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पीलिया के इलाज का छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का यह घरेलू नुस्खा

नोट- यह आर्टिकल केवल जानकारी के लिए है, यह किसी भी प्रकार का उपचार सुझाने की कोशिश नहीं है। यह आदिवासियों की पारंपारिक वनस्पति पर आधारित अनुभव है। कृपया आप इसका इस्तेमाल किसी डॉक्टर को पूछे बगैर ना करें। इस दवाई का सेवन करने के परिणाम के लिए Adivasi Lives Matter किसी भी प्रकार की ज़िम्मेदारी नहीं लेता है।

डायरेक्टरेट ऑफ हेल्थ सर्विसेज़, छत्तीसगढ़ की रिपोर्ट के अनुसार 2000 में पीलिया के दर्ज केस 264 थे और 2005 में दुगना होकर 528 हो गए हैं। भारत में पर्याप्त मेडिकल सेवा ना होने के कारण आदिवासियों में पीलिया से मौत की घटनाएं ज़्यादा हैं लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरबा ज़िले के आदिवासियों के पास पीलिया उतारने का एक अनोखा तरीका है, जिसका वे इस्तेमाल करते हैं।

पीलिया से लड़ने के लिए आदिवासियों का घरेलू इलाज

घने जंगलों में बसे गॉंववासियों के पास ऐसा पौधा है, जिसका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। हमारे आस-पास बहुत पेड़ पौधे होते हैं जो हमारे लिए लाभदायक हैं लेकिन उनके महत्व की जानकारी नहीं होती है। ऐसे पौधों के उपयोग से बड़ी-से-बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है। कोरबा के आदिवासियों ने एक ऐसे ही मामूली पौधे की खास जानकारी से जीवन बचाया है। यह कुछ और नहीं, बल्कि आम है!

आम के चाल। फोटो- वर्षा पुलस्त

कैसे करते हैं आदिवासी इसका उपयोग

जब किसी को पीलिया की शिकायत होती है, तो शरीर पीला पड़ जाता है और जल्द ही रोगी की मृत्यु हो जाती है। आम से पीलिया भगाने का यह घरेलू नुस्खा है। इसके लिए 3 चीज़ों की ज़रूरत है, जो साधारणतः कहीं भी मिल जाएंगी। ये है आम का छाल, चूना और कांसा (bronze) का बर्तन।

आम के छाल को पानी में उबाते हुए। फोटो- वर्षा पुलस्त

किसी भी आम के पेड़ के छाल को पत्थर से कूंचे, फिर इसे गर्म पानी में उबालें। इसे गर्म पानी में तब तक रखा जाता है, जब तक छाल से सारा रस पानी में ना मिल जाए। रस पानी में अच्छे से मिल जाने के बाद पानी का रंग पीला-भूरा हो जाता है। इस रस को चूने में थोड़ा सा डालकर गाढ़ा पेस्ट बना लिया जाता है।

चुने का गड़ा पेस्ट। फोटो- वर्षा पुलस्त

फिर एक कांसा के बर्तन में रोगी व्यक्ति के पैरों को रखते हैं। सबसे पहले पूरे शरीर में केवल चूने को लगाया जाता है। पैरों के नाखूनों से शुरू करके, हांथों की उंगलियों तक चूना लगाया जाता है। फिर सिर पर भी इसे लगाया जाता है। इसे दो मिनट तक ऐसे ही छोड़ दिया जाता है।

बीमार व्यक्ति के पैरों को कांसा के बर्तन में रखा जाता है। फोटो- वर्षा पुलस्त

इसके बाद आम वाले रस से हाथों और पैरों को अच्छे से भिंगोकर धोया जाता है। अच्छे से धोने के बाद, लगभग पांच मिनट तक पैरों को रस वाले इसी बर्तन में रखा जाता है। इस प्रक्रिया को तीन दिनों तक लगातार करने से पीलिया का बुखार उतर जाता है, ऐसा आदिवासियों का कहना है।

जब इस प्रक्रिया को पहले दिन किया जाता है, तब पानी गाढ़ा रंग का होता है। पीलिया रोगी के शरीर को धोने के कारण, पानी का रंग ऐसा हो जाता है। आखिरी और तीसरे दिन, आम के पानी का रंग काफी सामान्य हो जाता है। इससे पता चलता है कि पीलिया खत्म हो गया है।

ऐसा क्यों किया जाता है?

कांसा में 88% तांबा और 12% टिन होता है। तांबा शरीर में प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता है, इसलिए इसे भोजन में सीमित मात्रा में लेना चाहिए। तांबा इम्यूनिटी और खून के लिए अच्छा होता है। कांसा के बर्तन से रोगी को मदद होती है।

चूना में कैल्शियम कार्बोनेट और मैग्नेशियम होता है, इसमें एंटी बैक्टेरियल, एंटी फंगल और एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो बीमारी से बचाते हैं।

ये आदिवासियों का घरेलू उपाय है। आदिवासियों ने इसकी मदद से खुद को पीलिया से बचाया है लेकिन लोग अब इन औषधियों का उपयोग कम करते हैं और मेडिकल सेवा लेते हैं।

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लेखिका के बारे में- वर्षा पुलस्त छत्तीसगढ़ में रहती हैं। वह स्टूडेंट हैं, जिन्हें पेड़-पौधों की जानकारी रखना और उनके बारे में सीखना पसंद है। उन्हें पढ़ाई करने में मज़ा आता है।

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