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“शहरों की कोचिंग संस्थानें बनी मोक्ष का नया द्वार”

दिल्ली की किसी बड़ी सड़क को पकड़ लीजिए और चलते जाइए चाहे वह बस, ऊबर, ओला, साइकिल से या पैदल। आपको बड़े-बड़े बैनर देखने को मिलेंगे। के.डी कैंपस, नारायणा, फिटज़ी, आकाश इंस्टिट्यूट और ऐसे ही तीन-चार हज़ार अन्य बड़े-छोटे कोचिंग सेंटर्स के नाम।

देश की आधी युवा आबादी इसी मोक्ष के पीछे भाग रही है

नारायणा वाले नीले वस्त्र पहनते हैं। उनके वहां हफ्ते में चार ही टेस्ट होते हैं। आकाश वालों का धर्म थोड़ा अलग है, वह दुनिया से इतने कटे हुए नहीं हैं। यहां के नेता कोई भी वस्त्र पहन सकते हैं। इन सभी धर्मों का मार्ग भले ही कुछ भी हों परंतु मकसद एक ही है, वह है मोक्ष। मोक्ष जो विद्यार्थियों को मिलता है सरकारी नौकरी के रूप में, IIT या AIIMS जैसे संस्थानों में एडमिशन के रूप में।

इसी मोक्ष के लिए दिल्ली और देश की आधी युवा आबादी भाग रही है। दिन भर साल के 365 दिन यज्ञ जारी रहता है। सुबह उठकर एक छात्र मोक्ष पाने के लिए सबसे पहले जनरल स्टडीज़ का पाठ करता है, फिर लॉजिकल रीज़निंग का ध्यान करके मैथ्स की आराधना करता है। मैंने उन छात्रों हमेशा खोया हुआ देखा है।

जो जीन्स और चप्पल पहन के हाथ में द हिन्दू अखबार पकड़े निरंतर अंतरमन में मंत्रों का जाप करते रहते हैं। उनकी आंखों से बस फॉर्मूले ही झांकते हैं। आंख के एक कोने में एक छोटी सी आशा। किसी तरह सरकारी नौकरी रूपी मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। हर साल लगभग डेढ़-दो करोड़ छात्र इस मोक्ष को पाने के लिए लग जाते हैं।

सफल हो पाते हैं सिर्फ दस या बीस। फिर वह छात्र जो सफल नहीं हो पाए वह एक दो लाख की गुरु दक्षिणा देकर भारी-भरकम नोट्स लिए फिर से लग जाते हैं मोक्ष प्राप्ति की ओर। यह चक्र चलता रहता है। इसमें किसी का फायदा होता है तो वह हैं बड़े बैनर वाले पंडित। जिनके बैनर आपको मिल जाएंगे हर सड़क-चौराहे और नुक्कड़ पर। यह सब देख कर मैंने भी एक कोचिंग सेंटर खोला।

जब आपको मंज़िल न मिले तो लोगों को मंज़िल का पता बताएं

खुलते ही दिनभर में दस हज़ार इन्क्वायरी आ गईं कि आप कौन से कोर्स की कोचिंग देते हैं? हमने सरल शब्दों में बताया, “हम कुछ नहीं का कोर्स करवाते हैं।” “कुछ नही” यह कैसा कोर्स हुआ भला? हमने बताया, जब किसी कंपनी को ऐसे नौकरों की ज़रूरत हो जिन्हें “कुछ नहीं” आता हो।

तो वह आईआईटी, आईआईएम की परीक्षा पास थोड़ी कर जाएंगे? वहां के छात्रों को तो बहुत कुछ आता है। इस लिए नई कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों की ज़रूरत है जिन्हें कुछ नहीं आता हो। सात-आठ दिन तक तो छात्र दुविधा में थे। उनका कहना था कि वह कोर्स के लिए इच्छुक तो हैं परंतु उन्हें “कुछ नहीं” वाली बात पर संदेह है। ‌हमारे कोचिंग इंस्टिट्यूट ने अगले दिन बाहर बड़ा बैनर लगवाया।

कुल 50 छात्रों की पासपोर्ट साइज़ फोटो का बैनर बनवाया और उसमें लिखा गया कि “कुछ नहीं” कोर्स करके छात्र आज किस किस मुकाम पर हैं। ‌दो दिनों में ही 50 हज़ार आवेदन आ गए। एक दो साल बाद ही हमने कोचिंग सेंटर को वातानुकूलित कर दिया और साथ ही फीस भी दोगुनी कर दी। ‌आज कोचिंग सेंटर की सालाना आय 5 करोड़ से भी अधिक है। ‌

जीवन में आप जो न कर पाएं उसकी सलाह लोगों को ज़रूर दें। इससे लोग आपको सफल और काबिल समझेंगे। ‌जैसे आईएएस की परीक्षा में फेल हुए छात्र शिक्षक बन जाते हैं। जिनको भगवान नहीं मिलते वह बाबा बन जाते हैं। जब आपको मंज़िल न मिले तो लोगों को मंज़िल का पता बताएं।

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