रभावित

कोरोना के खतरे के बीच भले ही धीरे-धीरे व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गई हो लेकिन इस महामारी ने अपने पीछे जो निशान छोड़ा है, उसे सदियों तक मानव जाति भूला नहीं पाएगी। इससे ना केवल लाखों लोग असमय काल के गाल में समा गए, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो गई है।

कोरोना के दुष्प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा है। इसका सबसे ज़्यादा नकारात्मक प्रभाव देश के गरीब, पिछड़े और मुश्किल से दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करने वाले मज़दूरों की ज़िंदगी पर पड़ा है। जिनके सामने आज अपने परिवार के पेट को पालने की चुनौती है। लॉकडाउन और चरमराती अर्थव्यवस्था ने उनके काम धंधे को ठप्प कर दिया है, रही-सही कसर सरकारी दांव-पेंचों ने पूरी दी है।

राजस्थान का घुमंतू समुदाय कोरोना की आपदा में झुलस गया है

कोरोना से ठप्प हुई अर्थव्यवस्था से प्रभावित होने वालों में राजस्थान का घुमंतू (खानाबदोश) समुदाय भी है। जिनके काम धंधे पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। इस समुदाय का रोज़गार पलायन से ही जुड़ा हुआ है, यह समुदाय राज्य से बाहर जाकर ऊनी कंबल, ऊनी कपड़े, मिर्च मसाला तथा सूखे मेवे बेचकर अपना गुज़ारा करता रहा है।

इस खानाबदोश समुदाय में अधिकतर मुस्लिम बंज़ारा समुदाय की संख्या है। जो साल में दो बार महाराष्ट्र, गुजरात तथा दिल्ली आदि जगहों पर जाते हैं। पहली बार अक्टूबर-नवंबर में जब जाते हैं, तब माल उधारी पर देकर आ जाते हैं तथा दूसरी बार मार्च-अप्रैल में जब जाते हैं तो उधारी पर दिए माल की वसूली करते हैं। इन्हीं पैसों से इनका घर और कारोबार का मामला टिका रहता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर, तस्वीर साभार: गेटी इमेजेज

इस बीच कोरोना महामारी से हुए लॉकडाउन ने इनकी समस्या को ना केवल बढ़ा दिया है, बल्कि इनके सामने रोज़ी-रोटी की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। कोरोना के कारण जिस समय लाॅकडाउन हुआ, उस वक्त इस समुदाय के अधिकतर लोग उधारी की वसूली पर या तो जाने वाले थे या फिर चले गए थे लेकिन संपूर्ण लाॅकडाउन की घोषणा के बाद इन्हें वसूली का काम अधूरा छोड़कर वापस आना पड़ा।

कुछ लोग तो जा ही नहीं पाए। यह समुदाय जो वसूली करके आता था उसी से इनके पूरे साल भर का काम चलता था। इससे होने वाले लाभों से जहां परिवार का भरण पोषण होता था, वहीं अगले साल बेचने के लिए माल खरीदने लायक पैसा भी जमा हो जाया करता था लेकिन अब सबकुछ ठहर गया है।

रोज़गार का अभाव घुमंतू समुदाय के लिए बन गया है परेशानी का सबब

इस समय इनके पास कोई रोज़गार ना होने के कारण पूरा समुदाय परेशान है। अब इनके सामने घर का खर्चा चलाना भी मुश्किल हो रहा है।

समुदाय के एक सदस्य नूर मुहम्मद बताते हैं, “अब इस व्यवसाय में इतना कोई लाभ नहीं है। बस किसी प्रकार परिवार का गुज़ारा चल जाता है और कुछ लोग तो यह भी नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इस काम में पहले पैसा लगाना पड़ता है। माल खरीदना होता है लेकिन जिनके पास माल खरीदने का भी पैसा नहीं होता, वह मज़दूरी करने लग जाते हैं।”

प्रतीकात्मक तस्वीर, तस्वीर साभार-गटी इमेजेज

चिंता की बात यह है कि इस समुदाय में शिक्षा का स्तर ना के बराबर है। महिलाओं में शिक्षा का स्तर लगभग नगण्य है। कुछ ऐसा ही हाल पुरूष वर्ग का भी है। पढ़ा लिखा नहीं होने की वजह से काम धन्धें में हिसाब-किताब रखने में भी इन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

वकील खां बताते हैं कि वसूली का समय अन्तराल लंबा होने के कारण इन्हें लिखित में वसूली का हिसाब रखना ज़रूरी होता है लेकिन समुदाय के कई पुरुष अशिक्षित होने के कारण ऐसा नहीं कर पाते हैं। जिसका खामियाज़ा अक्सर उन्हें भुगतना पड़ता है।

कई बार मौखिक हिसाब-किताब रखने के कारण दुकानदार धोखे से माल से कम भुगतान करते हैं। लॉकडाउन की लंबी अवधि के बाद तो इन्हें अपना उधारी पैसा वापस मिलना भी मुश्किल नज़र आ रहा है। अब जबकि लाॅकडाउन लगभग खुल गया है, बावजूद इसके कोरोना के बढ़ते रफ्तार के कारण यह लोग राज्य से बाहर जाने में डर और झिझक रहे हैं।

इनका कहना है कि इस समय जब सभी का काम और रोज़गार बंद है और मार्केट भी मंदा हो गया है, तो ऐसे में शायद ही कोई दुकानदार उधारी वापस करेगा, हमें वसूली करने में भी बहुत परेशानी उठानी पड़ेगी या फिर बार-बार जाने की नौबत भी आ सकती है जो हमारे लिए संभव नहीं हो सकता है।

आस-पास ही रोज़गार मिल जाए तो समस्या का निराकरण सम्भव है

घुमन्तू समुदाय में ही घूम-घूम कर कपड़ा बेचने के अलावा अन्य जातियां जैसे मदारी, कलन्दर, सिंघवाडी, गाडिया और लुहार भी हैं। यह सभी दैनिक मज़दूरों की तरह रोज़ काम रोज़ खर्च करके अपने परिवार का गुज़ारा चलाते हैं।

मदारी और कलन्दर समुदाय पहले भालू-बन्दर का खेल तमाशा दिखाकर अपना जीवन यापन करते थे लेकिन पशु-पक्षियों आदि का इस्तेमाल कर खेल दिखाने पर प्रतिबंध लगने के कारण अब यह लोग अपने ही छोटे बच्चों को जमूरा बनाकर खेल दिखाते हैं। इस वजह से ना केवल इनके बच्चों की शिक्षा छूट रही है, बल्कि बालश्रम की आग में उनका बचपन भी छीन रहा है।

आमतौर पर देखे तो सभी घुमन्तु समुदायों की आर्थिक स्थितियां बहुत अधिक खराब है। इन्हें रोज़गार की सबसे अधिक आवश्यकता है। लेकिन सवाल उठता है आखिर यह कौन सा रोज़गार कर सकते हैं? क्योंकि इस समुदाय में शिक्षा और दक्षता दोनों की कमी है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

इस संबंध में निसार अहमद कहते हैं कि उन लोगों को घर पर रहकर ऐसा काम मिले जिससे घर की महिलाएं कच्चा माल तैयार कर दें और पुरुष बाज़ार में उसे सप्लाई करें, क्योंकि सप्लाई और बाज़ार का काम करने का समुदाय का अच्छा अनुभव है।

जैसे साड़ियों से जुड़े काम, मिर्च मसाला तैयार कर बेचने का कार्य, खिलौना बनाने तथा इसी तरह के अन्य कार्य। फिलहाल इस समुदाय की महिलाएं सिर्फ घर का कामकाज करती हैं या फिर गाँव में ही नरेगा के तहत मज़दूरी जैसा काम करती हैं।

वहीं सलीम खान का मानना है कि शिक्षा की कमी अवश्य है लेकिन वह भी पढ़े-लिखे समाज की तरह जीना चाहते हैं और अपने बच्चों को भी पढ़ा-लिखाकर आगे बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे में, यदि इन्हें घर पर रहकर काम मिल जाएगा तो ना केवल इनके पलायन की समस्या हल हो जाएगी, बल्कि इनके बच्चों को आगे बढ़ने का मौका मिल पाएगा।

सरकार को घुमंतू समुदाय के रोज़गार के लिए कठोर कदम उठाने चाहिए

कोरोना के चलते अभी इन समुदायों का रोज़गार भी बंद हो गया है और अब इनके सामने भीख मांगकर खाने की नौबत आ गई है। ऐसी मुश्किल घड़ी में इस समुदाय को भी रोज़गार की बहुत अधिक आवश्यकता है।

अब तक तो सरकार और कुछ सामाजिक संस्थाओं के सहयोग से इनका गुज़ारा चल गया लेकिन यह लम्बे समय तक नहीं चल सकता है। ऐसे में ज़रूरी है कि इन अति पिछड़े समुदायों के लिए सरकार कोई ठोस योजनाएं बनाकर इन्हें भी समाज की मुख्यधारा से जोड़े।

कहने को तो समाज में हाशिए पर खड़े लोगों के लिए ढ़ेरों सरकारी योजनाएं हैं लेकिन अब समय आ गया है कि इन्हें धरातल पर उतारा जाए ताकि खानाबदोशों की ठहरी हुई ज़िंदगी फिर से रफ्तार पकड़ सके।


रमा शर्मा, जयपुर, राजस्थान (चरखा फीचर)

Exit mobile version