Site icon Youth Ki Awaaz

एक टीबी सर्वाइवर से सुनिए देश के स्वास्थ्य तंत्र एवं सरकार की नीतियों की दुर्दशा

एक टीबी सर्वाइवर से सुनिए देश के स्वास्थ्य तंत्र एवं सरकार की नीतियों की दुर्दशा को

नई और बेहतर दवाओं के होने के बावजूद भी, हमारे मौजूदा स्वास्थ्य सिस्टम का हाल यह है कि वो मरीज़ों की तकलीफ कम नहीं कर पा रहा है।

फर्ज कीजिए कि आपको एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसका इलाज तो है फिर भी आप ठीक नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि आप इलाज तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं। किसी बीमारी का इलाज होते हुए भी मरीज़ को समय से उचित इलाज ना मिलना क्या यह ‘इंसानियत के खिलाफ’ अन्याय नहीं है?

देशभर में ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी मरीज़ों को बीमारी के साथ और तकलीफें भी झेलनी पड़ रही हैं। टीबी की नई और बेहतर दवाओं के होने के बावजूद भी, मौजूदा स्वास्थ्य सिस्टम मरीज़ों की इन तकलीफों को कुछ खास कम नहीं कर पाया है। नई दवाएं ना मिलने की वजह से मरीज़ों को टीबी के लम्बे इलाज से गुज़रना पड़ता है, जिसका पालन करना बहुत मुश्किल है।

क्या है ऑल-ओरल रेजिमेन?

कई रिसर्च ट्रायल से ये पता चला है कि जहां ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी का इलाज सालों चलता था, अब वहीं ऑल-ओरल रेजिमेन का उपयोग करके हम इस बीमारी का इलाज 6 महीने में भी कर सकते हैं।

इस तरीके से हम दवाइयों के साइड इफेक्ट को कम कर सकते हैं और मरीज़ों के ठीक होने की सम्भावना को बढ़ा सकते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारत के ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी मरीज़ों को ऑल-ओरल रेजिमेन की कितनी ज़रूरत है।

हालांकि, ऑल-ओरल रेजिमेन के विकास की अगर बात की जाए, तो इसे लेकर नेशनल टेक्निकल एक्सपर्ट ग्रुप के सुझाव को भारत टीबी रिपोर्ट 2021 में दोहराने के अलावा कुछ खास काम नहीं हुआ है। उनका सुझाव था कि जो मरीज़ छोटे ऑल-ओरल रेजिमेन के योग्य नहीं हैं, उन्हें लम्बे ऑल-ओरल रेजिमेन से ठीक करने की कोशिश की जाए।

आज भी भारत में ड्रग रेजिस्टेंट टीबी मरीज़ों के लिए छोटे ऑल-ओरल रेजिमेन उपलब्ध कराने पर ना ही ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है और ना ही इसमें खासा साधन लगाए जा रहे हैं। 

छोटे ऑल-ओरल रेजिमेन के इस्तेमाल से हम काफी हद तक मरीज़ की तकलीफ को घटा सकते हैं, यह जानते हुए भी भारत में इस रेजिमेन को उपलब्ध कराने के तरीके पर ज़्यादा गौर नहीं किया गया है। अगर हम इस सोच के स्तर पर भी महत्व नहीं दे रहे हैं, तो देशभर में सभी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी मरीज़ों तक ऑल-ओरल एंटीट्यूबरकुलर रेजिमेन कैसे पहुंचाएंगे? टीबी का इलाज असरदार तरीके से और कम-से-कम समय में कैसे करेंगे?

टीबी से लड़ने के लिए, ऐसी दवाओं का उपलब्ध होना ज़रूरी है, जो असरदार भी हों और जिनके साइड इफेक्ट भी कम हों। अच्छा इलाज और असरदार दवाएं मिलना सिर्फ़ ज़रूरी ही नहीं बल्कि सबका मौलिक अधिकार भी है।

एक एक्सएक्सडीआर टीबी (XXDR-TB) सर्वाइवर होने के नाते मैं ये कह सकती हूं कि अगर मुझे बेडाक्विलाइन और डेलामनिड जैसी नई और असरदार दवाएं नहीं मिलती, तो मैं टीबी को पूरी तरह से कभी हरा नहीं पाती। मैं इस जानलेवा बीमारी से लड़ पाई, क्योंकि मेरे डॉक्टर बहुत जानकार और कुशल थे, सिर्फ इतना ही नहीं, मुझे नई दवाएं मिली और मेरे इलाज का निरीक्षण भी समय-समय पर सही ढंग से हुआ था।

नई दवाओं का ना मिलना 

आज जब दुनिया अब तक लाइलाज कोविड महामारी से लड़ रही है, ज़रा उन लोगों के बारे में सोचिए जिनकी बीमारी का इलाज तो है लेकिन वो इलाज तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं। यदि ठीक समय पर उन्हें अगर ये दवाएं नहीं मिलीं, तो उनका बचना बहुत मुश्किल है, अगर बच भी गए तो उन्हें अपनी सारी ज़िन्दगी इस बीमारी के साइड इफेक्ट्स के साथ जीना होगा।

हम यह क्यों नहीं समझते हैं कि ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी के इलाज के लिए छोटे ऑल-ओरल रेजिमेन का इस्तेमाल ना करने का बोझ मरीज़ और पब्लिक हेल्थ दोनों पर पड़ता है। ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी से लड़ना कठिन है। इसका इलाज अक्सर लम्बा चलता है और इलाज के कई साइड इफेक्ट भी होते हैं, जैसे आंखों की रौशनी जाना, ठीक से सुनाई नहीं देना, रोज़ उल्टी आना, चक्कर आना और अन्य प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं। 

ज़्यादातर ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी मरीज़ को लम्बे ऑल-ओरल रेजिमेन की सुविधा नहीं मिल पाती है और ऐसे में आम इलाज के तहत करीब 6 महीने तक रोज़ इंजेक्शन लगवाना पड़ता है। एक ही जगह रोज़ इंजेक्शन नहीं दे सकते, तो इंजेक्शन देने की जगह को रोज़ाना बदलना पड़ता है।

इस प्रक्रिया में बार-बार जगह बदलने के बाद भी सुई से हुए पिछले जख्मों को भरने में कुछ समय लग ही जाता है। ऐसे में अक्सर मरीज़ को सुई देने की जगह भी मुश्किल से मिलती है। 

भारत ही नहीं दुनिया भर में हज़ारों मरीज़ आज भी इस पुराने और दर्दनाक इलाज के सहारे ही बीमारी से लड़ रहे हैं, जबकि अब हमारे पास इलाज की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं। हमें ये सोचना चाहिए कि क्यों आज भी ये हज़ारों लोग नई दवाओं और बेहतर इलाज तक नहीं पहुंच पा रहे हैं? क्यों इन मरीज़ों को अपनी बीमारी के साथ-साथ ये परेशानियां भी झेलनी पड़ रही हैं? क्या यह सब हमारे मानवाधिकारों के खिलाफ नहीं हैं?

इन सबसे हमारे पब्लिक हेल्थ पर भी काफी असर पड़ता है। छोटे ऑल-ओरल रेजिमेन के उपयोग से हम मरीज़ का इलाज अभी की तुलना में ज़्यादा आसानी से पूरा कर पाएंगे। अगर इसका उपयोग हम नहीं करते हैं, तो मरीज़ों को तो तकलीफ होगी ही, इसके साथ ही इलाज पूरा ना होने से ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी के मामले भी देश में बढ़ते जाएंगे।

जिसके कारण हमें इस बीमारी को रोकने के लिए ज़्यादा संसाधनों का उपयोग करना पड़ेगा। भारत वैसे भी ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी के मामलों में दुनिया भर में सबसे आगे है और इस संकट से लड़ने में जूझ रहा है। ऐसे में अगर यह  संकट और बढ़ जाए, तो भारत से यह स्थिति संभाले नहीं संभलेगी, क्योंकि हमारे पास स्वास्थ्य साधनों की वैसे ही कमी है।

इस समस्या को कैसे सुलझाएं?

सबसे पहले सरकार के पास छोटे ऑल-ओरल रेजिमेन के लिए एक प्लान हो। ये रेजिमेन लोगों तक सुरक्षित तरीके से कैसे पहुंचाया जाएगा, इसके लिए हमें असरदार रणनीतियां चाहिए। ये ध्यान रखना होगा कि रेजिमेन सब ज़रूरतमंदों तक पहुंचे, किफायती दामों में मिले साथ ही प्राइवेट और सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में उपलब्ध हो।

इस मामले में सिर्फ सरकार की नहीं, दवा कंपनियों की भी ये नैतिक और कानूनी ज़िम्मेदारी है। ये कंपनियां काफी हद तक जनता के भरे हुए टैक्स से अपने रिसर्च और दवाइयां बनाने का काम करती हैं। ऐसे में इन पैसों से बनी दवाएं जनता को ही ना मिल पाएं, ये तो सही नहीं होगा ना। 

कम या मध्यम आय वाले देशों में, जहां ज़्यादातर लोग महंगी दवा नहीं खरीद सकते, इन कंपनियों को सरकार के साथ मिलकर किफायती दामों में, वहां दवा उपलब्ध करानी चाहिए।

एक सामाजिक नागरिक और टीबी सर्वाइवर होने के नाते, हमें ऑल-ओरल रेजिमेन को उपलब्ध कराने की मांग करते रहनी होगी। इस बीमारी का इलाज होते हुए भी, किसी को इस तक पहुंचने में, महंगे दाम और उपलब्धता ना  होने जैसी रुकावटों का सामना करना पड़े, ये सरासर गलत है।

मैं अगर आज ज़िंदा हूं, तो केवल इसी वजह से कि मुझे सही समय पर नई दवाएं और डॉक्टरों की अच्छी टीम मिली। सबकी किस्मत मेरी तरह अच्छी नहीं होती। मरीज़ को सही और असरदार इलाज मिलना उसका मानवीय अधिकार है और मरीज़ तक इसे पहुंचाने में देरी या इलाज ना प्रदान करना किसी गुनाह से कम नहीं है। 

नोट- देबश्री लोखंडे, ड्रग रेज़िस्टैंट टीबी की एक सर्वाइवर हैं, जो करीब साढ़े-सात साल तक टीबी से लड़ती रहीं और इसके साथ ही सर्वाइवर्स अगेंस्ट टीबी की एक फेलो और एक पेशेंट एडवोकेट भी हैं।

Exit mobile version