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ग्रामीण भारत के सामाजिक ताने-बाने की झलक दिखलाती हैं प्रेमचंद की कहानियां

ग्रामीण भारत के सामाजिक ताने-बाने की झलक दिखलाती हैं प्रेमचंद की कहानियां

बेबस किसान, अनमेल विवाह और दहेज़ प्रथा के बीच झुंझलाती भारतीय महिला, हर दिन ज़हर के समान अस्पृश्यता का घूंट लगाते दंपति, बेटे का सुख ना दे पाने के कारण लज्जित होती माँ, भ्रष्ट अधिकारियों के बीच ईमानदार दारोगा, असामान्य स्थितियों को संभालती बड़े घर की बेटी जैसे कई पात्रों से अपनी कहानियां गढ़ने वाले हिंदी साहित्य के महान शिल्पकार थे मुंशी प्रेमचंद। ये पात्र हमारे जीवन से कुछ अलग नहीं हैं। ये कहानियां हमारी कहानियों से जुदा नहीं हैं। इसलिए भी इन कहानियों से जुड़ पाना आसान होता है।

हिंदी साहित्य के महान शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद

सीधे प्रेमचंद की कहानियों पर बात करने से पहले हमें उस समय के सामाजिक परिदृश्य को समझना भी बहुत ज़रूरी है। हमें समझना होगा, उन परिस्थितियों को जिन्होंने उनके लेखन को इस कदर प्रभावित किया। ‘सोज़-ए-वतन’ नाम से नवाबराय यानी प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह 1907 में प्रकाशित हुआ था।

यह बात काबिले गौर है कि यह वही समय था, जब देश में सामंतवाद और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई अपने चरम पर थी। यही वजह है कि इस संग्रह की कहानियों में प्रेमचंद का देशप्रेम भी झलकता है लेकिन हमीरपुर के ज़िला  कलेक्टर ने इस कहानी संग्रह को देशद्रोही करार दिया और इसकी सारी प्रतियां जलवाकर नष्ट करवा दीं। इस घटना से उन पर और उनके लेखन पर कोई खास असर नहीं पड़ा। इस वाकये के बाद नवाबराय से, वे प्रेमचन्द हो गए और कई कहानी और उपन्यास इसी नाम से हिंदी साहित्य में लिखे।

भारत छोड़ो आंदोलन का एक दृश्य

प्रेमचंद अपनी कहानी ‘नैराश्य’ में दर्शाते हैं कि हमारे समाज में लड़कियों के जन्म में तथाकथित पिछले जन्म के पाप का बिल्ला टांग दिया जाता है। यह जानते हुए भी कि बच्चे के लड़के या लड़की के रूप में पैदा होने में माता-पिता दोनों ही बराबर ज़िम्मेदार होते हैं फिर भी हमारे समाज में महिलाओं को ही लड़की पैदा करने का कसूरवार ठहराया जाता है। इस कहानी की मुख्य पात्र निरुपमा के सर भी लगातार 3 लड़कियां पैदा करने का इल्ज़ाम मढ दिया जाता है। यह कहानी केवल एक निरुपमा की नहीं है बल्कि यह हर उस निरुपमा की कहानी है, जो हमारे आसपास अभी भी समाज में मौजूद लड़कियों के प्रति हीन मानसिकताओं का शिकार है।

प्रेमचंद की कहानियों के पात्रों के नाम भी अपने आप में समाज के लिए भी अनोखे प्रतीक हैं। उन्होंने ज़्यादातर उन नामों को तवज्जो दी है, जो दबे-कुचले वर्ग के लोगों के माने जाते हैं। होरी, धनिया, गोबर, गंगी, घीसू, हलकू, दुखी जैसे पात्रों से प्रेमचंद ने कहानियां लिखीं। उन्होंने सदियों से दबाई जा रही दलितों और महिलाओं की आवाज़ को बुलंद किया। समाज में परम्पराओं के नाम पर प्रचलित तमाम तरह की रूढ़ियों और हीन मानसिकता से लैस हमारे समाज की उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से कटु आलोचना की।

हिंदी साहित्य के महान शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद की पुस्तकें

 

आधुनिक भारतीय साहित्य के महान हिंदी उपन्यासों में से एक ‘गोदान’ ग्रामीण समाज और कृषि जीवन को मार्मिक ढंग से पाठक के सामने रखता है। वहीं ‘नमक का दारोगा’ कहानी के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद ने सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार पर तीक्ष्ण चोट की है। इस रचनाकार ने महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर बढ़-चढ़कर अपने विचार व्यक्त किए।

एक ओर तो उन्होंने अपनी कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ के माध्यम से स्पष्ट किया है कि किसी भी घर में पारिवारिक शांति और सामंजस्य बनाए रखने में घर की स्त्रियों की अहम भूमिका होती है। वहीं दूसरी ओर ‘निर्मला’ नामक उपन्यास में निर्मला के माध्यम से भारत की मध्यवर्गीय युवतियों की दयनीय हालत का चित्रण भी किया है, जो अनमेल विवाह और दहेज़ प्रथा की मार झेल रही हैं।

ग्रामीण भारत के सामाजिक ताने-बाने परिदृश्यों के पुरोधा मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंद का आरंभिक कथा-साहित्य कल्पना, संयोग और रूमानियत के ताने-बाने से बुना गया है, लेकिन एक कथाकार के रूप में उन्होंने लगातार इस विधा का विकास किया और वे सामाजिक जीवन को कहानी का आधार बनाने वाली यथार्थवादी कला के अग्रदूत के रूप में सामने आए। उन्होंने आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से आलोचनात्मक यथार्थवाद तक की विकास-यात्रा की।

आज़ादी की बात भी हाकिम का मुंह देखकर कहने का उन दिनों रिवाज़ था। कुछ लोग थे, जो इस रिवाज़ को नहीं मानते थे। मुंशी प्रेमचंद भी उन्हीं सिरफिरों में से एक थे। अपने लेखन के आखिरी वर्षों तक आते-आते उन्होंने अपने लेखन में कठोर वास्तविकता को प्रस्तुत करने में स्थितियों से जरा भी समझौता करना वाजिब नहीं समझा। इस तरह धनपत राय से नवाब राय और फिर मुंशी प्रेमचंद बनने तक की यात्रा में वे कई हज़ारों लोगों की आवाज़ बने और अपना हिंदी साहित्य के इतिहास में विशेष स्थान अपने नाम कर गए।

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