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“मैं मुसलमान से पहले एक इंसान हूं”

बड़ा अजीब लगता है जब आपसे कोई आपके धर्म का नाम पूछता है? क्या धर्म के नाम पर इंसानियत अब बंट गई है? बस भारत में यही मुद्दा रह गया है? हिन्दू या मुसलमान! धर्म के नाम पर आजकल सोशल मीडिया से लेकर व्हाट्सएप्प के ग्रुप तक यही महसूस किया जा रहा है कि आजकल रिश्ते से लेकर दोस्ती सब धर्म के आधार पर ही हो रहे हैं।

धर्म का खेल आजकल लोगों का हथियार बन गया है। राम मंदिर बनने के बाद तो मेरे व्हाट्सएप्प पर मैसेज की बाढ़-सी आ गई। ‘इमरान आज दीये जलाए? क्या आज तुमने राम नाम के गाने चलाए? क्या तुम राम मंदिर बनने से खुश नहीं हो? तुमने सोशल मीडिया पर कोई भी पोस्ट नहीं किया। इतने सारे सवाल मेरे से? बस इसलिए कि मैं एक मुसलमान हूं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

जहां देखो वहीं धर्म की बात चल रही है। ऑफिस हो या सोशल मीडिया हर जगह लोग इसलिए नहीं खुश है कि राम मंदिर का शिलान्यास किया गया है, बल्कि इसलिए खुश हो रहे हैं, क्योंकि उनको लगता है मुसलमान हार गए। मेरे परिवार ने मुझे हमेशा से सिखाया है कि धर्म के नाम पर कभी कोई भी फैसला मत करना। धर्म से पहले इंसानियत है। आप मुसलमान होने से पहले एक इंसान हैं। धर्म उसके बाद बात आता है।

सच कहूं तो मुझे तो जानवरों की एकता देखकर रक्स होता है कि इनमें कोई धर्म नहीं। इनको अमीरी गरीबी से कोई लेना देना नहीं है। कितना अच्छा होता जो हम भी ऐसे होते। लोग बोलते हैं मुसलमान आतंकवादी होते हैं, कट्टर होते हैं।

अपराध का नहीं होता है कोई धर्म

पहली बात तो यह है कि किसी भी अपराध का कोई धर्म नहीं होता। कट्टरता हर धर्म में देखने को मिलती है और वो भी उन लोगों में जिनका इतिहास से और शिक्षा से कुछ लेना देना नहीं होता। ज़्यादातर मामलों में मैंने यही महसूस किया है।

वहीं बात अगर करें कोरोना काल की, तो उस समय जब पूरा भारत बंद था। हम जिस इलाके में रहते हैं वहां पर बस हमारा ही एक मुस्लिम परिवार है। मैं अपने खाली समय में पिछले 15 सालों से बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता आ रहा हूं। इस दौरान जब मरकज़ कमेटी में जमातियों की रिपोर्ट्स कोरोना पॉजिटिव आई, तो लोगों ने हमसे कटना शुरू कर दिया।

प्रतीकात्मक तस्वीर

मैं उस समय बच्चों की ऑनलाइन क्लास ले रहा था, मगर आचानक से बच्चों के पेरेंट्स ने मुझे साफ तौर पर मना कर दिया और बोले हम सिंतबर से आपसे कांटेक्ट करेंगे। बच्चों से फिर यही सुनने को मिला कि उनके पेरेंट्स बोल रहे हैं, “मुसलमान कोरोना फैला रहे हैं। रिस्क लेने की क्या ज़रूरत है। क्या पता इन लोगों को भी कोरोना हो गया हो।”

बहरहाल उनकी बात वहां तक तो ठीक थी कि वह कोरोना को फैलने से रोकने की मुहिम में हिस्सेदार थे, मगर जब बात आती है धर्म की तो यह समाज की एक असभ्य कृति बन जाती है। जिन बच्चों को हमने बढ़ते हुए देखा और पढ़ाया भी यहां तक कि हम डिनर भी साथ करते थे। वही बच्चे अब मुझसे मुंह छिपाने लग गए हैं।

ऐसा भी कह सकते हैं कि उनके अभिभावकों द्वारा उनको अच्छी सीख नहीं दी गई। इससे उनमें स्वार्थ की भावना पनपने लगी। मेरे ख्याल से उनमें नैतिकता का अभाव है। यह तो एक छोटा-सा उदाहरण था। जो मुझे मेरे मुसलमान होने पर मिलने वाले एहसास को उज़ागर करता है।

सोशल पर फैलाई जा रही है जमकर नफरत

सोशल मीडिया, फेसबुक ग्रुप हो या व्हाट्सअप ग्रुप उसमें भी मैंने देखा लोग मुसलमानों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं। उनको पता लगता है मैं मुस्लिम हूं, तो मुझे कई बार ग्रुप से ही हटा दिया जाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

मैं एक संस्था से जुड़ा हुआ हूं जिसमें ज़्यादातर बच्चे अनाथ हैं उनका एक व्हाट्सएप्प ग्रुप है। वहां भी धर्म का खेल खेला जाता है। यह बहुत ही दुःखद है। धर्म के नाम पर आप किसी को भी कहीं से भी निकाल कर बाहर कर दोगे? हिन्दू हो या मुसलमान या फिर दलित उनको उनकी जाति से नहीं मापना चाहिए।

आप उनकी काबिलियत भी तो देखें। उसमें कितनी सकरात्मक बातें हो सकती हैं। उनके हुनर को सराहिए। क्या हिन्दू और क्या मुसलमान? छोटी सी ज़िन्दगी मिली है उसमें भी गंदी राजनीति, छल-कपट, बेईमानी, ईर्ष्या द्वेष, यह सब आपको पोषित नहीं करता, बल्कि अंदर ही अंदर आपको खोखला कर देता है। आपके विकास पर विराम लगा देता है। अपनी आत्मा को शुद्ध रखें। आपका जीवन सुखदायक रहेगा।

बाहर निकलते हुए लगता है डर

बाहर निकलते हुए डर लगता है। ऐसा लगता है कहीं कोई पुलिस नाम के आधार पर ही कोई झूठा केस ना बना दे। यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं, बल्कि हर मुस्लिम घर के बच्चों की कहानी बन गई है। आजकल का जो माहौल है उसको देखते हुए यही लगता है। धर्म की आड़ में कभी भी कुछ भी हो सकता है।

हम न्याययिक व्यवस्था से नहीं लड़ सकते। पूरे विश्व में अगर देखा जाए तो बस यही दो धर्म हैं जो धर्म के नाम पर लड़ते हैं। पूरा भारत हिन्दू-मुस्लिम में परेशान हैं। राजनीति में भी यह एक शस्त्र बन गया है। वोट बैंक, जिसका इंसानियत से कोई लेना देना नहीं। जिस भी धर्म में धर्म को लेकर बंटवारा होगा उस धर्म का अंत स्वभाविक है। चाहे वह मुस्लिम हो या हिन्दू।

प्रतीकात्मक तस्वीर

मुझे कट्टरता से कोई सरोकार नहीं चाहे वह किसी भी धर्म में हो। मुझे मौलानाओं के बे सिर पैर के फतवे हमेशा से नागवार गुज़रते हैं। फतवे ये भी तो हो सकते हैं कि किसी भी गरीब को देखो तो उसको खाना खिलाओ, जीवन में कम-से-कम ऐसी लड़की की शादी करवाओ जिसके माँ बाप दहेज देने या शादी करने के लायक ना हों।

किसी अनाथ को गोद लेने का फतवा भी तो हो सकता है। कुल मिलाकर सीधी बात यही है कि भाईचारे की मिसाल पैदा करो। इंसान बनो। दंगे फसाद तो नेताओं के काम होते हैं। मरता कौन है हिन्दू या मुस्लिम का का बच्चा जो एक आम नागरिक होता है।

एक ऐसे माहौल का निर्माण करो जिसे दुनिया की कोई ताकत ना बिगाड़ सके। अहिंसा का पथ अपनाओ। ऐसा भाईचारा कायम करो जिससे दुनिया भर में एक मिसाल का पैगाम पहुंचे। मैं समाज को बस एक ही संदेश देना चाहूंगा कि मैं मुसलमान होने से पहले इंसान हूं। मुझे धर्म से मत नापो और ना ही मेरी भावनाओं को ठेस पहुंचाओ।

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