Site icon Youth Ki Awaaz

विकास की अंधी दौड़ में हम पर्यावरण को आखिर कहां ले जा रहे हैं?

Cutting Of Trees

पेड़ों की कटाई

आज समूचे विश्व में इस सदी की सबसे बड़ी करोना महामारी द्वारा मची तबाही और विनाश का मंज़र दिखाई पड़ रहा है। इस महामारी में 1.5 लाख से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं।

वहीं, लगभग 22 लाख लोग इस गंभीर बीमारी से संक्रमित हैं। आलम यह है कि सम्पूर्ण विश्व की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवथा और अनुपालन को तार-तार करते हुए यह मनुष्य के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगाने की  कगार पर आ चुका है।

लगभग सम्पूर्ण विश्व में फैली यह अप्रत्याशित उथल-पुथल, विपदापूर्ण रोष और कार्यविहीन वंचित करोड़ों का जन समुदाय निकट भविष्य में सकारात्मक संकेत के अभाव को देखते हुए इस महामारी को मानव द्वारा पृथ्वी पर किए गए दुर्व्यवहार और प्राकृतिक संसाधनो के अनियंत्रित दोहन  के  विरुद्ध पृथ्वी की प्रतिक्रिया या रोष के रूप में भी  मानने लगा है।

पर्यावरण दोहन और जलवायु परिवर्तन

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Getty Images

पृथ्वी की सार्वभोमिक महत्ता, जीवनदीयिनी प्रकृति और मनुष्य की निर्भरता को ध्यान में रखते हुए पहली बार तत्कालीन औद्योगिक क्रांति के विरोध के रूप में अमेरिका के लोगों ने सन् 1970 में गेलॉर्ड नेल्सन के मार्गदर्शन में 22 अप्रैल को पहला पृथ्वी दिवस मनाया जिसे बाद में संयुक्त राष्ट्र ने 2009 में ‘अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी  दिवस’ के रूप में मान्यता दी।

मानवजानित क्रियाकलापों से प्रेरित वैश्विक ग्रीनहाउस उत्सर्जन द्वारा जलवायु परिवर्तन जैसी  विभिन्न विनाशकारी परिणामों से जैव विविधता के विलुप्त होने, खाद्य सुरक्षा में कमी, ग्लेशियरों  का  पिघलना, सूखा, बाढ़ और  विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों और जैव विविधता का विनाश जैसी विनाशकारी घटनाएं अब  चरम सीमा पर पहुंच चुकी है।

50 वर्ष पूरा कर चुके पृथ्वी दिवस का 2020 का मुख्य विषय भी जलवायु परिवर्तन ही निर्धारित हुआ है, जो कि वर्तमान समय में मानव समाज और सभ्यता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनौती है।

भारतीय संस्कृति और प्रकृति प्रेम

भारतीय संस्कृति में प्रकृति प्रेम और उसका संरक्षण हमेशा से ही महत्वपूर्ण माना गया है। अथर्ववेद के मन्त्र १२.१.१२ के अनुसार,  “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: पर्जन्य: पिता स उ न: पिपर्तु” अर्थात् मैं तो तुम्हारे (पृथ्वी) पुत्र के जैसा हूं, तुम मेरी माँ हो और मेघों का हम पर पिता के जैसा साया बना रहे।”

कालांतर में प्रकृति पर विकास और अर्थशास्त्रीय प्राबल्य, नीतिगत और राजनीतिक उपेक्षा के साथ-साथ जन मानस  में प्रकृति के उपादानों के प्रति  लगाव की कमी और बढ़ती उपेक्षा ने प्रकृति और मनुष्य के मध्य अन्योन्य सम्बन्धों को कठोर और उग्र बना दिया है।

फलस्वरूप पुराणों में भूमि, वसुंधरा, विश्वंभरा, सर्वसहा, मृणमयी, रत्नगर्भा आदि नामों से वर्णित जीवनदायिनी धरा आज मनुष्य के क्रियाकलापों से मलिन और व्यथित होकर रौद्र रूप में दर्शित हो रही है।

विकास की अंधी दौड़ और वैश्वीकरण

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

संसाधनो के अनियंत्रित दोहन के नकारात्मक परिणामों को जानने के बावजूद मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़, वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद की आड़ में अपनी ज़रूरत और लालच दोनों को पूरा करने के लिए धरती के संसाधनों का क्षमता से परे अविरल दोहन जारी रखा है।

इसके अलावा पर्यावरण पर विकास का निरंतर वर्चस्व और नीति निर्माताओं के बीच विभिन्न पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए प्राथमिकता और चिंता की कमी ने भी पृथ्वी पर कई रूपों में बहु स्तरीय शोषण और दोहन  बदस्तूर जारी रखा है।

एक जीवदायिनी माँ की तरह पृथ्वी अपने ऊपर होते हुए इन अविरल आघातों का पिछले कुछ समय से विभिन्न संकेतों के माध्यम से गुस्से के रूप में जवाब देती रही है, जो कि कभी  भूकंप या बाढ़ या सुनामी या जल स्तर का बढ़ाव  जैसे  संकेतों के रूप में परिलक्षित होता आया है।

वन्य प्राणियों से उत्पन्न होते हैं संक्रामक रोग

कुछ समय पूर्व फैली ‘SARS’ जैसी महामारी भी इसी तरह का कुपित संकेत है जिसके नेपथ्य में वन्य जीवों का भोजन के रूप में उपयोग  एक मुख्य कारण माना गया है मगर आंखों में विकास का अंधा चशमा चढ़ाया मनुष्य ना तो इन संकेतों को ध्यान देना चाहता है और ना ही इसके द्वारा पैदा हुए कुपरिमाणों का आत्म निरीक्षण।

संक्रमित रोगों से सम्बंधित एक अध्ययन में यह भी पाया गया है कि SARS, MERS, EBOLA, AIDS इत्यादि सहित लगभग दो-तिहाई संक्रामक रोग वन्य प्राणियों से उत्पन्न होते हैं।

इसी नेपथ्य में वन्य प्राणियो का उपभोग और वर्तमान COVID-19 महामारी के बीच संबंध की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, जो मनुष्य द्वारा जैव विविधता और आवास के विनाश के प्रत्यक्ष प्रभाव को दर्शाता है।

चिंतकों, समाजसेवकों और सामान्य जन  मानस का एक बहुत बड़ा समुदाय जहां एक ओर मनुष्य द्वारा पृथ्वी के इन संकेतों की अनदेखी करते हुए दूरगामी परिणामों की सतत उपेक्षा को ही वर्तमान परिस्थिति का ज़िम्मेदार मानने लगा है जो काफी सीमा तक उपयुक्त भी प्रतीत होती  है।

प्रकृति पर मानव का वर्चस्व

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोट साभार- सोशल मीडिया

वहीं, दूसरी ओर परिमाण स्वरूप अविस्मरणीय सदमें के रूप में आई यह महामारी पृथ्वी और पर्यावरण के मध्य संतुलन की नाज़ुकता के मध्य मानव के दुर्व्यवहार का एहसास भी दिलाती है।

मनुष्य का यही अहंकार और दुस्साहस इस नेपथ्य में रेने डेसकार्टेस (1596-1650) के उस कथन के रूप में परिलक्षित हुआ है जहां उन्होंने मनुष्य का प्रकृति के ऊपर वर्चस्व को वर्णित करते हुए कहा है, “हम उन्हें (उसी तरह अग्नि, जल, वायु, तारे पर) भी लागू कर सकते हैंऔर इस तरह खुद को प्रकृति के स्वामी और अधिकार प्रदान करते हैं।”

उत्तरजीविता के लिए मनुष्य का प्राकृतिक संसाधनों का दोहन एक अपरिहार्य सच्चाई है मगर मानव जाति के भविष्य और अस्तित्व के लिए पर्यावरण और विकास के नाज़ुक सम्बन्धों के परिपेक्ष में प्रतिबद्धित नीति और नियति से सम्रद्ध कार्यचरन प्रणालिका और उसका यथार्थ क्रियान्वयन वर्तमान परिस्थिति की मांग है।

इसके लिए आत्मावलोकन के साथ साथ प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण तथा विवादहीन उपभोग वाली मज़बूत निर्णायक नीतियों का हस्तक्षेप ही मांगों और आपूर्ति के बीच सामंजस्य ला सकता है और जलवायु परिवर्तन की चुनौतीयों का भी सक्षम रूप से सामना कर सकता है।

उक्त परिपेक्ष में नवयुवकों, सरकारों, नौकरशाहों, समाजसेवी संस्थानों और समुदायों में जागरूकता के साथ साथ वांछित पहल और ठोस कदम ही आने वाली पीढ़ियों और सतत विकास के लिए प्रधान विकल्प हैं।

मौजूदा हालात चिंताजनक

वर्तमान हालातों का आंकलन यह तो संकेत देता है कि आज नहीं तो कल मनुष्य इस महामारी पर विजय प्राप्त कर ही लेगा। हालांकि यह भी निश्चित है कि मुख्यतः जलवायु से संबंधित परिवर्तन और जैव विविधता के विनाश के संदर्भ में पहली बार एक विपदा ने सम्पूर्ण मानव समाज को नए सिरे से आत्मनिरीक्षण एवं अपने कार्यकलापों के पुनर्मूल्यांकन करने के लिए बाध्य कर दिया है।

इतिहास गवाह है कि किसी भी आपदा और विपदा पर विजय के बाद उनसे सीख ना लेना मनुष्य की मुख्य  प्रवृत्ति रही है लेकिन हमें इस बार इस दिशा में विशेष सतर्कता और सावधानी रखते हुए भविष्य की योजनाओं एवम सुधारात्मक कार्यों को प्राथमिकता देनी है।

यही नहीं, गंभीर प्रतिबद्धता के साथ नीतिगत और आर्थिक समर्थन भी मुहय्या कराना होगा अन्यथा इस दिशा में थोड़ी सी चूक और प्रतिबद्धता की कमी  अगली बार पृथ्वी का कोप एक नए और विकराल रूप में दर्शित होगा जो  सम्पूर्ण  मानव जाति के अस्तित्व  के बचाव पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा  कर देगा।

पृथ्वी दिवस के इस अवसर पर हम सभी को विभिन्न स्तर पर व्यक्तिगत और सामुदायिक प्रयासों को शामिल करने के साथ-साथ नीतिगत हस्तक्षेप और प्रतिबद्धताओं को मूर्त रूप देना होगा।

तभी हम विकास, उपभोक्तावाद और पर्यावरण के मध्य नाजुक संतुलन की परिरक्षा कर पाएंगे और स्थाई विकास एवम प्रकृति के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के उद्देश्यों को प्राप्त करने के साथ-साथ COVID जैसे महामारियों का भविष्य में डटकर मुक़ाबला कर पाने में सक्षम होंगे।


संदर्भ- हिन्दुस्तान, history.com, ijmr.org, humanistictexts.org

Exit mobile version