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घरेलू कामगारों को गैर-कार्यशील की श्रेणी में रखना कितना गलत, कितना सही?

‘घर के कामगारों के लिए मेहनताना!’ विश्व भर में बीते कई सालों से इस विषय पर विमर्श चल रहा है। सबके अपने पक्ष हैं। हर पक्ष की अपनी जटिलताएं हैं। भारत में यह विमर्श तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु के एक्टर-टर्न्ड-पॉलीटिशियन कमल हासन ने अपनी चुनावी संकल्पना में घर में काम कर रही औरतों के लिए वेतन या मेहनताना मुकर्रर करने की बात कही।

इस संकल्पना की कांग्रेस नेता शशि थरूर ने सार्वजनिक रूप से सराहना की। हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री कंगना राणावत ने इस पर सख्त आपत्ति जताई। बीते जनवरी से यह विमर्श भारत में तेज़ी पकड़ रहा है। सबके अपने तर्क और तथ्य हैं।

पक्ष और विपक्ष इसपर क्या कहता है?

इस मुहिम के पक्ष में खड़े रहने वाले औरतों की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय स्वतंत्रता की दलील देते हैं। इस धारा के विपक्षी इस बात की जिरह करते हैं कि औरतों के योगदान का मुद्रीकरण नहीं किया जा सकता। इससे आप उन्हें सशक्त नहीं अवमूल्यित करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संगठन (आईएलओ) अवैतनिक कार्य को एक ग़ैर-पारिश्रमिक कार्य के रूप में परिभाषित करता है, जो एक घर या समुदाय में अन्य व्यक्तियों की भलाई और रखरखाव को बनाए रखता है। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह की देखभाल शामिल है।

राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के हालिया दौर के आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाएं पुरुषों की तुलना में हर दिन अवैतनिक कार्य (अनपेड वर्क) पर 297 मिनट (577%) अधिक खर्च करती हैं। वास्तविक शब्दों में एक दिन में अवैतनिक देखभाल के काम में पुरुष केवल 31 मिनट खर्च करते हैं। ऑक्सफैम की 2020 की ‘टाइम इज़ अप‘ रिपोर्ट के अनुसार शहरी भारत में यह अंतर व्यापक है।

96% महिलाएं गैर-कार्यशील की श्रेणी में क्यों?

2011 की जनगणना के मुताबिक, उस वक्त 72 करोड़ लोगों को गैर-कार्यशील आबादी में वर्गीकृत किया गया था।

72 करोड़ में 16 करोड़ लोग घरेलू गतिविधियों में अपनी सेवाओं का निर्वहन कर रहे थे, जिसमें 96% महिलाएं थीं। यह गौरतलब है कि घरेलू गतिविधियों में अपनी सेवाओं के निर्वहन करने वाले लोग, गैर-कार्यशील आबादी में वर्गीकृत किए गए हैं। इसके सीधे मायने ये हैं कि घर का काम कोई काम नहीं होता।

यह पूरा मसला औरतों का मुद्दा लगता है क्योंकि हमारे सामाजिक तौर के तहत औरतें सदियों से गृहस्थ की चालक रही हैं, लेकिन असल में यह मुद्दा घरेलू कर्तव्यों के अवमूल्यन और उपेक्षा का है। यह विमर्श ‘कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता‘ वाले फिल्मी मुहावरे का सत्यापन है। हमारी सुचारू व्यवस्था में किसी और (कॉरपोरेट/राज्य) के लिए काम करने वाले का काम को नापा-मापा जा सकता है। अपने घर-परिवार के लिए काम करने वालों की कोई गिनती नहीं।

घरेलू कर्तव्यों का मूल्य सीधे सामाजिक-सांस्कृतिक स्वीकार्यता से जुड़ा हुआ है

क्या हमारी सामूहिक चेतना इस बात को आसानी से अपने गले के नीचे उतार पाएगी? हर वर्ष महिला दिवस पर ‘महिला है समर्पण का प्रतिबिंब’ जैसे हज़ारों वॉट्सऐप मैसेज घूमते रहते हैं। क्या हमारी साझी ज़हनियत में औरत की त्याग और समर्पण वाली ‘इमेज‘ बदल पाएगी?

ग्रामीण इलाकों की प्रगतिशीलता जांचने से पहले आप यह भी पूछें कि क्या कॉरपोरेट दुनिया में काम करने वाले वर्कहॉलिक को यह स्वीकार्य होगा कि उसके घर पर हो रहा काम भी उतना ही महत्वपूर्ण है? या उससे ज़्यादा? वैवाहिक विज्ञापनों से लेकर टेलीविज़न सीरियलों तक; फ़िल्मों से लेकर पड़ोस की गपशप मिल तक, सभी ‘घरेलू’ दुल्हनों और ‘अच्छी’ गृहिणियों को ही स्वीकारते हैं, जो अपने परिवार का अच्छी तरह से ख्याल रखें।

लड़कियों को पारंपरिक रूप से शादी के लिए ‘प्रशिक्षित’ किया जाता है। “पढ़ के क्या करोगी? चूल्हा चौका ही तो करना है!” यह ऐसा कथन है जो भूगोल और समुदाय की सीमाएं लांग कर हर जगह गंभीर लहज़े में दोहराया जाता है। ‘हर सफ़ल पुरुष के पीछे एक औरत का हाथ होता है!‘ कथनियों के लेप में जिस अदा से हमने इस मुहावरे को भुनाया है, हम एकदम नहीं समझते कि यह एक गंभीर सामाजिक व आर्थिक कथन है।

पुरुष के आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय होने का मुख्य श्रेय घर को चलाने वाले साथी को जाता है

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक शोध के मुताबिक किसी एक पुरुष के आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय होने का मुख्य श्रेय घर को सुचारू रूप से चलाने वाले साथी को जाता है।

किसी परिवार के सोशल कैपिटल का निर्धारण घर के बाहर और घर के भीतर, दोनों कामों के सूचक से तय होता है। इसलिए घर की गतिविधियों में सक्रिय व्यक्ति को आय का 50% मिलना चाहिए।

कॉरपोरेट की सामाजिक ज़िम्मेदारी में यह पाठ खूब चाव से पढ़ाया जाता है और उतने ही चाव से काल्पनिक करार दिया जाता है। विचारों की एक श्रृंखला इस चेष्टा के पक्ष में यह तर्क देती है, कि औरतों के लिए एक मेहनताना तय करने से औरतों की वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है। एक मुद्रीकृत व्यवस्था में एक व्यक्ति की वित्तीय स्वतंत्रता उसके नागरिक अधिकार और स्वतंत्रता से सीधे जुड़ी हुई हैं।

पश्चिम में वित्तीय स्वतंत्रता के बाद तलाक के दरों में वृद्धि हुई और एक साम्यवस्था पर पहुंचने के बाद आंकड़े सामान्य हो गए। यह प्रवृत्ति महिलाओं के श्रम बल में भागीदारी बढ़ने के बाद सामने आई। ज़्यादातर लोग जिन्होंने वित्तीय स्वतंत्रता के बाद विवाह किया, अपने विवेक से किया। उस व्यक्ति से विवाह किया जो उनके काम का मूल्य समझता है और परस्पर आदर रखता है।

2007 में, यूरोपीय संघ के लैंगिक समानता सूचकांक में शीर्ष पर रहने वाली स्वीडन ने घरेलू कामों (सफाई, कपड़े धोने और इस्त्री) के लिए सब्सिडी शुरू की। 13 साल बाद अध्ययनों से संकेत मिलता है कि जिन लोगों ने सब्सिडी का विकल्प चुना था, वे अर्जित आय से अधिक संपन्न हुए।

‘वर्क फ्रॉम होम’ को तवज्जो मिली लेकिन ‘वर्क फॉर होम’ को नहीं

शिक्षा की गुणवत्ता में व्यावहारिक विकास के बाद कार्यबल में महिलाओं का अनुपात बढ़ा तो है लेकिन हमारे देश में कार्यबल में महिलाओं की संख्या रूढ़ि-प्रिय सऊदी अरब की तुलना में अभी भी कम है। कज़ाकस्तान के बाद भारत की महिलाएं दुनिया में सबसे ज़्यादा अवैतनिक कार्य में अपनी ऊर्जा निर्वाहित करती हैं।

आईएमएफ के अनुसार श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के समान स्तर तक बढ़ाने पर, भारत की जीडीपी में 27% बढ़ोतरी हो सकती है। कोरोना के बाद कोई पुख्ता आंकड़े तो नहीं आए हैं पर ऊपरी परिदृश्य को देखकर हमें यह पता चलता है कि महामारी की वजह से जिन परिवारों ने अपने आय के स्रोत खो दिए, आर्थिक संकट से उभरने के लिए ऐसे परिवारों में महिलाएं वैकल्पिक आय के लिए सामने आईं।

यह दुर्भाग्य है कि एक महामारी ने बाज़ारी कार्यशैली में नाटकीय बदलाव ला दिए लेकिन सालों से चली आ रही घरेलू गतिविधियों से जुड़े लोगों की ज़िंदगी में कुछ खास परिवर्तन नहीं आया। ‘वर्क फ्रॉम होम‘ को तो तवज्जो मिली लेकिन ‘वर्क फॉर होम‘ को नहीं!

क्या यह कदम निश्चित तौर पर महिलाओं के हित में बड़ा बदलाव लाएगा?

ऐसा नहीं है कि इस धारा को ज़मीन पर लाते ही संरचनात्मक बदलाव आ जाएंगे और घरेलू कर्तव्यों को प्रासंगिकता मिल जाएगी। इस कदम की भी अपनी आलोचनाएं हैं। जैसे, ग्रामीण परिदृश्य में यह सवाल थोड़ा पेचीदा है। गंवई रूढ़िवादी मानसिकता की वजह से यह औरतों के दोहन का कारण भी बन सकता है।

अगर कोई औरत अपने घर के कामकाज़ से आय उत्पन्न कर रही है तो उसकी पात्रता के साथ, उसकी ज़िम्मेदारियां और बोझ भी बढ़ जाएगा। आज भी उत्तर और दक्षिण भारत के कई इलाकों में औरतें बाहर काम पर जाती हैं और पुरुष किसी तुच्छ क्रिया में लीन घर पर पड़े रहते हैं। शहरी और ग्रामीण के इस विमर्श से अब एक सवाल खड़ा होता है कि पात्रता के सशक्तिकरण में बदलाव की धारा निम्न वर्ग से शुरू होनी चाहिए या उच्च वर्ग से?

अब इस विमर्श में एलीफैंट इन द रूम यह है कि यह मेहनताना/वेतन/भत्ता देगा कौन? क्या राज्य देगा? या पति देगा? या टैक्स सब्सिडी मिलेगी? अगर किसी महिला के दैनिक कार्यों का मेहनताना तय किया जाए और इन कार्यों को बस एक शारीरिक गतिविधि की तरह देखें, तो एक मेट्रोपॉलिटन शहर में एक गृहणी की औसत आय 45,000 से ₹55,000 होनी चाहिए। क्या सरकार इतना भत्ता देगी?

घरेलू कामों को लिंग आधारित खांचे से दूर रखना होगा

अगर इसपर कानून बने, जिसके तहत पति को अपनी वेतन का एक निर्धारित हिस्सा पत्नी को देना पड़े तो क्या यह तार्किक होगा? यह कायदा तो नारीवाद की दूसरी लहर के विरुद्ध हो जाएगा। यह तो फिर पुरुष को प्रदाता ही बना देता है। इस सिद्धांत के आलोचक पूरी तरह से गलत नहीं हैं। जब वे कहते हैं कि इससे लिंग द्विआधारी (जेंडर बाइनरी) और सशक्त होगी।

महिलाओं को अब खांचेवर ढंग से काम करने के लिए मजबूर किया जाएगा और इस प्रगतिशील मुहिम के सामने सामाजिक तरबियत नई जटिलताएं पैदा कर सकती हैं। किसी स्थापित व्यवस्था में जब पावर शिफ्ट होता है और नई व्यवस्था का समसामयिक विनियमन नहीं हुआ होता है तो ऐसी जटिलताएं पैदा होती हैं।

तब जब पारिवारिक मूल्यों में ‘प्रेम’ और ‘कर्तव्य’ की एक पितृसत्तात्मक धारणा स्थापित हो गई है, बतौर समाज हमें एक लंबा रास्ता तय करना है। जब तक घरेलू कामों के लिंग-आधारित खांचे खिचेंगे, तब तक महिलाओं और चूल्हे दोनों की वक़त नहीं समझी जाएगी।

 

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