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सरकारों की आदिवासी एवं जनविरोधी नीतियां ही नक्सलवाद के लिए ज़िम्मेदार हैं

सरकारों की आदिवासी एवं जनविरोधी नीतियां ही नक्सलवाद के लिए ज़िम्मेदार हैं

वर्तमान समय में देश के अनेकों इलाकों में नक्सलवाद एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। बिजापुर में हुए नक्सली हमले में हमने अपने 22 जवान खो दिए, किंतु क्या यही सच है? क्या वाकई नक्सली इतने क्रूर होते हैं और वो किस तरह कि लड़ाई लड़ रहे हैं? इन सभी बातों को जानना आवश्यक है।

पिछले दिनों ट्विटर पर #बस्तर_में_नरसंहार_बंद_हो ट्रेंड हुआ, क्योंकि वहां सीआरपीएफ की चौकी बनाए जाने का वहां के स्थानीय आदिवासी विरोध कर रहे हैं। इसी विरोध प्रदर्शन के समय वहां पुलिस जवानों ने आदिवासियों पर गोलियां चलाईं।

प्रशासन का कहना है कि गोलियां इसलिए चलाई गईं, क्योंकि भीड़ जवानों पर पत्थरबाजी कर रही थी और वो चौकी में आग लगाने का प्रयास कर रही थी, परन्तु स्थानीय लोगों का कहना है कि हमारे शांतिपूर्ण प्रदर्शन को खत्म करने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं थी।

देश में नक्सलवाद के उदय होने के पीछे मुख्य कारण क्या हैं? 

देश में आज़ादी के बाद से ही हमारे देश में नक्सलवाद एक बड़ी समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है। नक्सलवाद जमींदारों के खिलाफ शुरू हुआ एक हथियारबंद आंदोलन था, जो अब सरकार की नीतियों के खिलाफ एक सशक्त आंदोलन बन चुका है, जिसके लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार सरकारें ही रही हैं।

जमींदारों ने धोखाधड़ी करके सीधे-साधे आदिवासियों से उनकी ज़मीनें छीनी और सरकारें तमाशबीन बनी रहीं। शिक्षा और धन के अभाव में वो लोग अपनी लड़ाई को लड़ने में असमर्थ थे और सरकारों में जमींदारों का रसूख रहा, जिस कारण आदिवासियों की आधारभूत समस्याओं पर कभी किसी का ध्यान ही नहीं गया। 

इस सब से त्रस्त होकर कुछ लोगों ने जमींदारों के खिलाफ हथियारबंद आंदोलन छेड़ दिया। पहले लड़ाई केवल अपनी ज़मीन बचाने तक रही फिर यह लड़ाई व्यापक हो गई। नक्सलियों ने अपनी सेना बनाई और उन सभी आदिवासियों को इसमें शामिल किया जिनके साथ किसी भी प्रकार का अन्याय हुआ हो।

यही नहीं आदिवासी अपने जंगलों से बहुत प्रेम करते हैं और सरकारें उन्हीं जंगलों को अपने लालच के लिए उजाड़ रही हैं, जब आदिवासी इसका विरोध करते हैं, तो सरकारें उनसे बातचीत ना कर उनके खिलाफ बल प्रयोग करती हैं। यही बल प्रयोग आदिवासियों को हथियार उठाने के लिए विवश करता है। नक्सली इन्हीं सब बातों को उन लोगों के सामने रखकर उन्हें अपनी सेना में शामिल कर लेते हैं जिनके साथ अन्याय हुआ हो और उस समय सरकार केवल एक तमाशबीन मूकदर्शक की भांति देखती रहती है।

आदिवासियों के प्रति सभी सरकारों का रवैया एक समान है 

नक्सली इलाकों में सरकार चाहे किसी की भी रही हो, सभी सरकारों ने इस समस्या का समाधान केवल हथियारों के बल पर ही सोचा है, जबकि इस रणनीति से नक्सलवाद और मज़बूत हुआ है। सैन्य कार्रवाई में फर्जी मुठभेड़ों की बहुत सी खबरें हमारे सामने आई हैं, जिसमें मासूम आदिवासियों को नक्सली बताकर उनका कत्ल कर दिया गया, किंतु आज तक कभी भी दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है।

छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार के वक्त कांग्रेस नक्सलियों से संवाद की और आदिवासी इलाकों में हिंसा की घटनाओं को बंद करने की बात किया करती थी, किंतु आज जब कांग्रेस छत्तीसगढ़ में सरकार चला रही है तब वह आदिवासियों से बात ना करके उनके खिलाफ सैन्य अभियान चला रही है और यह सैन्य कार्रवाई आदिवासियों के मन में सरकारों के प्रति घृणा का भाव उत्पन्न करती है।

जिस कारण वे मासूम आदिवासी अन्याय के प्रति बहुत ही आसानी से हथियार उठाकर सरकार के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में चाहे भाजपा सरकार रही हो या कांग्रेस सरकार रही हो दोनों ही सरकारों ने कभी भी वार्ता के मंच पर नक्सलियों को आमंत्रित नहीं किया जिससे कि इस समस्या का समाधान खोजा जा सके। केवल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए दोनों ही दलों की सरकारें नक्सली इलाकों में सैन्य कार्रवाई को तवज्जो देती रही हैं, जो कि हमारे देश में नक्सलवाद के बढ़ावे का एक सबसे बड़ा कारण रहा है।

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