भारत आज एक अत्याचार और समस्या से लगातार ग्रस्त है। भारत का मेहनतकश वर्ग जब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, उस समय में यह रेखांकित करना बेहद ज़रूरी हो जाता है कि आखिर क्या कारण है कि इतनी समस्या के बाद भी लोग विरोध के लिए नहीं उतर पा रहे हैं?

जहां एक तरफ व्यापक बेरोज़गारी की समस्या युवाओं को ग्रास रही है, वहीं मध्यम वर्ग की हालत, नौकरियों के जाने, महंगाई के बढ़ने और सरकारी नौकरियों के कम होने के कारण बदतर हालत में पहुंच गई है।

भूमिहीन किसान और सर्वहारा वर्ग क्रांति से बहुत दूर

सारा देश आज एक सुर में बोल रहा है कि मोदी इस देश को पूंजीपतियों के हाथों में बेच रहा है और हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा। वही मज़दूर किसान, जो सत्ता हस्तानांतरण के बाद से ही इस दमनकारी राज्यनीति का शिकार रहा है और नए संशोधनों के आने से खासा निराश और परेशान है। किसान पिछले 137 दिनों से दिल्ली के बॉर्डर पर धरने पर बैठा है।

मुस्लिमों के साथ लगातार दोयम दर्जे के नागरिक सा व्यवहार किया जा रहा है और ऐसा कोई भी स्पेस नहीं जहां उन्हें उनकी धार्मिक पहचान के कारण तानाशाही ताकतों द्वारा निशाना नहीं बनाया जा रहा है। हर तरफ एक रोष है, परेशानी है, पर सुनियोजित पहल की कमी दिखती है।

राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो आंदोलनों में लीडर्स से ज़्यादा जनता तैयार नज़र आई है। चाहे वह सीएए एनआरसी हो, किसान आंदोल या हो फिर छात्र आंदोलन। मगर सब्जेक्टिव फोर्सेज़ (जो आंदोलन को दिशा देने, अगुआई करने का काम करते हैं) उस प्रकार से कुछ उदहारण को छोड़ दें तो अपनी भूमिका निभाने में असफल रहे हैं।

bhagat singh farmers protests

इसका प्रमाण हमें 26 जनवरी के प्रॉटेस्ट में भी देखने को मिला जहां जनता पिछले 3 महीने से धरने पर चुप-चाप बैठी है और जब उसमें से कुछ लोग लाल किले पर पहुंच जाते हैं तो समस्त लीडरशिप उन्हें गलत ठहराने में लग जाती है। हम जनता के गुस्से को राजकीय हिंसा के समानांतर रख के कैसे देख सकते हैं?

इसके अलावा भी जब बीजेपी विधायक को पंजाब में पीटा गया तो उसी प्रकार की बयानबाजी फिर से दोहराई जाने लगी। मगर कोई ऐसा दिन नहीं गुजर रहा जब हमें यह सुनने को ना मिलता हो कि किसी शहर, कस्बे या गांव में पुलिस की बेरहमी से मेहनतकश जख्मी ना हुए हों। परंतु उससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि हमारा सबसे क्रांतिकारी वर्ग भूमिहीन किसान और सर्वहारा, क्रांति के इस मोर्चे से अब भी काफी दूर खड़ा है।

बड़ी आबादी पलायन को मजबूर

आंदोलन और उसका प्रसार पंजाब, ओडिशा, छत्तीसगढ़, तेलांगना, पश्चिम बंगाल, झारखंड और हरियाणा को छोड़ दें तो ज़्यादातर शहर केंद्रित है। मगर यह भी सच है कि इन राज्यों की एक बड़ी आबादी आज रोज़गार की तलाश में पलायन करने के लिए बाध्य है। भारत के अंदर किसी भी प्रकार के बुर्जुआ क्रांति की अनुपस्थिति ने जहां यहां के निम्न व भूमिहीन किसानों की चेतना को विकसित होने से रोका, वहीं उनकी मांग तक पहुंचने से भी रोका।

जिसका एक बड़ा परिणाम यह है कि उनके अंदर राज्य को चुनौती देने वाली चेतना का प्रसार भी नहीं हो सका। इसके अलावा देश का राष्ट्रीय पूंजीपति जिसके पास पहले ही पूंजी की व्यापक कमी थी, वह 1947 के बाद दलाल पूंजीपतियों की अगुआई के कारण कभी भी अपने लिए संघर्ष के लायक जमीन नहीं बना पाया।

फ्रांस की क्रांति के बाद भी सर्वहारा की लड़ाई जारी क्यों रखनी पड़ी?

यूरोप के अंदर बुर्जुआ क्रांति होने का एक कारण पूंजीपतियों के खुले बाज़ार की मांग थी, जो कि सामंतवाद के कारण काफी हिस्सों में बंटा हुआ था। साथ में कारखाने में जिन श्रमिकों की आवश्यकता थी वह सर्वहारा जमीन से बंधा हुआ था। इसलिए सामंतवादी विरोधी हिंसक संघर्ष में पूंजीपतियों का साथ गरीब व भूमिहीन किसानों ने भी दिया था।

लोगों की चेतना के विकास के लिए पूंजीपतियों ने पर्चे बांटे, रेडिकल भाषण दिए और सशस्त्र संघर्ष के लिए लोगों को तैयार किया। चाहे वह ब्रिटेन हो या फ्रांस या अमेरिका, सभी क्षेत्रों में पूंजीपतियों की अगुआई में किसानों ने व्यापक संघर्ष के बाद उत्पादन संबंध को बदलने का कार्य किया था।

इस व्यापक संघर्ष से विकसित चेतना का परिणाम यह था कि जब सर्वहारा ने फ्रांस के बुर्जुआ चरित्र को पहचान कर बराबरी के संघर्ष को जारी रखा।

मगर सवाल यह है कि फ्रांस की क्रांति तो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के नाम पर लड़ी गई थी फिर फ्रांस की सर्वहारा जनता को समानता के लिए लड़ाई क्यों जारी रखनी पड़ी? इसका जवाब इतिहास में स्पष्ट है। फ्रांस में एक बुर्जुआ लोकतंत्र का गठन किया गया था, अर्थात बुर्जुआ की तानाशाही को मूर्त रूप प्रदान किया गया था और सर्वहारा को महज उद्देश्य प्राप्त के लिए समानता स्वतंत्रता का हवाला दिया गया।

वस्तुतः बुर्जुआ लोकतंत्र का यह अंतर्निहित चरित्र होता है कि इसमें दी गई समानता व्यवहारिक रूप से पूंजीपति वर्ग को प्राप्त हुई समानता और स्वतंत्रता है। इसके अलावा राज्य का संपूर्ण तंत्र पूंजीपतियों के सेवा हेतु लोगों को नियंत्रित करने का कार्य करता है।

कोरोना के खौफ के बीच प्रधानमंत्री भीड़ देखकर खुश

फिर से हम भारत की तरफ वापस आते हैं ,जहां पर आज हर तरफ मौत का भय है। मीडिया में इस मौत के बाज़ार का जमकर प्रचार किया जा रहा है। घटता हुआ हर एक दिन कोविड महामारी से मरने वालों की संख्या में इज़ाफा कर रहा है। न्यूनतम रूप से मीडिया तो यह प्रचार कर ही रही है, परंतु ऐसे विपत्ति के समय में देश का प्रधानमंत्री पूरे बंगाल में भ्रमण करते हुए चुनाव प्रचार में व्यस्त है।

जहां वह हज़ारों की भीड़ का संबोधन करता है और लोगों को देख कर बेहद खुश हो रहा है। वहीं आए दिन यह सूचना भी आती है कि पुलिस वालों ने सड़क, चौराहे, घर के अंदर घुसकर लोगों को पीट रही है और लोगों के बीच शारीरिक दूरी बनाए रखने का कार्य कर रही है। किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए सरकार पैरामिलिट्री उतारने को तैयार है, क्योंकि वहां कोरोना फैल रहा है।

जनता को तो वहीं चेत जाना चाहिए कि यह आदमी कितना झूठा है और साथ ही समस्त अलग-अलग देशों के राज्य प्रधान जो अपने देश के मेहनतकश लोगों को बेचने के लिए वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसी संस्थाओं से पैसे खा चुके हैं। आज दुनिया का शासक वर्ग एक होकर जनता को लूटने के कार्य में लगा हुआ है।

वह हमें आर्थिक चंगुल में इस तरह से फांस देना चाहते हैं कि ना हम विरोध कर पाएं और न ही मौजूदा दशा को सुधारने के लिए कुछ कर पाएं। सिर्फ हाथ पर हाथ धरे जो हो रहा है, उसमें अपने ज़िन्दा रहने के तरीके तलाशें।

कहीं भारत की स्थिति भी म्यांमार जैसी न हो जाए

आज देश के कुछ गिने चुने वर्ग के लोगों को छोड़ दें तो प्रत्येक व्यक्ति एक गहरी असुरक्षा में जी रहा है। जिन्हें लोगों ने यह समझ के चुना कि वह उनके हितों की रक्षा करेगा, वह विदेशी पूंजीपतियों की दलाली में मगन है। परंतु सिर्फ इस राज्य के साथ ऐसा नहीं है।

भारत की जनता को म्यांमार से सीख लेने की ज़रूरत है और यह समझने की ज़रूरत है कि वह स्थिति भारत में भी आ सकती है, जब प्रॉटेस्ट कर रहे लोगों पर राज्य मिसाइल गिरा रहा होगा और मां अपने 3 महीने के बच्चे की लाश को लिए खुद को मारने की राह देख रही होगी।

देश की समझ को किताबों, विद्यालयों, विश्विद्यालयों और तमाम प्रकार के स्पेस में इतनी सहजता से हमारे मनोविज्ञान में डाल दिया गया है कि भारत का मेहनतकश वर्ग, भूमिहीन किसान, पूंजीपति, सरकारी नौकरी व प्राइवेट कंपनी में काम करने वाली जनता यह भूल जाती है कि उनके मध्य एक गहरा वर्गीय भिन्नता है और यह भिन्नता ही राज्य को पुनरुत्पादित करने का कार्य करती है।

हमारे मनोविज्ञान में ऐसे सहज ज्ञान का विकास बहुत प्राकृतिक नहीं कि मुसलमान हमारा दुश्मन है, या ज़्यादा जनसंख्या हमारे अल्पविकास का कारण है। यह वैश्विक रूप से समस्या है तो हमारे यहां भी होगी, बल्कि यह प्रायोजित रूप से राज्य के विभिन्न सुपरस्ट्रक्चर हमारे अंदर डालते हैं।

जब बीच-बीच में सर्वोच्च न्यायालय रेगिस्तान में बारिश की तरह एक निर्णय किसी जनता के पक्ष में दे देता है, तब हमारा पुनः विश्वास ऐसी संस्थाओं पर कायम हो जाता है। मगर हम यह सवाल करना भूल जाते हैं कि यह प्रोग्रेसिव एटीट्यूड पिछले 2 साल से कहां गायब था? किसी भी मनोविज्ञान का विकास भौतिक परिस्थितियों का समायोजित वैचारिक परावर्तन होता है जो तथ्यों को गूंथ कर अपना आकार लेता है। वह मनोविज्ञान बनाने के सारे अस्त्र राज्य के पास हैं।

सर्वहारा की चेतना के साथ साम्यवादी समाज का निर्माण ज़रूरी

अब सवाल यह है कि क्या यह असुरक्षा हमेशा बनी रहेगी? क्या हम ऐसे ही उहापोह में जीवन के हर सांस को एहसान की तरह लेकर जीते रहेंगे? क्या राज्य अजेय है? क्या इससे पहले के बने राज्य भी अपने समय के लोगों के लिए अजेय रहे होंगे? तो इन सब का जवाब है मार्क्स की वह पंक्ति जिसमें वह बताते हैं, मानव इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है।

जहां पर मौजूदा समाज की उत्पादक शक्तियां अपने दमनकारी राज्य के संबंध को तोड़ते हुए नए और पहले से बेहतर समाज का निर्माण किया है। अर्थात हमें मानवीय चेतना नहीं वर्गीय चेतना की आवश्यकता है क्योंकि वर्गीय समाज में कोई सरल और सामान्य मानवीय चेतना नहीं होती।

हम में जितना उपभोग करने की क्षमता होती है, उसके हिसाब से हमारे वर्गीय चरित्र का विकास होता है और वह वर्गीय चरित्र हमें एक खास वर्गीय नैतिकता की तरफ ले जाता है। परंतु मनुष्य अपने वर्गीय सुखों का केवल गुलाम नहीं समझा जाना चाहिए। वह इतिहास में कोई निष्क्रिय रूप से भाग लेने वाला सब्जेक्ट नहीं है।

वह व्यापक जनता की क्रांतिकारी चेतना से जुड़ते हुए अपने वर्गीय चरित्र को बदलता है, जिसका एक बड़ा लक्ष्य समाज को बराबरी और सही मायनों में प्रेम पर आधारित बनने के लिए कार्य करता है।

आज के समय में यह आवश्यकता है कि जनता खुद को असहाय समझने की बजाए अपने एकता के बल को पहचाने और संगठित होने का कार्य करे। परंतु इस कार्य को क्रांतिकारी विचारधारा से वह वर्ग ही कर सकता है। जो सर्वहारा की चेतना के साथ आगे-आगे जाते हुए एक साम्यवादी समाज के निर्माण से प्रेरित हैं, वही इस युद्ध को आखिरी दम तक लड़ेंगे।

जब हमें कोई बीमारी होती है, तो हमें कड़वी दवाइयां लेनी पड़ती हैं। जी हां! इस वक्त भारत भी एक कड़वी दवाई ले रहा है और उसका नाम है, “लॉक डाउन”। कोरोना से बचने के लिए भारत में एक बार फिर से लॉकडाउन की तैयारियां की जा रही है। भारत में कोरोना के आंकड़े जिस तरह से बढ़ रहे हैं, उन पर हमें पुनः विचार करने की आवश्यकता है।

पहला लॉकडाउन 21 दिनों के लिए लगा था। उससे पहले प्रधानमंत्री जी के अनुरोध पर एक जनता कर्फ्यू जो कि जनता के द्वारा ही लगाया गया था।

विभिन्न राज्यों में रिकॉर्ड केसेज़

20 मार्च 2021 तक देश में कोरोना से कुल संक्रमितों की संख्या (टाइम्स नाउ के अनुसार) बढ़कर 1,15,55,284 हो गई थी, वहीं 1,59,558 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। वर्ष 2020 खत्म होते-होते हम इस बीमारी से निकलने की स्थिति में थे लेकिन अब एक बार फिर कोरोना ने अपना विकराल रूप धारण कर लिया है।

मार्च अंत तक तो स्थिति नियंत्रित थी लेकिन अप्रैल माह के आते-आते टाइम्स नाउ की एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना के महाराष्ट्र में 68,500 से ज़्यादा केस देखने को मिले। वहीं उत्तरप्रदेश में 30,596, दिल्ली में 25,462 से ज़्यादा केस पाए गए। गुजरात में पिछले 24 घंटो में 10,340 से ज़्यादा लोग संक्रमित पाए गए।

एक रिपोर्ट के अनुसार पता चला भारत के कुल संक्रमितों का 70 फीसदी आंकड़ा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल व उत्तरप्रदेश से मिल रहा है। उन राज्यों की राज्य सरकारें पूर्ण कालिक लॉकडाउन लगाने की तैयारी में हैं। मध्यप्रदेश में भी कोरोना के 12,248 मरीज मिले हैं।
37, 538 सैंपल की जांच में इतने मरीज सामने आए हैं। इस तरह संक्रमण दर 13 फीसद रही।

स्वास्थ्य संचालनालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार को पूरे प्रदेश में 42 हज़ार 462 सैंपल लिए गए। इनमें 37,538 की जांच की गई, जिसमें 4986 मरीज मिले हैं। पिछले एक महीने में प्रदेश में कोरोना मरीजों की संख्या 10 गुना बढ़ चुकी है। देश में हर दिन मिलने वाले कोरोना मरीजों की संख्या के मामले में मध्य प्रदेश की स्थिति कई दिनों से देश में सातवें या आठवें नंबर पर है।

लॉकडाउन के बाद बेरोज़गारी दर तेजी से बढ़ी

अगर हम लॉक डाउन 2020 की बात करें, तो ज़ाहिर सी बात है लोग घर रहेंगे तो काम धंधा नहीं कर पाएंगे। इसलिए बेरोजगारी दर बढ़ना ही था। आपको 2020 की बेरोज़गारी के कुछ आंकड़े बताते हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) की एक रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2020 में भारत में बेरोज़गारी दर काफी बढ़ी है। आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में बेरोज़गारी दर 8.35 फीसदी दर्ज की गई, जबकि पिछले महीने जुलाई में इससे कम 7.43 फीसदी थी।

सीएमआईई की रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त में शहरी इलाके में बेरोज़गारी दर 9.83 फीसदी दर्ज की गई है, जबकि ग्रामीण इलाकों में बेरोज़गारी दर का आंकड़ा 7.65 फीसदी पर रहा है। जुलाई 2020 में शहरी इलाके में बेरोज़गारी दर 9.15 फीसदी थी और ग्रामीण बेरोज़गारी दर 6.6 फीसदी।

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के असर से झटके खाती भारतीय अर्थव्यवस्था का चालू वित्त वर्ष में उबरना मुश्किल दिख रहा है। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई ने एक रिपोर्ट में बताया कि पहली तिमाही की जीडीपी विकास दर में आई रिकॉर्ड गिरावट आगे भी जारी रह सकती है। इसके साथ ही साल 2020-21 में भारत के जीडीपी की वास्तविक वृद्धि दर शून्य से 10.9 फीसदी नीचे रहने की आशंका है।

सीएमआईई के मुताबिक, लॉकडाउन से दिहाड़ी मजदूरों और छोटे व्यवसायों से जुड़े लोगों को भारी झटका लगा है। इनमें फेरीवाले, सड़क के किनारे दुकान लगाने वाले, निर्माण उद्योग में काम करने वाले श्रमिक और रिक्शा चलाकर पेट भरने वाले लोग शामिल हैं। अब अगर लॉक डाउन पुनः लगता हैं तो शायद स्थिति बहुत भयावह होगी। फिर वही लाखो लोगों को अपने रोज़गार से हाथ धोना पड़ सकता है, जो अभी-अभी अपनी आर्थिक स्थिति को थोड़ा संभाल पाए थे।

बेरोज़गारी दर के भी बढ़ने की पूरी संभावनाएं हैं। वे छोटे दुकानदार या वे मज़दूर जो रोज़ी-रोटी कमाकर खाते हैं, उनके लिए भारी मुश्किलें हो सकती हैं।

कोरोना की दूसरी लहर और लॉकडाउन की तैयारी

अमेरिका की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में सबसे ज़्यादा युवा भारत में हैं। लगभग 30 फीसदी युवाओं का भविष्य भी इस लॉक डाउन की वजह से दांव पर लगा हुआ है। लगभग एक लंबे दौर के बाद हमें कोरोना जैसी महामारी से थोड़ी राहत मिली थी। भारत की प्रभावी वैक्सीन भी वितरित होने लगी थी। मगर एक बार फिर कोरोना अपने पैर पसार रहा है और राज्य सरकारें लॉकडाउन लगाने की तैयारी कर रही हैं।

हमे अब यह सोचना होगा कि क्या लॉकडाउन ही कोरोना से बचने का एकमात्र रास्ता है? पिछले वर्ष लाखों मज़दूरों के पलायन की जो भयावह तस्वीरें सामने आई थी, उसे देखकर तो लगता है कि लॉकडाउन आपातकाल के समान है। नौकरी करने वाले घर पर रह सकते हैं लेकिन यहां सवाल उस बड़े तबके का है जो रोज कमाता है रोज खाता है।

दिन भर की मज़दूरी से उसके शाम का खाना आता है। ऐसे लोग जो पहले ही बेरोज़गार हैं, जैसे-तैसे उनको कहीं से कुछ रोज़गार मिलता हैं, वह भी लॉकडाउन की वजह से ठप्प हो जाएगा। राजनीति में पक्ष-विपक्ष की राजनीति हमेशा अनैतिक ही रही हैं। ऐसे में सवाल ढेरों हैं लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं।

चुनाव हो सकते हैं, तो छोटे दुकानदार दुकान क्यों नहीं चला सकते?

सवाल तो यह भी है कि बंगाल और असम में कोरोना के आंकड़े क्यों छुपाए जा रहे हैं? सिर्फ इसलिए कि वहां चुनाव हैं? राजनैतिक पार्टियां अपनी सत्ता के लोभ में लाखों की भीड़ एकत्रित करती हैं। चुनावी रोड शो हो रहे हैं लेकिन वहीं दूसरी ओर क्या एक मज़दूर मज़दूरी करके अपना पेट नहीं भर सकता?

क्या वे छोटे दुकानदार जो अपनी दिन भर की कमाई उस चाय या किराने की दुकान से करते हैं, वह दुकान नहीं खोल सकते? उन असंख्य परिवारों को ध्यान में रखते हुए कोई फैसले लेने चाहिए। कोरोना वैक्सीन की देश में सही आपूर्ति नहीं हो पा रही हैं और सरकार समझौते के नाम पर विदेशों में वैक्सीन वितरित कर रही है। ऐसे कई सवाल मौजूदा सरकार पर खड़े होते हैं लेकिन सरकार इससे भागती दिख रही है।

आम जनता के मुंह से अक्सर ये बात सुनी जा रही हैं कि अमीर ठीक होकर घर आ रहे हैं व गरीब की मौत हो जा रही है। मुझे नहीं पता कितनी सच्चाई है इस बात में लेकिन सवाल तो इस पर भी खड़ा होता है।

क्या लॉकडाउन ही एकमात्र उपाय है?

कोरोना, आज के दौर की गंभीर समस्या है। इसके आगे सभी बड़ी से बड़ी बीमारियां नीचे मुंह करके बैठी हुई हैं। इस दौरान हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि सामाजिक दूरी बनाए रखे व सभी नियमो का पालन करें। आम जनता के रक्षक ‘पुलिस- प्रशासन’ ने इस कोरोना काल में जनता की जो सेवा की वह बेशक प्रशंसनीय हैं लेकिन कहीं-कहीं पुलिस की जो अमानवीयता दिखी वह घोर निंदनीय है।

एक बार फिर भारत लॉकडाउन जैसे बेहद खौफनाक दौर से गुजरने वाला है। फिर वही हाल की आशंका है। मज़दूरों, गरीबों एवं युवाओं के लिए रोज़गार संकट की आशंका है। मज़दूरों का भोजन के लिए तरसना सच में रूह कंपा देता है। मज़दूरों का वह हज़ारों किलोमीटर इस तपती धूप में पैदल सफर करना लॉकडाउन के बारे में सोचने पर विवश कर देता है।

अब अगर लॉकडाउन दोबारा लगता है तो फिर से बड़े- बड़े शहरों में जो कारखाने चल रहे हैं, वह दौबारा बंद होगी तथा वहां काम कर रहे मजदूरों को पलायन और भूख जैसी बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता हैं। छात्रों की नियमित कक्षाएं जो अभी कुछ समय पहले ही चालू हुई थी वह भी कोरोना के प्रकोप को देखते हुए सरकार ने बंद कर दिया है।

जिससे छात्रों को अपने नियमित अध्ययन में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब ऐसे में सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि उन मज़दूरों व गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था करें। अब सवाल यह उठता है कि क्या लॉकडाउन ही वो एकमात्र उपाय है जिससे हम कोरोना से बच सकते हैं? अगर हां तो 2020 के लॉकडाउन से क्यों कुछ असर नहीं हुआ इस बीमारी पर?

क्यों वैक्सीन लगवाने के बाद भी लोग संक्रमित हो रहे हैं? इन तमाम सवालों के बीच आम जनता की भी ये जिम्मेदारी बनती है कि मास्क लगाए रखें और सरकार के द्वारा जारी की गई गाइडलाइन को फॉलो करें। ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी सुरक्षित रहें व स्वस्थ्य रहें।

Naqiya Saifee, an 18-year-old girl from Surat in Gujarat says that she started wearing the “Rida” by her personal choice. “Some of my Muslim friends do not choose to wear it and that’s their decision”, she says. 

The veil has various forms in Islam, ranging from the ‘hijab’, ‘niqab’, ‘burqa’, ‘chador’, and ‘Rida’. The Quranic verses talk about statements referring to veiling by the prophet’s wives but do not make it clear whether it applies to all Muslim women as well.

Image Credit: The Guardian

An argument can be made that the West’s decisions to ban burqas have less to do with liberation and more to do with islamophobia.

According to critics, the veil has been used as a patriarchal way of negating the male gaze and sexual desire toward female bodies. But many women who cover their heads or bodies say that it demonstrates their religious piety and submission to God. 

However, covering the head or bodies does not only stand true for Islam. Jewish, Christian, and Hindu women have also covered their heads at various times in history in different parts of the world.

The question arises then why have western countries banned the veil if women are choosing to wear it willingly.

France was the first country in Western Europe to impose a ban on face-covering Islamic veils in 2010. 

One of the main reasons was the view of the French people to regard headscarves worn by Muslims as a sign of oppression faced by women, which in turn is believed to be a symbol against secularism.

The French define secularism as based on three principles: the freedom of conscience, the separation of public institutions and religious organizations, and equality of all before the law regardless of their beliefs. It also includes the freedom to practice a religion that is free from religious dogma or prescriptions.

But who gets to decide what is oppressive and what is not? Certainly not the powerless Muslim women who are subjugated to these draconian laws made by non-Islamic entities and bodies.

France is not the only country to ban Islamic face coverings. What followed was a wave of western countries like Switzerland, Belgium, Netherlands, and Bulgaria to ban the veil.

Saifee argues that there are two extremes to veil wearing, one in the Middle Eastern countries where women are forced to wear it and in the west where they are forced to take it off. She says this removes women’s agency to control their bodies and freely express themselves. “The problem is not the clothing, but other people seeing it as something to control us and make us surrender to their rule”, she says.

She is not wrong. French and British colonizers encouraged Muslim women to remove the veil and emulate European standards. While, in African and Middle Eastern countries, the veil became a symbol of national identity and opposition to the West during independence and nationalist movements. 

Proponents of the hijab say that women wear it to symbolize pride in their ethnic identity. This has increased in immigrants based in Europe and the U.S. where there has been a rise in Islamophobia. 

For other women, the common headscarf has become a means of resisting standards of feminine beauty that demand more exposure. Proponents of this view argue that removing clothing for the benefit of the male gaze does not equal liberation. 

Saifee also says that empowering women means giving them the power and authority to wear what they want. “Clothing plays an essential role in self-expression.

Increasingly, burqas and hijabs have become fashionable with different designs and colors being made by designer brands. This is also true for models wearing it on ramp walks, photoshoots, and even the new trend of wearing the burkini (burka-bikini). 

The other strand of thought thinks that wearing the veil is religious subjugation and the burqa has also become a symbol of Islamist radicalism and even terrorism and is increasingly being seen as a threat to efforts to integrate Muslim migrants into British and European society. 

Many movies and books have illustrated this view. 

In A Thousand Splendid Suns by Khalid Hosseini,  the burqa is a symbol of control over a woman. Rasheed forcing Mariam to wear a burqa represents his possessive ownership of her. When the Taliban issues the order that all women must wear burqas, it further represents the power of all men over women under their rule. 

The moral question however arises then what is empowering to women.

Saifee correctly points out that women making their own choices is what is truly liberating. 

Beyond that what matters more is tackling the root causes of oppression both at home and outside such as discrimination, lack of access to services, and unequal economic opportunities. 

Also read: “Burqa Vs Burqa Ban: When The Choice Is Not Yours To Make“

In our childhood, the only thing we used to watch was cartoon series and this tradition is continues even today, though there are many new platforms to watch it on. But I would like to highlight the influence of cartoons on children and the minor changes we can make to save children from inculcating boorish behaviour.

To explain to you the cheek by jowl relationship between cartoons and children, I would like to cite a small example of mine. When I was a child, I used to watch Shinchan. It was the only cartoon that I used to watch during my childhood and by watching it, I inculcated the mischievousness of Shinchan and the word “Mom”. Though I am mature enough now, I still address my mother with “Mom”. It might sound stupid, but I wanted to highlight the effect of cartoons on children. Cartoons can change the cognitive behaviour of children. 

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In 1997, 653 students in Japan were hospitalised due to epilepsy. After investigating into the matter, it was found that the reason for epilepsy was the 38th episode of Pokemon, a well-know anime. After this, the Japanese decided to ban that particular episode to prevent any further cases of epilepsy. 

I would like to highlight a few negative effects of cartoons on the malleable minds of children. 

One of the major changes that cartoon cause in children is language, which they use in their daily life. Nowadays, there is excessive use of foul language not only in adult content, but also in cartoons. These words are then inculcated by children. They are young and they learn words much faster. Using this language at an early age can stay for a longer time in children and can make one abusive and vulgar.

Secondly, it makes the child more aggressive. Many parents complain about their children indulging in fights and sometimes, these can result in a serious injury. I would like to mention one thing: whatever we see in the cartoons, like falling of a hammer on the head, jumping from high buildings or breaking bones can be hilarious to watch but when it comes to the real world, these things can even result in death. 

Thirdly, cartoons promote unsocial behaviour. Children can pull stunts that are shown in cartoons, and this may be unacceptable to society because there are some cartoons that contain the wrong message for children and this might leave a long-term impact on the mind of the children.

Moreover, the child may become a couch potato and this may affect their health by making them lazy. Cartoons containing the wrong message and can leave the wrong message behind and take the child’s life in the wrong direction. 

Some minor changes parents can make to prevent their child from getting spoiled from the cartoons are:

  • Parents can filter some cartoons to prevent their children from getting the wrong message and learning wrong words. 
  • A proper check on their child can prevent them from getting into the wrong direction in their life.
  • Explaining the difference between reality and the cartoon world will be important because harmful acts performed in cartoons might be seen as funny but in real life, these stunts may result in serious injury.
  • Limiting the time of these shows is encourage. Instead, encourage the child to play sports. It can help them to build leader characteristics and develop team spirit, too.

See, I am not saying that cartoons should be banned or that we should prevent children from watching cartoons. But I would like to request parents to filter the cartoons once or watch cartoons that promote honest and kind messages. There are many cartoons that help to improve the vocabulary of their children. There are many cartoons that sight an excellent example of true friendship. Cartoons such as Noddy, Oswald, Thomas and Friends, etc. are great cartoons to watch because they promote a new approach for children and are devoid of vulgarity.

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Right after independence, the path that was chosen by India to realize her destiny was a difficult one. For a nation with a humongous population with widespread illiteracy and poverty, democracy was nothing less than a mirage. Before this great experiment in the country of subcontinental size, democracy flourished only in the cocoons of rich nations of Europe and America. According to some western thinkers, certain prerequisites were required for the introduction of democracy in any country.

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Jawaharlal Nehru delivering his tryst with destiny speech.

They included an educated population, absence of poverty, and vibrant democratic culture. Unsurprisingly, none of these conditions were available in our country. The colonial rule robbed us of our wealth and fortune. The reading of thinkers like J. S. Mill suggests that the oriental societies were barbaric and democracy was not meant for them. He placed India in this category.

The History Of Indian Democracy

When India decided to be a democracy there was an agreement across the world that this grand experiment would fail. The decision to grant universal adult franchise was termed as the “greatest gamble in the history“. Nowhere in the world was democracy introduced at such a large scale. It was a revolutionary moment for the country.

Amid all these suspicions, there was optimism on the side of Indians as the soul of a nation, long suppressed, was going to find utterance. In the words of our first Prime Minister Pt. Nehru, “Long years ago… we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeem our pledge, not wholly or in full measure, but very substantially.” He further remarked, “At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom.

After almost 70 years of this experiment, history stands witness to the spectacular success of democracy in this land of great diversity and resilience. But this is also the time we should ask ourselves some tough questions. Has the pledge been redeemed? Why did the freedom promise remain unrealized for most of us at the bottom?

The experience of the last decade especially since 2014 has raised many questions on the functioning of democracy in India. The journey of democracy in India was like a roller-coaster ride but it managed to emerge stronger after every crisis. The most severe assault was of course during the era of emergency(1975-77). But the period of emergency, rather than breaking the neck of democracy, only deepened its roots and made the resolve to protect it stronger. Post – emergency period saw the emergence of a strong civil society and various social movements.

The next major challenge was the period of the 1990s. The country faced an economic crisis of an unprecedented scale. There was political instability without a stable government. Faced with immense pressure, democracy again demonstrated remarkable resilience. Millions of people have been lifted out of poverty and the country witnessed one of the highest growth rates in the world. This helped normalize our relations with the west, uplifted the international stature, and gave strategic weight to India’s position.

But since 2014, the developments that have taken place in the country not only challenge democracy but also raise some serious questions about its viability and existence. Constitutional values like secularism, liberty, equality, justice, fraternity, etc are being challenged. Democratic norms and practices are blamed for being an obstruction in the road to development.

Senior bureaucrats and politicians are blamingtoo much democracy” for delayed development. In short, democracy today is not only challenged but facing an existential crisis. It would not be an exaggeration to say that we are living in a state of undeclared emergency. So, we must identify the major trends that pushed us to such a sorry state of affairs.

The rise of Hindutva as an ideology directly corresponds to the increase of polarization and hatred.

Why Are We In Such A Sorry State Of Affairs?

1. Shrinking Public Space – Public space is that part of a democratic society where different ideas compete, confront and converge. It acts as a zone of harmony. The success of any democracy can be measured by identifying the richness of this space. A well-represented, diverse, and inclusive public space is an indicator of a healthy and mature democracy.

The divisive agenda of the current government based on the ideology of Hindutva has done great harm to this invaluable democratic asset. The result is intense polarisation, mutual hatred, exclusive nationalism, etc.

2. Weakening Institutions –  Vibrant and functioning institutions are the bedrock of any democracy.  From RBI to Constitutional bodies like Election Commission, the credibility of institutions is being questioned. This is resulting in a loss of public trust.

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3. Hijacking Of Parliament – Parliament which is the highest deliberative body of the country is getting diminished with each passing day. Once the temple of Indian democracy is now merely a rubber stamp to approve the executive’s agenda. Bills are pushed without parliamentary scrutiny. Increasing resort to ordinances even during normal times is a worrisome trend.

4. Turning Into A Police State – Political prisoners accused of crimes against the state are filling up jails which is again a dangerous signal to the rights of citizens. Activists, students, NGOs, etc are all facing the wrath of the government for speaking up freely. Draconian statutes like UAPA, NSA, 124A, etc are unleashed with full force to curb dissent.

5. Demonising Opposition – For the first time in the history of this country, the opposition is becoming so meaningless. An opposition -‘ Mukta(free)’ Bharat is a precursor to the fascist ambitions of the current government.

6. Electoral processes – With serious doubts raised over the impartiality and independence of the election commission, the future of democracy in India seems to be in a perilous state.

Problems From Colonial Rule

All the above-mentioned problems remind us of colonial rule. The only difference, it seems, is that the government committing these sins is elected by the very people of this country.

Democracy is not the private property of few rich people. It is a collective asset of all citizens. To blame others only is nothing less than turning back to our Constitutional and moral responsibility to protect it. ‘We The People’ will have to unite and punish those who are trying to subvert it. The democracy that we have today should not be taken for granted. Millions of fellow citizens sacrificed their lives for it.  The time is difficult and any resistance on our part would invite severe repression by those in power.

But great struggles demand great sufferings and sacrifice. I would like to conclude my article in the words of our great freedom fighter Bhagat Singh – “If you oppose a prevailing belief, if you criticize a great person who is considered to be an incarnation, you will find that your criticism will be answered by calling you vain and egoist.”  This is the time to remind the saboteurs of our freedom that governments will come and go but democracy is here to stay forever.

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नहीं, मैं कोई लेखक या पत्रकारिता से जुड़ी हुई नहीं हूं। कभी-कभी लगता था काश हम भी लिखते जिसे लोग पढ़ते और हमारे विचारों पर अमल करते। वैसे, बोलना और उसी विषय पर लिख कर लोगों तक पहुंचाने में बहुत बड़ा फर्क है। मुझे पहले महसूस हुआ करता था कि लिखने के लिए आपको या तो किसी समाचार पत्रिका में ही काम करना होगा या मॉस कॉम से सम्बन्धित कोई कोर्स करना होगा।

जब मुझे यूथ की आवाज़ के बारे में पता चला

अब यह तो होता नहीं कि आप एक नौकरी करते हुए पेशा ही बदल लें, तो मैंने आशा ही छोड़ दी थी परंतु, एक दिन यूं ही इन्टरनेट के माध्यम से “यूथ की आवाज़” के बारे में पता चला। जहां हज़ारों की संख्या में लोग अपने विचारों को पूरे देश के पाठकों एवं लेखकों के साथ साझा करते हैं। यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई कि एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां आप अपने विचारों को खुलकर बिना किसी बंदिशों के लिख सकते हैं। अपने पाठकों को खुद के विचारों से रूबरू करा सकते हैं।

यूथ की आवाज़ से हमें यह पता चला कि हां, आप किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं कर सकते परंतु, जितना हो सके अपने अच्छे विचारों या रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े विषयों पर आप चर्चा कर सकते हैं। मैंने इस प्लेटफार्म के ज़रिये अपना सपना पूरा करने की कोशिश की। जहां “यूथ की आवाज़” ने मेरे इस सपने को साकार करने में पूरी मदद की और मैंने यहां से कम समय में ही बहुत कुछ सीखा है।

यहां तक कि मैंने अपने आस-पास के लोगों को भी इसके बारे में बताया कि आप अगर अच्छा लिखना चाहते हैं तो बस यहीं से शुरुआत कीजिए।

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बस फिर क्या था ! कहते हैं ना कि सोचने में समय गंवाने से अच्छा कलम को उठाओ और अपनी सोच को कागज़ों में उतार दो। हालांकि,अब तक मैंने कोई अच्छे विषय पर लिखा नहीं और हंसने वाली बात यह है कि अब तक उसको पढ़ने वाले मिले नहीं। बहरहाल, फिर भी मैंने लिखना बंद नहीं किया है, क्योंकि एक जुनून होता है जो आपको प्रेरित करता है कि आप उस विषय पर लिखें जिसे लोग पसंद करने पर मज़बूर हो जाएं।

कुछ महीने पहले ही लेखन की शुरुआत की

पिछले कुछ महीने से मैंने यूथ की आवाज़ पर लेखन कार्य की शुरुआत की और इससे मेरे अन्दर एक सकारात्मक  बदलाव आया है। एक आत्मविश्वास जिसे आज बयान करने में खुशी हो रही है। दोस्तों को जब मैंने बताया कि मैं  भी कुछ लिखती हूं, तो उन सभी ने भी मेरे लेखन को सराहा। यह देख कर अच्छा लगता है कि जब आप घंटो लिखने में लगाते हैं और उस लेखन को स्वयं शेयर करते हैं तो एक अलग सा गर्व महसूस होता है।

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इस सामग्री को कई लोग पढ़ते हैं और हमारी गलतियों को भी बताते हैं। सच मानिए जब आपकी तारीफों से ज़्यादा लोग आपकी गलतियों को बताते हैं तब खुद को और निखारने का अवसर मिलता है। 

मैं हमेशा राजनीति और क्रिकेट जिसे बेफिज़ूल का ज्ञान कहा जाता है। मैं लोगों के बीच उस विषय पर चर्चा करना पसंद करती हूं। पहले मैं हमेशा अपना कीमती समय मोबाइल या दोस्तों के साथ गंवा देती थी परन्तु,अब मेरा  नज़रिया ही बदल गया है और मैं अब मानती हूं कि हमें अपने विचार अन्य लोगों तक पहुंचाने चाहिए इसलिए लिखो और लोगों तक पहुंचाओ।

लिखने के लिए अभी बहुत कुछ सीखना है

इसे एक बदलाव ही कह सकते हैं जो “यूथ  की आवाज़” के ज़रिये मेरे अन्दर आया है। कलम को अपनी आवाज़ बनाओ लोग आपकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ ज़रूर मिलाएंगे। मैंने लिखने की शुरुआत इसलिए की क्योंकि मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं लिखना हमारी ज़िंदगी से जुड़ी हुई कड़ी है। यह एक मुकाम है जिसे हासिल करना है।

याद रखिए कि यदि आपने लिखने की ठान ली है तो बस हो गयी शुरुआत अब आप मानिए कलम और हमारी दोस्ती हो गई है। मैं एक बार फिर से यूथ की आवाज़ के फाउंडर एवं मुख्य संपादक अंशुल जी का अपने तहे ह्रदय से बहुत-बहुत धन्यवाद देती हूं, जिन्होंने हमारे देश के यूथ को अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए इस प्लेटफार्म का निर्माण किया।

भारत की युवा जनसंख्या इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है। इन युवाओं को ऐसी मानव-पूंजी माना जाता है जिनकी उत्पादकता आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों की संभावना रखती है। गौरतलब है कि यह युवा आबादी रोबोट की तरह मशीन ना होकर मानव नाम की एक जीव जाति की सदस्य है जिसके पास मस्तिष्क के साथ हृदय भी है। संज्ञान के साथ संवेग भी है। इन विशेषताओं के कारण ये किसी पहले से तैयार प्रोग्राम द्वारा नहीं चलाए जा सकते हैं ना ही इनके बारे में निश्चय के साथ कोई भविष्य कथन किया जा सकता है।

मनोविश्लेषणवाद की शब्दावली से उधार लेकर कहूं तो इनके जितने व्यवहार और कर्म होते हैं, उससे कई गुना मनोभाव और विचार अप्रकट रह जाते हैं। अंतर्मन के ये घरौंदे युवावस्था की उस गिरह को सुलझाने का माध्यम हैं, जो हममें से अधिकांश का भोगा हुआ यथार्थ है। इस यथार्थ की टीस और मिठास ही हमारा ‘मैं‘ बनती है जिससे हम पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं। हां, यह ज़रूर है कि एक सामाजिक प्राणी होने के कारण तालमेल और गठजोड़ बनाने की आदत से हम यह सीख जाते हैं कि इस ‘मैं‘ में से कब? कितना दिखाना है? और कितना छुपाना है? फुर्सत के क्षणों में अंतर्मन के घरौंदों की यात्रा हमारे अपने इतिहास की कई देखी-अनदेखी, सुलझी-अनसुलझी परतों को उघाड़ती है।

भारतीय परिवार में व्यक्ति माता-पिता, रिश्तेदार और भाई-बहनों के बीच भावानात्मक लगाव के साथ बढ़ा होता है। यह लगाव कभी कमज़ोर नहीं होता है। लेकिन, समय के साथ जब इसमें नये संबंध और रिश्ते पैदा होते हैं तो ना  जाने क्यों ! हम रिश्तों के घरौंदे को लेकर आवश्यकता से अधिक असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। खासकर प्रेम- सम्बन्धों  के संदर्भ में देखें तो इसे एक-दूसरे के लगाव क्षेत्र में आक्रमण माना जाता है। संस्कार, पंरपरा और मूल्यों  की दुहाई देकर हम इस सुरक्षित घेरे की कोरी कल्पना को बाह्य आक्रमण से बचाने की कोशिश करते रहते हैं। इस ऊहापोह का एक तार संस्कार में बसता है तो दूसरा युवा हृदय के जोश और प्रेम की मिठास में फंसता है।

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इस बीच में युवा त्रिशंकु की तरह फंसा रहता है। शनैः-शनैः वह मानने लगता है कि एक को मनाने का अर्थ दूसरे को नाराज़ करना है। एक के साथ जीने का फैसला दूसरे को छोड़ना है। ऐसे विश्वास के कारण वह उन रास्तों पर चलने का साहस नहीं कर पाता है जो उसे, उसके ‘मैं‘ से परिचित करा सकते हैं।

हमारे समाज में सुरक्षित और शानदार भविष्य की तलाश में गाँव और छोटे कस्बों से महानगर और महानगरों से विदेशोें में प्रवास करने की प्रेरणा बचपन से दी जाती है। उम्र के साथ स्वतंत्र और स्वायत्त जीवन जीने की प्रक्रिया में यह सिखाया जाता है कि बाहर की दुनिया में टिके रहना एक कठिन और बड़ी चुनौती है। पढ़ाई और नौकरी इस तरह की चुनौती के उदाहरण मात्र हैं। जब युवा इस नई दुनिया का हिस्सा बनने लगते हैं या बन चुके होते हैं, तो हम मान लेते हैं कि समय के साथ ‘पुरानी दुनिया‘ धूमिल हो चुकी है। जबकि यह ‘पुरानी दुनिया‘ अचेतन में जाग्रत रहती है और ‘मैं‘ के साथ ‘हम‘ वाले पक्ष का अस्तित्व बनाए रखती है।

यह हमारी निर्माण प्रक्रिया के बारे में हमें सजग रखती है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस नई दुनिया की चुनौतियों में बीच मुक्ति की छटपटाहट उसे पुरानी दुनिया की ओर ले जाती है। बार-बार जह़न में यही सवाल आता है कि हम क्या कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? किसके लिए कर रहे हैं? इन सवालों को आध्यात्मिक या दार्शनिक कहना समस्या भी है और समाधान भी। समस्या इसलिए कहीं समाधान ढूंढ़ने के चक्कर में समाधान का स्रोत बाहर खोजने पर किसी दूसरे पर निर्भर ना होना पड़ जाए। समाधान इसलिए कि यह सवाल हमारे मुक्ति का रास्ता बन सकते हैं। ‘मुक्ति‘ किससे? जो बाहर की दुनिया की भागदौड़ है, सफल होने की भूख है, अहं का व्यर्थ आडंबर है, उससे मुक्त होकर उसी प्राकृतिक मनुष्य का हृदय और मस्तिष्क बन जाने की चाह जो समाजीकरण के चिन्हों से रहित हो।

आप पाएंगें कि प्रेम, घृणा, ईष्या, भय जैसे संवेग जिन सामाजिक पात्रों और घटनाओं के माध्यम से उमड़-घुमड़ कर हमारे अंदर की घुटन को बनाए रखते हैं, उनका मूल हमारी समाजीकरण की ही प्रक्रिया तो है। हमें ऐसा मानना सिखा दिया जाता है कि अच्छा होना अच्छा होता है और बुरा होना बुरा होता है। यह अच्छाई और बुराई हमारी विचार प्रक्रिया की खिड़की बन जाते हैं। हमें सोचने की आदत ऐसी पड़ जाती है कि हमारा व्यवहार, कर्म और निर्णय अच्छा बनने के लक्ष्य से प्रेरित होता है और बुरा बनने की हर संभावना से दूर-दूर तक वास्ता नहीं रखता है।

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‘अच्छे‘ बने रहने का लक्ष्य हमें कई बार समझौते करने को मजबूर करता है, शोषण को स्वीकृति देता है, शाॅर्टकर्ट अपनाने को प्रेरित करता है। इस तरह की प्रवृत्तियों से उपलब्धि तो मिल सकती है, लेकिन हमारे अंतर्मन को शांति ठहराव नहीं!

पुरातन और आधुनिकता का टकराव इस दौर में सबसे मुखर होता है। जैसे-जैसे संस्कृति, सामाजिक-आर्थिक और प्रौद्योगिकीय बदलाव के साथ नए-नए रूपों और व्यवहारों को अपनाया है, वैसे-वैसे परंपराओं को टूटने का भय बढ़ा है। यह कहना कि आधुनिकता के प्रवेश के लिए परंपरा का टूटना अनिवार्य है ना तो आधुनिकता के सही अर्थ को साकार करना है और ना ही परंपरा के सार को बनाए रखना है। आज के युवा इसी संघर्ष से गुज़र रहे हैं। औपचारिक शिक्षा और कार्यस्थल ऐसी दुनिया है जो आकर्षक है जिसे जीने और अपनाने के तौर-तरीके आप सीख रहे हैं, लेकिन गाँव और कस्बा बार-बार बातचीत और खान-पान में आकर खड़ा हो जाता है।

प्रतिस्पर्धा, गति, सदा आगे रहने की भावना सब कुछ रेडीमेड चाहती है जबकि इस भागमभाग में सृजन सुख से वंचित होना और इसके अवसरों को खोना आलोचक और निंदक बनाता जा रहा है। बचपन के टिंकू, रामू और निम्मो को जो आदर्श घोंट-घोंट कर पिलाए गए थे, वे जिंदा रहते हैं और जिन तर्कों को ज्ञान और बौद्धिकता के नाम पर हमने अपनाए है, हर बार उसके बरक्स खड़े हो जाते हैं।

भारतीय युवाओं के अंतर्मन में एक नायक/नायिका बनने की चाहत है। उन्हें बचपन से ही इस नायकत्व का स्वप्न दिखाया जाता है। कई बार यही स्वप्न हमारे ऊपर बोझ बन जाता है। जीवन की भूलभूलैया में भारतीय युवा इतने अंतर्द्वंदों से गुजरता है कि क्या करें?क्या ना करें? इस दुविधा में उसका नायकत्व डगमगाने लगता है। वे सब कुछ पाना चाहते हैं, लेकिन पाने की कीमत पर कुछ भी छोड़ना नहीं चाहते हैं।

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एक सवाल जिससे हम भारतीय कतराते हैं वह है कि हम जो पाना चाहते हैं, क्या वह हमारे अंतरमन की उपज है या केवल बाह्य आकर्षण? इसे हम एक उदाहरण द्वारा समझ सकते हैं जिस रोज़गार के द्वारा आप अपने नायकत्व को सिद्ध करने के लिए लालायित रहते हैं। वह आपकी रूचि और अभिवृत्ति से संबंधित है या केवल लोगों के बीच सम्मानित है इसलिए आप रोज़गार के माध्यम से सम्मान पाने के लिए अपने अंतर्मन की आवाज़ को अनसुना कर रहे हैं।

यह अनसुनी आवाज़ किसी ना किसी रूप में हमारे भीतर गूंजती रहती है। ऐसी ना जानी कितनी आवाजों को घोंटकर हम क्रमशः युवा, प्रौढ़ और वृद्ध बनने के रास्ते पर बढ़ रहे हैं। शायद एकल संस्कृति से बहु संस्कृति और परंपरा से आधुनिकता की ओर प्रस्थान, मानने के साथ तर्क, निर्भरता के साथ स्वायत्तता जैसे बदलावों को अपनाना उम्र के इस दौर की ताजगी को बनाए रखना है।

परीक्षा का दबाव हमारे जीवन में कठिन परिस्थितियां पैदा कर देता है। इस दशा में भूलने की बीमारी का लगना सामान्य है। अनिमेश आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। बचपन से ही अनिमेश के पिताजी ने उसे यह शिक्षा प्रदान कर रखी थी कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए एक आदमी का योग्य होना बहुत ज़रूरी है। अनिमेश अपने पिता की सिखाई हुई बातों का बड़ा सम्मान करता था। उसकी दैनिक दिनचर्या किताबों से शुरू होकर किताबों पर ही बंद होती थी। वह खेलने-कूदने में भी अच्छा था।

नवम्बर का महीना चल रहा था। आठवीं कक्षा की परीक्षा दिसम्बर में होने वाली थी। परीक्षा काफी नज़दीक थी। अनिमेश अपनी किताबों में मशगूल था। इसी बीच ठण्ड भी पड़नी शुरू हो गई थी। वो रजाई में दुबक कर अपनी होने वाली वार्षिक परीक्षा की तैयारी कर रहा था। इसी बीच उसकी माँ बाजार जा रही थी। अनिमेश की माँ ने उसको 2000 रूपये दिए और बाज़ार चली गईं। वो रूपये अनिमेश को अपने चाचाजी को देने थे।

अनिमेश के चाचाजी गाँव में किसान थे। कड़ाके की ठण्ड पड़ने के कारण उनकी फसल खराब हो रही थी। फसल में खाद और कीटनाशक डालना बहुत ज़रूरी था। अनिमेश के बड़े चाचाजी दिल्ली में प्राइवेट नौकरी कर रहे थे। उन्होंने ही वो 2000 रूपये गाँव की खेती के लिए भिजवाए थे। अनिमेश की माँ ने वो 2000 रूपये अनिमेश को दिए, ताकि वो अपने गाँव के चाचाजी को दे सके। अनिमेश पढ़ने में मशगूल था। उसने रुपयों को किताबों में रखा और फिर परीक्षा की तैयारी में मशगूल हो गया।

इसी बीच बिछिया आई और घर में झाड़ू-पोंछा लगाकर चली गई। जब गाँव से चाचाजी पैसा लेने आए तो अनिमेश ने उन रुपयों को किताबों से निकालने की कोशिश की पर वो वहां से गायब हो चुके थे। अनिमेश के मम्मी-पापा ने भी लाख कोशिश की पर वो रूपये मिल ही नहीं पाए। उनको समझ में नहीं आ रहा था कि पैसे ज़मीन में चले गए या आसमान में गायब हो गए। उनकी  खोजने की सारी कोशिशें बेकार गईं।

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खैर, अनिमेश के पापा ने 2000 रूपये खुद ही निकाल कर गाँव के चाचाजी को दे दिए। रुपयों के गायब होने पर सबको गुस्सा आ रहा था। अनिमेश पर  शक करने का सवाल ही नही था। वह अपने माता-पिता के लिए काफी मेहनती, आज्ञाकारी और ईमानदार बच्चा था।

वह स्कूल में दिए गए हर होम वर्क को समय से पूरा करता था। वो वैसे ही पढ़ाई-लिखाई में काफी गंभीर था, तिस पर से उसकी परीक्षा नज़दीक थी। इस कारण अनिमेश के पिताजी ने अनिमेश से ज़्यादा पूछताछ नहीं की।

बिछिया लगभग 50 वर्ष की मुसलमान अधेड़ महिला थी। उसका रंग काला था। बिच्छु की तरह काला होने के कारण सारे लोग उसे बिछिया ही कह के पुकारते थे। उसके नाम की तरह उसके चेहरे पे भी कोई आकर्षण नहीं था। साधारण सी साड़ी और बेतरतीब बाल और कोई साज-श्रृंगार नहीं। तिस पर से साधारण नाक-नक्श। इसी कारण से वो अपने पति का प्रेम पाने में असक्षम रही थी। उसकी शादी के दो साल बाद ही उसके पति ने दूसरी शादी कर ली थी। जाहिर सी बात है, बिछिया को कोई बच्चा नहीं था। नई दुल्हन उसके साथ नौकरानी जैसा व्यवहार करती थी।

बिछिया बेचारी अकेली घुट-घुट कर जी रही थी। अकेलेपन में उसे बीड़ी का साथ मिला। वह बीड़ी पीकर अपने सारा गम भुला देती। जब बीड़ी के लिए रूपये कम पड़ते तो कभी कभार अपने पति के जेब पर हाथ साफ़ कर देती। दो तीन बार उसकी चोरी भी पकड़ी गई थी। अब सज़ा के तौर पर उसे अपनी जीविका खुद ही चलानी थी। उसने झाडू-पोंछा का काम करना शुरू कर दिया। इसी बीच उसका बीड़ी पीना भी जारी रहा।

पर आखिर में रूपये कहां गए ? अनिमेश चुरा नहीं सकता। घर में बिछिया के अलावा उस समय कोई और आया ही नहीं था। हो ना हो, ज़रूर ये रूपये बिछिया ने ही चुराये हैं। सबकी शक की नज़र बिछिया पर ही थी और सारे लोग उसके पीछे हाथ धोकर पीछे पड़ गए।

किसी को पड़ोसी से नफरत थी, तो कोईअपने  मकान मालिक से परेशान था, कोई अपनी गरीबी से परेशान था, किसी की प्रोमोशन काफी समय से रुकी हुई थी। जिसके चलते इस घटना से सबको अपना गुस्सा निकालने का बहाना मिल गया था। बिछिया मंदिर का घंटा बन गई थी। जिसकी जैसी इच्छा हुई, घंटी बजाने चला आया। बिछिया से काफी पूछताछ की गई। सभी के द्वारा उसे काफी ज़लील किया गया। उसके कपड़े तक उतार लिए गए। कुछ नहीं पता चला, हां, बीड़ी के 8-10 पैकेट ज़रूर मिले। शक पक्का हो गया। उन सब की नज़र में चोर बिछिया ही थी। रूपये ना मिलने थे और ना ही मिले।

दिसम्बर आया, परीक्षाएं आईं और चली गईं। जनवरी में रिजल्ट भी आ गया, अनिमेश स्कूल में फर्स्ट आया था। अनिमेश के पिताजी ने खुश होकर अनिमेश को साइकिल खरीद कर दी। स्कूल में 26 जनवरी मनाने की तैयारी चल रही थी।

अनिमेश के मम्मी-पापा गाँव गए थे। परीक्षा के कारण अनिमेश अपने कमरे की सफाई पर ध्यान नहीं दे पाया था। अब छुट्टियां आ रही थी, वो अपनी किताबों को साफ करने में जुट गया। सफाई के दौरान अनिमेश को वो 2000 रूपये किताबों के नीचे पड़े मिले। अनिमेश की खुशी का कोई ठिकाना ना था। तुरंत, साइकिल उठाकर गाँव गया और 2000 रूपये अपनी माँ को दे दिए।

बिछिया के बारे में पूछा। मालूम चला वो आजकल काम पर नहीं आ रही थी। परीक्षा के कारण अनिमेश को यह  बात ख्याल में आई ही नहीं कि जाने कबसे बिछिया ने काम करना बंद कर रखा था। अनिमेश जल्दी से जल्दी बिछिया से मिलकर माफी मांगना चाह रहा था। वो साइकिल उठाकर बिछिया के घर पर जल्दी-जल्दी पहुंचने की कोशिश कर रहा था और उसके घर का पता ऐसा हो गया जैसे की सुरसा का मुंह।

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जितनी जल्दी पहुंचने की कोशिश करता, उतना ही अटपटे रास्तों के बीच उसकी मंजिल दूर होती जाती। खैर, उसका सफर आखिरकार खत्म हुआ। उसकी साइकिल बिछिया के घर के सामने रुक गई। उसका सीना आत्मग्लानि से भरा हुआ था, उसकी धड़कन तेज थी। वो सोच रहा था कि वो बिछिया का सामना कैसे करेगा? बिछिया उसे माफ करेगी भी या नहीं। उसने मन ही मन सोचा कि बिछिया अगर माफ नहीं करेगी तो वह उसके पैर पकड़ लेगा। उसकी माँ ने तो अनिमेश को कितनी ही बार माफ किया है, फिर बिछिया माफ़ क्यों नहीं करेगी? और उसने कोई गलती भी तो नहीं की है।

तभी एक कडकती आवाज़ ने उसकी विचारों की श्रृंखला को तोड़ दिया। अच्छा ही हुआ, उस चोर को खुदा ने अपने पास बुला लिया। यह आवाज़ बिछिया के पति की ही थी। उसके पति ने कहा, खुदा ने उसके पापों की सज़ा दे दी। हुक्का पीते हुए उसने कहा 2000 रूपये कम थोड़े ना होते हैं बाबूजी। इतना रुपया चुराकर कहां जाती ! अल्लाह को सब मालूम है। बिछिया को टी.बी. हो गया था। उस चोर को बचा कर भी मैं क्या कर लेता और उस पर से मुझे परिवार भी तो चलाना होता है।

अनिमेश सीने में पश्चाताप की अग्नि लिए घर लौट आया। उसके पिताजी ने पूछा, अरे ये साइकिल चलाकर क्यों नहीं  आ रहे हो? यह साइकिल को डुगरा के क्यों आ रहे हो? दरअसल, अनिमेश अपने भाव में इतना खो गया था कि उसे याद हीं नहीं रहा कि वो साइकिल लेकर पैदल ही चला आ रहा है। उसने बिछिया के बारे में तहकीकात की।

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बिछिया अधेड़ थी। वह कितना अपना अपमान बर्दाश्त करती? मन पर किए गए वार तन पर असर दिखाने लगे। उस पर से बीड़ी की बुरी लत। बिछिया बार-बार बीमार पड़ने लगी थी उसे खांसी के दौरे पड़ने लगे। इसके चलते उसका काम करना मुश्किल हो गया था। वह अधिकतर अब अपने घर पर ही रहने लगी, हालांकि, उसके पति ने अपनी हैसियत के हिसाब से उसका इलाज कराया पर ज़माने की जिल्लत ने बिछिया में जीने की इच्छा को मार दिया था। बिछिया अपने सीने पर चोरी का झूठा इल्ज़ाम लिए हुए इस संसार से गुजर गई थी।

अनिमेश के ह्रदय की पश्चाताप की अग्नि अभी भी शांत नहीं हुई है। 4o साल गुजर गए हैं बिछिया को गुजरे हुए और आज तक रुकी हुई है वो माफी।

With more than 2 lakh new cases in a day, the second way of the COVID-19 pandemic has been devastating, to say the least. Click here to track confirmed COVID-19 cases in India.

The second wave and the destruction it is wreaking has only highlighted how our healthcare system and responsiveness is in shambles. With people having to fend for themselves and their loved ones through appeals over social media, netizens have risen to the occasion, with many lists of resources (from the information of hospitals, mental health counselling, lists of doctors conducting online consults) and general help being circulated widely.

We’ve curated a list (by no means exhaustive) that will be updated as frequently as possible, for relief measures, counselling, and more.

Firstly, this app generates links to Twitter searches, to help find resources for COVID in your city of choice: https://hdg6p.csb.app

Healthcare And Resources

This comprehensive list by Uncut also has state-wise lists of resources (Hospital beds, medicine, oxygen cylinders, ambulance service, meal services, and more).

This thread by Indian Civil Liberties Union on resources in Delhi:

A more comprehensive list by the good folks at ICLU:

For helpline numbers of different covid facilities in different states:

For more verified information, here is another curated list of helpline numbers and more:

If you would like to pitch in volunteer during such a distressing time, COVID Citizen Action Group, as part of the Medical Support Group, is looking for volunteers to crowdsource information requested by COVID patients and follow up critical cases:

This list has been verified as well and contains information on: Oxygen (Refill, Request, Available), Remdesivir (supplies, contact, available, distributer), Plasma (donate, donor, request, available), Bed, Hospitals, home care, Helpline no. / Contact/ Hospitals, Actemera (Tocilizumab), Online consultation /Doctors, Ambulance services, Meals, Food, Home delivery, RT PCR tests, all across India: Head here.

If you would like to contribute to this list or if you have any information on any of the numbers or resources above, or if you would just like to reach out to us, please do write to submit@youthkiawaaz.com or info@youthkiawaaz.com

If you or a loved one do test positive, here are some basic measures you can follow (and of course, consult a doctor):

 

For Mental Health Awareness: How To Combat Worsening Mental Health

  1. Mental health and psychosocial considerations during the COVID-19 outbreak: World Health Organisation has developed a comprehensive series of messages that can be used in communications to support mental and psychosocial well-being in different target groups during the outbreak. Target groups include frontline workers, managers in health facilities, older adults and people with underlying health conditions, people in isolation, and the general population. It can be found here.
  2. When COVID-19 meets Pandemic Hope: Existential care of and in the Impossible: This article talks about how when stress and anxiety engulf your loved ones, offering hope which means “don’t worry, we’re in this together” is a better approach than “look at the bright side of life”. The article sheds light on other pertinent mental health issues. It can be found here.
  3. Coronavirus and Mental Health: Supporting Someone During Covid-19: This article stresses the importance to reach out and check in on your loved ones during this pandemic. It can be found here.
  4. How teenagers can protect their mental health during coronavirus (COVID-19): This piece enlists strategies for teenagers who are facing a new (temporary) normal. It can be found here.
  5. Being Mindful of Your Mental Health During the COVID-19 Outbreak: In this article, the National Association of School Psychologists offers tips on how to talk to kids about the pandemic. It can be found here. More such articles on the importance of staying connected, showing compassion and following a ‘calm’ approach can be found here and here.

For Mental Health Awareness: Resources

In the wake of Covid-19, there are a lot of organisations and collectives that are offering mental health services virtually to deal with stress, anxiety and other mental health issues you might be facing.

Suicide Prevention India Foundation maintains a list of helpline numbers one can speak to in confidence: http://www.spif.in/seek-help/

icall, a counselling service run by TISS, has maintained a crowdsourced list of therapists across the country: https://bit.ly/3lT1Npd

If you want to know of any mental health professionals who are volunteering and providing mental health services, iCall is compiling a list. Please fill in the details here.

 

For Domestic Violence And Abuse: Resources

 

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Stay safe, mask up, and stay home if possible.

If you would like to contribute to this list or if you have any information on any of the numbers or resources above, or if you would just like to reach out to us, please do write to submit@youthkiawaaz.com or info@youthkiawaaz.com

14 अप्रैल की दोपहर दक्षिण दिल्ली स्थित जामिया नगर के नूर नगर के झुग्गी-झोपड़ी निवासियों के लिए बगैर बताए किसी बड़ी मुसीबत की शक्ल में आ खड़ी हुई। दोपहर के दो बज रहे थे। सभी अपने कामों में व्यस्त थे। कोई रिक्शे की सवारी से सौ-दो सौ कमाने के लिए घर से बाहर था, तो कोई पास की कोठियों में झाड़ू-पोंछा करके रोज़ी-रोटी की तलाश कर रहा था।

अचानक तब ही एक इलेक्ट्रिक शॉक से आग लगी और महज़ दस मिनट के भीतर करीब सौ झोपड़ियां राख में तब्दील हो गईं। घंटे-डेढ़ घंटे के बीच दिल्ली फायर सर्विस पहुंची, मगर तब तक सभी झोपड़ियां आग के हवाले हो चुकी थीं। इन सब में राहत की बात यह रही है कि इस हादसे में किसी की जान को नुकसान नहीं हुआ है।

शबाना बेसुध-बेखबर अपनी हालत पर रोती हुई कहती हैं कि हमारा सब कुछ इस आग में  बर्बाद हो गया। हमारे पास कुछ बाकी नहीं रहा। हाथ में रखे राख के कुछ ढेर को दिखाते हुए शबाना आगे कहती हैं यह बीस हज़ार रुपए हैं। इस हादसे की आग में बीस के बीस हज़ार रुपये जलकर राख राख हो गए। अपनी बहन की शादी के लिए दिन- रात एक करके संजोए थे यह पैसे। वहीं दूसरे हाथ में जले हुए प्लास्टिक बैग्स में कुछ गहनों को दिखाते हुए शबाना रोने लगती हैं।

और पढ़ें: पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की मांग करते हुए रायपुर के जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल

वे कहती हैं कि अब मैं अपनी बहन की शादी कैसे करूंगी? मेरे परिवार में कोई नहीं है कमाने वाला। कोठियों में झाड़ू-पोंछा करके बहन की शादी के लिए बीस हज़ार रुपए और कुछ गहने इकट्ठा किए थे। इनमे एक वाशिंग मशीन भी शामिल थी। इस आग में सारा के सारा सामान जलकर राख हो गया है।

40 वर्षीय मोहमद इमरान बताते हैं कि आगज़नी की ख़बर सुनकर वह दौड़ता हुआ आया। अपने बच्चों को जल्दी- जल्दी झोपड़ी से बाहर निकाला। हमारे बच्चे दो मिनट भी अंदर रह जाते तो उनका नामोनिशान तक नहीं बचता। हमारे पास इतना समय भी नहीं था कि हम अपने लिए दो जोड़ी कपड़ा भी निकाल सकें। हमने जो कपड़े अभी पहने हैं उसके अलावा हमारे पास कोई दूसरा कपड़ा नहीं है। आग में जलकर सब राख हो चुका है।

मोहम्मद इमरान बताते हैं कि हमारे पास एक रुपया तक नहीं बचा है। झोपड़ियों में रहने वाले अधिकतर लोग ई- रिक्शा चलाते थे। आग लगने से जितने रिक्शे पार्किंग में लगे थे सब जलकर ख़ाक हो गए। ऐसे में हमारे पास अब रोज़गार का कोई साधन नहीं बचा है। हमारे बच्चे भूखे हैं। मैं ज़ख्मी हूं। इलाज के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं। अब हम कहां जाएंगे! कैसे हमारे परिवार का गुज़र-बसर होगा?

रुखसाना खातून बताती हैं कि जब आग लगी तो मैं कोठी से काम करके वापस घर लौटी ही थी। अचानक शोर मचा। मैं बच्चों को लेकर बाहर निकल आई। मैं बुरी तरह से डरी हुई थी। आग के शोले आसमान को छू रहे थे। नज़रों के सामने अपने बरसों की मेहनत को खाक होते हुए देख रही थी। मेरे चार छोटे-छोटे बच्चे हैं। इनको लेकर कहां जाऊंगी? मेरा घर नहीं बचा। सरकार ने पास के स्कूल में रहने का इंतज़ाम किया है। रमज़ान का महीना चल रहा है। वक्त पर सेहरी और अफ्तारी नहीं मिल पाती है। उसके लिए भी हमें अलग जद्दोजहद करनी पड़ती है।

और पढ़ें: “विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जनता के हितों की सुरक्षा ज़रूरी है या चुनाव?”

स्थानीय निवासियों का कहना है कि विधायक अमानतुल्लाह खान आए थे। उन्होंने प्रत्येक परिवार को 25 हज़ार देने का वादा किया है। मोहम्मद इमरान कहते हैं की दो दिन बीत चुके हैं। मगर अब तक हमें कुछ आश्वासन नहीं मिला है कि हमें पैसे कब तक मिलेंगे?

वहीं आसिया ख़ातून कहती हैं कि आज शाम हम लोग स्थानीय विधायक अम्नतुल्लाह खान के पास मदद की गुहार लगाने जाएंगे। हमें सरकार से कुछ नहीं चाहिए। हम एक नए सिरे से अपनी ज़िंदगी की शुरुआत करना चाहते हैं। बस सरकार हमें रहने के लिए एक घर मुहैया करा दे।

  

Indian swimmer Srihari Nataraj won his second Gold in 50m backstroke swimming and made a national record in Uzbekistan Open Championship. It took only 25 seconds for the 20-year-old Srihari to get the top prize in the Olympic qualifying event on April 17, 2020.

Indian swimmers got a total of 29 medals, which comprise 18 Gold, seven Silver and two Bronze in the event. This was Srihari’s third national record in the last two days as he had made a new record twice in 100m backstroke.

Srihari achieved the ‘B’ standard time for Tokyo Olympics in the 100 m backstroke. His personal best score was 54.10 seconds, but he later improved it to 54.07 seconds in the final match to win a Gold. He missed the Olympic ‘A’ mark by just 0.22 seconds.

There was another Olympic aspirant named Sajan Prakash who also impressed everyone present at the event by winning a Gold medal in all the four categories he participated in. On the final day, Prakash, who is recovering from shoulder injury, finished in 53.69 seconds in the 100m butterfly to top the table.

Indian swimmer Srihari Nataraj.Credit: Getty Images

Maana Patel and Suvana Bhasker, two Indian women swimmers, had won gold and silver medals respectively in the 50m backstroke event with the best score of 30.28 seconds. Apart from Srihari and Sajan, the only male swimmers from the country to participate at the 2016 Rio Olympics fell short of the Olympic ‘A’ mark for the Tokyo games.

Sajan, who took part in the 200m butterfly on Tuesday, completed his lap in 1 min 57s, and missed the Olympic ‘A’ cut, which was set at 1m56s. A ‘B’ mark Olympic means that the swimmer might get an invitation for the event, if the places are not filled up. On the other hand, a ‘A’ mark means an automatic position for the Tokyo Olympics.

Other than Sajan and Srihari, there are other Indian swimmers who received the Olympic ‘B’ mark for Tokyo Olympics. These are Virdhawal Khade, Kushagra Rawat, Aryan Makhija and Advait Page. None of the Indian swimmers have received the Olympic ‘A’ mark for the Tokyo Olympics.

Also read: Does KKR Have It In Them To Lift The IPL Trophy This Time?: An Analysis

किसी भी लोकतंत्र का आधार स्तंभ उसकी जनता होती है और जब जनता ही लाचार हो जाए तो लोकतंत्र रसातल की ओर बढ़ने लगता है। जिस वक्त विश्व का सब से बड़ा लोकतंत्र कोरोना के प्रचंड तांडव को झेल रहा है और उसी वक्त देश के कुछ राज्यों में लोकतंत्र का महापर्व मनाया जा रहा है। इस बार फिर से महामारी को इतना विकराल रूप देने में ना सिर्फ सरकार की गलती है बल्कि, हमारे देश के नागरिक भी इसके लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार हैं।

महाभारत युद्ध और महाविनाश का दोषी केवल धृतराष्ट्र ही नहीं थे बल्कि, पूरी कौरव सेना और उनका लोभ था और उनके इसी लोभ ने उनके महाविनाश को जन्म दिया। कुछ इसी प्रकार सत्ता का लोभ चुनावी राज्यों में देखने को मिल रहा है और इस बार देश में हो रहे महाविनाश का कारण केवल कौरव सेना ही नहीं बल्कि, पांडव और स्वयं धर्मराज भी हैं।

और पढ़ें: सालभर बाद भी कोरोना के खिलाफ हम एक बेहतर स्थिति में क्यों नहीं हैं?

देश फिर से लॉकडाउन के कगार पर है। पूरे एक साल से शिक्षा के नाम पर बस खानापूर्ति हो रही है, वो भी डिजिटल माध्यम की कृपा से और जिनके पास मोबाइल नहीं है उनकी कौन सोचता है? सरकार के द्वारा दसवीं के परीक्षाओं को रद्द करना एक सराहनीय कदम है, लेकिन पिछले 1 सालों में हमने कुछ भी नहीं सीखा इस परिणाम से हमें यही देखने को मिलता है।

2 गज दूरी मास्क है ज़रूरी यह सुरक्षा नियम क्या केवल आम जनमानस के लिए है? 

क्या यह मूलमंत्र केवल उन राज्यों के लिए है जहां चुनाव नहीं हो रहे हैं, क्योंकि जहां अभी चुनाव हो रहे हैं वहां का नज़ारा तो बिल्कुल ही विपरीत है। चाहे वह चुनावी सभा हो रैली या फिर बैठक,इन सब कार्यक्रमों में शामिल लोगों को देखकर ऐसा जान पड़ता है कि यह मूलमंत्र इनके कोई काम का नहीं है।

चाहे वह सत्ताधारी पार्टी की चुनावी सभा हो या फिर विपक्ष की रैली अमूमन स्वयं नेताजी के चेहरे से मास्क गायब ही दिखता है और अगर जो कुछ जनता के चेहरे पर कभी मास्क दिख भी जाए तो 2 गज दूरी वाली थ्योरी किसी सरकारी फाइल जैसे सरकारी तंत्र में विलुप्त हो गई है।

और पढ़ें: भारतीय मीडिया दलितों, अल्पसंख्यकों और विपक्ष विरोध का सबसे खतरनाक चेहरा है”

जिस तर्ज पर सरकार ने 12वीं की परीक्षाएं स्थगित की हैं, तो उसी नियम के तहत देश के राज्यों में होने चुनाव भी कुछ महीनों के लिए स्थगित हो सकते थे। जनता सकुशल रहेगी तो चुनाव फिर हो जाएगा, सुनिए सरकार अभी देश को इस महाअग्नि से बचाइए नहीं तो चारों ओर चिता ही चिता देखने को मिलेंगी।

आपने कहा थाली बजाओ हमने बजाई, आपने कहा दिए जलाओ हमने जलाए, लेकिन आप स्वयं ही चुनावी रैलियां कर रहे हैं, यह कहां तक सही है? इस वक्त पार्टी पॉलिटिक्स से ऊपर उठ कर हम सभी को एक साथ एक-दूसरे के लिए आकर लड़ना होगा। गरीबों की पीड़ा को समझिए और देश को लॉकडाउन में जाने से बचाइए, क्योंकि अभी मुझसे एक रिक्शा चालक बंधु ने कहा है कि अगर इस बार लॉकडाउन लगा तो कोरोना के साथ-साथ हम भूख से मर जाएंगे।

इतिहास में कहीं ऐसा ना हो कि आने वाली पीढ़ियां आपको भी यही कहे कि “व्हेन रोम वास बर्निंग, नेरो वास प्लेयिंग फ्लूट.”

( जब रोम जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था)

सभी से मेरी एक विनम्र अपील

1) मास्क अच्छे से पहनें और याद रहे मास्क नाक के नीचे नहीं होना चाहिए।

2) हैंड सैनिटाइजर का हमेशा उपयोग करें।

3) समय-समय पर अपने मास्क को बदलें।

4) किसी से भी बात करते वक्त कम से कम 6 फीट की दूरी रखें।

The big suspension of election campaign announced by the Congress leader was nothing short of a big bloated stop. Rahul Gandhi’s adversaries might say that he was not as good at the ongoing battle of ballots in the upcoming elections, but his stand to suspend campaigning amid the pandemic deserves praise. There was utter callousness in the election states, yet, Rahul Gandhi made an example by announcing his decision to cancel poll campaigns in West Bengal. His declaration came on the day when the country saw its highest single-day spike of over 2.61 lakh Covid-19 cases and the number of active cases surpassed the 18-lakh mark.

Gandhi was supposed to have taken his decision for the country’s people. He did not care about his party’s benefits during the election campaigns, which are still going on in full swing in the state. No other political leader has shown such guts. Does it also show how was he concerned with the rapid spread of the virus?

It was he who first thought to maintain distance from electioneering, thereby following social distancing in true spirit. When a political leader gives up their personal gain in their action, they become true leaders. Selfish reflections are going in wane and Rahul Gandhi appears to be treading the path of patriots.

Also read: Local Media In Gujarat Shows National Media How To Hold Government Accountable

‘Gentleman’ is a word commonly used for respected men. Generally, the gentle trait is missing, because that’s not what men are right? Certain features define ‘masculinity’- tough, strong, fearless, brave, etc. That’s what we are made to believe. I don’t think that anyone who believes in this, realizes the impact it has on people around them and society as a whole. Kid see this behavior in their elders and then carry it forward. But this stereotype needs to be changed. It’s overwhelming to see that people are willing to take the steps needed for the change.

Representational Image

Society’s definition of masculinity severely restricts a man’s ability to communicate his emotions to others.

A question that needs to be answered here is – Why does this stereotype exist and why do people still believe in it? Most people are habitual of it. That’s what they have seen, learned, and are probably will teach to their offsprings. Cinema also supports the same. What surprises me is that films that support such thoughts are blockbusters.

If you are a male, you are expected to do certain things and to avoid certain things because you are not meant for it. It should be clear to everyone that there is a difference between being a man and a male. Someone could be assigned male at birth but being a man, that’s a choice.

But what is an ideal man? We are not perfect, but we can try to be. It’s not a tough task actually. Just be yourself, be real, share your problems, your feelings. Do what you like. Men can be sensible, emotional, sometimes weak and vulnerable, and it’s totally okay. Men can be gentle and not necessarily tough. They can be scared of certain things. The least we can do is just accept them, for whatever they are.

We actually need men who are gentle, real, emotional, and define the standard for others.

Also read: “Masculinity Today Is Not In Crisis, It Is A Crisis Itself“

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कोरोना के इस दौर में आज की परिस्थितियां गरीब, मध्यम वर्ग, छात्र और कुटीर उद्योग वाले श्रमिक जो कि पहले ही आर्थिक रूप से काफी पिछड़े हुए हैं, उनके लिए स्थिति आर्थिक और मानसिक रूप से काफी परेशान करने वाली है।

जुमलेबाजी की सरकार बस कांग्रेस को दोष देने में व्यस्त

वर्तमान केंद्र सरकार यानी नरेंद्र मोदी सरकार ने कभी भी हॉस्पिटल, स्कूल, कॉलेज या बड़े-बड़े संस्थानों को बनाने में ध्यान दिया ही नहीं। ना कभी शैक्षणिक स्तर को बढ़ाने की बात की और ना ही आर्थिक स्थिति को सुधारने की बात की। हर बार बस सरकार बनाने के लिए तमाम तरह के झूठे वादे।

जनता को बस जाति और धर्म के नाम पर लड़ाया गया। चाहे वह दो करोड़ रोज़गार की बात हो, हर जिले में कॉलेज की बात हो, या कई शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की बात हो, हर तरफ झूठ को व्यापक तौर पर मीडिया द्वारा फैलाया गया जिसका नतीजा आज यह देश भुगत रहा है।

कांग्रेस सरकार ने अपने राज में तमाम गलतियां की हो लेकिन कांग्रेस ने हमेशा जनता को कार्य करके दिखाया है। चाहे वह बड़े-बड़े संस्थानों की बात हो, रोज़गार की बात हो, किसानों के लिए कर्ज़ माफी की बात हो या अन्य तमाम बड़े स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल व शैक्षणिक संस्थानों को बढ़ावा देने की बात हो।

कांग्रेस की योजनाएं सदैव गरीब, दलित, मध्यमवर्ग और वंचित समाज के हित में दिखाई देती रही है। जिस व्यक्ति पर इतना खर्च कर उसको पप्पू घोषित करने की योजना बनाई गई, आज उसकी बातें देश में सच हो रही हैं, जिसके चलते देश आज कांग्रेस के राज को याद कर रहा है।

शिक्षित युवाओं से लेकर रेहड़ी-पटरी वाले तक सब परेशान

तमाम छात्रों से बात करके पता चलता है कि एग्ज़ाम की स्थिति बहुत सही नहीं है। एडमिट कार्ड लेट आता है। आ भी गया तो परीक्षा स्थगित हो जाती है। परीक्षा हो भी गई तो रिज़ल्ट लेट आता है। रिज़ल्ट आ भी गया तो गड़बड़ी के चलते कोर्ट में मामला चला जाता है।

आज नौकरी की ये स्थिति हो गई है, कि जो छात्र तमाम बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर घूम रहे थे आज उन्हें एक प्राइवेट जॉब तक नसीब नहीं है। गांव की गलियों से निकलकर शहरों में पढ़ने आए तमाम छात्रों को निराशा का सामना करना पड़ रहा है।

छोटे-छोटे शहरों में तमाम तरह की रेहड़ी-पटरी लगाने वाले, कुटीर उद्योग चलाने वाले, अपनी-अपनी दुकानों पर समान सजाकर बेचने वाले आर्थिक रूप से पिछड़ते चले जा रहे हैं। ये वो लोग हैं, जो रोज़ कमाते हैं और रोज़ खाते हैं। बचता है तो घर-परिवार की व्यवस्थाओं में लगाते हैं।

सरकार समझ नहीं रही है कि जिस दिन इन लोगों को समझ आ गया कि इस व्यवस्था के पीछे नरेंद्र मोदी सरकार का झूठा दिखावा है, उस दिन ये लोग इस सरकार को गिराने में जरा भी संकोच नहीं करेंगे।

सभी समस्याओं को देखते लगता है कि यह स्थिति एक बड़ी आर्थिक महामारी या बड़ी आर्थिक त्रासदी लेकर आने वाली है। जिसका प्रभाव इन वर्गों पर सीधे तौर पर पड़ेगा। सरकार को इनके लिए सुविधाजनक नीति बनाते हुए एक कुशल नेतृत्व का परिचय देना चाहिए।

एक बार फिर पूरे विश्व को इस कोरोना महामारी ने जोर-शोर से जकड़ लिया है। 1 मार्च, 2020 को पूरे देश में जनता कर्फ्यू लगाया गया था, लेकिन एक साल बाद यानी 2021 में फिर से कोरोना वायरस लगातार बढ रहा है। इस बीच पूरी दुनिया में वैज्ञानिकों द्वारा कोरोना की वैक्‍सीन पर शोध जारी है। वर्तमान में भारत, रूस समेत अन्‍य देशों ने इसकी वैक्‍सीन जारी की है।

हमारे देश भारत द्वारा 2 वैक्‍सीन का निर्माण किया गया है। कोविशील्‍ड वैक्‍सीन, इस वैक्‍सीन का उत्‍पादन भारत में सीरम इंस्‍टीट्यूट द्वारा किया जा रहा है। कोवैक्‍सीन, इस वैक्‍सीन का उत्‍पादन भारत बायोटेक द्वारा किया जा रहा है। सरकार एव कई सामाजिक संगठन लोगों में जागरूकता फैलाने का भी काम कर रहे हैं, लेकिन क्या केंद्र एवं राज्य सरकारें इस बार इस मामले में अपनी असफलता का परिचय दे रही हैं?

और पढ़ें: “कोरोना के साथ-साथ व्यवस्था और नागरिकों की लापरवाही भी बढ़ती चली गई है”

मोदी सरकार और राज्य सरकारों द्वारा नागरिकों के लिए सिर्फ वादे, दावे के आधार पर ही हर तरह की योजना लागू की गईं हैं, शायद पिछले वर्ष सरकार ने इस महामारी से निपटने की लिए अच्छे से पूर्ण तैयार नहीं की थी। इसलिए ही उस समय पूरे देश में चरणीयबद्ध लॉकडाउन लगाया गया था। जनता ने तमाम परिस्थितियों के बावजूद भी केंद्र और राज्य सरकारों का साथ दिया, लेकिन इस बार फिर दोनों केंद्र एवं राज्यों की सरकारें कोरोना से निपटने की लिए समय रहते हुए अलर्ट नहीं हो पाईं जिसका आम जन को प्रतिफल यह मिला कि देशभर में एक बार फिर से नाईट कर्फ्यू एव लॉकडाउन जैसी परिस्थितियां पैदा हो गईं हैं।

जिसका खामियाजा देश के हर मध्यम एव गरीब वर्ग को भोगना पड़ रहा है जो रोज़ कुंआ खोदकर रोज़ पानी पीने की तर्ज पर कार्य करते हुए परिवार का पालन पोषण करते हैं। लेकिन, इस महामारी का प्रकोप इतना फैल चुका है कि उसका खामियाजा प्रत्येक देशवासी को भोगना पड़ रहा है। प्रत्येक ज़िले के सरकारी आंकड़ों के अनुसार चार से पांच मौतें रोज़ हो रही हैं, लेकिन मुक्तिधाम (शमशान) में जलती असंख्य चिताएं  और उसके बाहर लगी लाशों की लाइनें सरकार के इस झूठ का पर्दाफाश कर रही हैं।

 इस महामारी के बीच सरकार का चुनावी दंगल जारी है   

 महामारी के बीच में कई राज्यों में विधानसभा एव अन्य चुनावों की तैयारिया चल रही हैं। इसी बीच कई जगह कोरोना के नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है, लेकिन सरकार अपनी धुन में देश को छोड़ सत्ता के मोह में चुनावों एवं रैलियों में व्यस्त है। बंगाल में वर्तमान में चुनाव चल रहे हैं और अभी वहां चार चरणों की वोटिंग होना बाकी है। चुनाव प्रचार के दौरान कोरोना नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। चुनाव प्रचार की रैलियों में लाखों, हज़ारों की संख्या में लोग बिना मास्क के नज़र आ रहे हैं।

चुनाव आयोग ने फरमान जारी किया कि चुनाव प्रचार के दौरान कोरोना गाइडलाइंस का पालन नहीं हुआ तो कड़ी कार्रवाई होगी और चुनावी रैलियों पर रोक लगाई जा सकती है। उम्मीदवारों, स्टार प्रचारकों के चुनाव प्रचार करने पर रोक लगाई जा सकती है। आयोग ने यह फरमान तब जारी किया जब असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के चुनाव खत्म हो चुके थे, लेकिन आयोग के फरमान का किसी भी पार्टी पर जरा भी असर नहीं हुआ और बंगाल के चुनाव प्रचार में पहले जैसा ही नज़ारा है। चुनाव आयोग ने अब तक ना तो किसी नेता की रैली पर रोक लगाई गई और ना ही किसी पार्टी ने आयोग से इस बारे में कोई शिकायत ही की है।

और पढ़ें: “सबसे बड़ा कोविड आउटब्रेक और जनसभा में भीड़ देख लहालोट होते प्रधानमंत्री”

जाहिर है कि कोई शिकायत करे भी तो कैसे? क्योंकि नियमों का मखौल उड़ाने में कोई भी पार्टी किसी दूसरे दल से कमतर नहीं है। मतलब साफ है कि किसी भी दल को चुनाव आयोग के फरमान की ना परवाह और ना ही कोई डर है, लेकिन सरकार को इन सब चीज़ों से थोड़ी कोई फर्क पड़ता है उन्हें तो हर प्रदेश में अपनी सरकार बनानी है। चुनावी रैलियां करनी हैं, लेकिन साथ विपक्ष को भी कहां कोई फर्क पड़ता है उन्हें भी सिर्फ अपनी रोटियां सेकनी हैं।

चुनाव आयोग की निष्क्रिय भूमिका 

ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव आयोग आखिर और क्या करे कि सभी पार्टियों में उसका डर बैठे और कोरोना नियमों का सख्ती से पालन हो? दिल्ली हाइकोर्ट के एडवोकेट व संविधान विशेषज्ञ अनिल अमृत कहते हैं कि चुनाव आयोग के पास यह विधायी अधिकार नहीं है कि वह सम्पूर्ण रुप से चुनाव प्रचार पर रोक लगा सके, लेकिन चूंकि कोरोना महामारी एक अभूतपूर्व स्थिति है। ऐसे में वह चुनावी राज्यों के सभी डीएम व कलेक्टर को यह निर्देश दे सकता है कि यदि उनके इलाके में पीएम से लेकर चाहे कितने ही बड़े मंत्री, नेता की रैली या रोड शो होता है, तो उसमें कोरोना नियमों का सख्ती से पालन हो।

अगर ऐसा नहीं होता है, तो आयोग उनके खिलाफ सख्त कारवाई करेगा। इसका असर यह होगा कि तब डीएम या कलेक्टर बगैर किसी भय के इन नियमों का पालन करवाने से हिचकेंगे नहीं और किसी भी चुनाव के दौरान ज़िले  के रिटर्निंग ऑफिसर ही चुनाव आयोग के आंख,कान व नाक होते हैं। वह कहते हैं कि यह भी हैरानी की बात है कि जब सभी राज्यों से कोरोना मरीजों के आंकड़े प्रतिदिन सार्वजनिक किए जा रहे हैं तब ऐसे में बंगाल के मरीजों की संख्या को आखिर किसलिए छुपाया जा रहा है?

हर परिस्थिति में जनता सरकार का साथ कंधे से कन्धा मिलाकर दे रही है, लेकिन इन सभी चीज़ों से सरकार और प्रशासन को कहां फर्क पड़ता है? पता नहीं ! इस विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जनता के हितों की सुरक्षा ज़रूरी है या सत्ता के लिए चुनाव?                                                                                                                                        

The recent surge in coronavirus cases across India has put the country’s healthcare system under the radar as people wait in long queues to find a hospital bed amidst an ongoing public health crisis.

The official count of cases reported in the last 7 days is close to a million. Also, India set the record for the highest single-day spike with 2,61,500 daily infections on April 17. With over 1500 deaths, the situation is grim and seems to have spiralled out of control.

The social media is full of messages requesting hospital beds, plasma donors, oxygen cylinders. People are stepping up for humanity but nobody knows what the government is doing to handle the situation.

The recent death of a Lucknow-based journalist who was live-tweeting his oxygen levels and still couldn’t find a place in any hospital is a classic example of our country’s poor healthcare system.

Photo: Twitter/@VinaySr18286715

Let’s take a look at the following figures and find out how “well-prepared” our country was to fight this or any pandemic:


We have looked at the World Bank data of four important factors i.e. Health expenditure (% of GDP), Physicians (per 1000 population), Basic Handwashing Facility (% of the population), and Hospital beds (per 1000 population). These factors have emerged as the most crucial in the current crisis.

In 2014, the health expenditure as % of GDP was 3.8%. Over the years, we see that there has been no substantial change. The health infrastructure is crumbling and it was bound to happen as we have just neglected it. No government has paid attention to the alarming needs of people, a lot of campaign promises but the reality on the ground has never changed.

So much emphasis is laid on the washing of hands to stop COVID-19 infections but in actuality, an estimated 78% of rural households and 59% of urban household don’t have access to a reliable water supply. The number of physicians per 1000 people stands at a meagre ~0.5%.

The long line of ambulances waiting outside the hospitals has become the characteristic feature of this second wave of covid infections. The simple reason is that we were always short on beds, let alone during a pandemic time. As per the World Bank data, the total number of hospital beds is just 0.5/1000 people. Hence the total fatalities stood at 1500 in a single day on April 17.

The situation is already out of control and any expectation of a miracle at this point is highly improbable. The least we can do is to follow all the COVID-19 protocols and guidelines and understand our collective responsibility towards each other. Humanity has been able to survive such onslaughts before and would survive again. But the important question is that we as citizens of India would at least start asking for our basic rights such as health or will we sit back and relax waiting for the next pandemic to come. It’s up to us to decide.

Also read: Nowhere To Bury The Dead? COVID Is Drowning Gujarat’s Crumbling Infrastructure
References:

https://data.worldbank.org/topic/health?locations=IN

https://www.firstpost.com/health/coronavirus-news-updates-india-sees-2-6-lakh-new-cases-as-maharashtra-up-delhi-register-record-spike-manmohan-singh-pens-letter-to-pmcoronavirus-news-updates-focus-on-percentage-of-vaccinations-ma-9542331.html

https://www.indiatoday.in/coronavirus-outbreak/story/exclusive-overrun-delhi-govt-hospitals-struggle-with-bed-shortages-for-covid-19-patients-1791833-2021-04-16

Featured image is for representational purposes only.

As I write this article, I’m waiting to get myself tested for Covid-19. But all test centres in the area have a waiting period of at least two days. And if this is the situation in one of the posh parts of Delhi – where people live in regularly sanitised apartments, travel in their own cars, work from home, and have separate bedrooms for quarantining themselves in separate bedrooms – how must other areas be dealing with the sudden Covid spike?

For the past three days, India has been reporting 2+ lakh new cases each day. Hospitals are facing a long line of coughing patients with disparaging oxygen levels, as are crematoriums with a queue of loved ones wrapped in labelled white plastic sheet. Our Facebook and Instagram feeds are filled with people requesting for information on plasma donors and hospitals with ICU beds for their parents.

As the Centre continues to shout slogans at election campaigns and take a dip in the Ganga during the Kumbh Mela, here is a round-up of the Covid numbers that they have left for the state governments to manage on their own.

 

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Maharashtra

The state has been reporting the highest number of active cases for the past few weeks, alone accounting for 27% of all fresh Covid cases in the country. However, this doesn’t stop the BJP and Shiv Sena from starting a political battle.

The state has been reporting a shortage of vaccines, the remdesivir medicine and oxygen supply in BMC hospitals, forcing patients to shift to other hospitals. Meanwhile, on April 18, 2021, a stock of remdesivir worth Rs 4.75 crore was found by the Mumbai police, suspecting that the drug was being illegally imported. To save the Gujarat pharmaceutical company that was moving the stock, BJP’s Devendra Fadnavis reached the spot to say that the government had ordered the stock from the company.

Gujarat

Though the state has not made it to the five worst-affected states due to Covid, many suspect that it is because of the severe undercounting by the state. A small city such as Surat has been cremating over 100 corpses in a single day for the past few days, reported BBC Gujarati. “[The crematorium’s] exhaust chimneys are melting because the gas furnaces are burning 24/7,” AltNews co-founder Pratik Sinha tweeted on April 15.

Let alone provide adequate beds and oxygen supply in the hospitals, the Gujarat government did not even deem it necessary to dignify the death of its citizens by including them in the official numbers. As reported by Scroll.in, in Ahmedabad, the state government officially declared just 20 Covid deaths on April 12. But Sandesh, a leading Gujarati newspaper, claimed that at least 63 people had died in just one government-run Covid-19 hospital in the city on the same day.

Uttar Pradesh

If the competition is of apathy, one can always rely on the Yogi government to stand out. After videos and images of a large number of pyres burning on a crematorium ground in Lucknow went viral, the UP government ordered tin sheets to be put up around the ground to block the view.

Remember, pathology chains in the state have been reporting under-testing due to logistical constraints from the state, and there has been a shortage of hospital beds and oxygen supply in its capital city. But the government put up tin sheets to hide people’s pain.

The Bhaisakund crematorium in Lucknow being covered with blue tin sheets on April 15 after its photo and videos showing a number of dead bodies burning went viral on social media. Credit: PTI

Delhi

While the second wave of coronavirus hit Delhi almost a month after it hit Maharashtra, it did not take much time for the capital city to surpass all numbers and become the worst-hit city within a span of few days. While the highest single-day peak for Mumbai has been 11,163 cases on April 4, Delhi recorded 25,000 fresh cases on April 18.

As long queues of Covid patients started forming outside state-run hospitals, the Delhi government has decided to convert banquet halls and hotels into makeshift facilities for treating patients.

 

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Other States

Similar headlines of record-breaking single-day cases have appeared on news channels of most other states. On April 4, Bengaluru recorded 8,155 cases, Chennai 2,564 cases and Pune 12,494 cases, the highest daily surge since the pandemic began. Amid campaigning for its eight-phase assembly election, West Bengal recorded its highest single-day spike on April 18 with 8,419 cases. The news does not seem to have reached the Election Commission, who has refused to club polling phases and imposed laughable restrictions in campaign rallies involving thousands of political workers

The last phase of polling in Bengal is on April 29, two days later. Can the country expect its prime minister to make his appearance before that and prioritise the country’s health? The answer is an eerie silence.

Featured image credit: Twitter/ANI
Also read: 12 Questions That Will Put Your COVID Vaccine Queries To Rest

ड्रीम जॉब किसे नहीं चाहिए होती? आखिर इसीलिए तो हम सभी सालों तक कड़ी पढ़ाई और मेहनत करते हैं। मगर दुःख की बात ये है कि कई बार इतने सालों की मेहनत और धैर्य के बाद भी लोगों को वो जॉब नहीं मिल पाती, जो उनका सपना था। कई बार लोग ऐसी जॉब कर रहे होते हैं, जो उनके प्रोफाइल से बिलकुल ही अलग है।

मैं मानता हूं कि हमेशा हम जो चाहते हैं, ज़रूरी नहीं है कि हमें वही मिले लेकिन ये भी सच है कि अगर आप दिमाग से काम लें, तो कई बार अपने सपने तक पहुंच भी सकते हैं। इस आर्टिकल में मैं आपके साथ कुछ ऐसे उपाय शेयर करूंगा, जिनसे आप अपनी ड्रीम जॉब तक बहुत ही आसानी से पहुंच जाएंगे। तो आइये दोस्तों, शुरू करते हैं।

1. अपने जॉब के लिए आवश्यक स्किल्स पाएं

तो दोस्तों, अब जब आप जानते हैं कि आपका लक्ष्य क्या है! पहली स्टेप है, इस जॉब के लिए आवश्यक स्किल्स और ज्ञान पाना। इसमें सबसे पहला कदम है, आवश्यक अहर्ता होना। जो भी आपका लक्ष्य है, उसके अनुसार या तो आप किसी छोटे से कोर्स को जॉइन कर सकते हैं या कभी-कभी आपको एक फुलटाइम डिग्री कोर्स में भी एडमिशन लेना पड़ सकता है। एक बार आपको आवश्यक एजुकेशन मिल जाए, तो आपको आवश्यक स्किल पर फोकस करना होगा।

हर जॉब के लिए कुछ फिक्स्ड क्वॉलिटीज़ होती हैं, जो कि एक योग्य उम्मीदवार में ज़रूर होनी चाहिए। इनमें से काफी सारी स्किल्स तो आपको पढ़ाई में ही मिल जाएंगी लेकिन कुछ ऐसी भी होंगी जो आपको सीखनी होगी।

अगर आप ये स्किल्स सीख जाएंगे तो जॉब में चयन होने के आपके चांसेज़ बहुत बढ़ जाएंगे।

2. एक आकर्षक रेज़्युमे तैयार करें

दोस्तों पहला इम्प्रेशन ही आखिरी इम्प्रेशन होता है। खासकर जब आप रेज़्युमे की बात कर रहे हैं। क्या आप जानते हैं, हर एवरेज जॉब के लिए लगभग 250 रेज़्युमे आते हैं, जिनमें से 4-5 को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है और 1 का चयन होता है? इसके अलावा, एक रिक्रूटर सिर्फ 30 सेकेंड में ये तय कर लेता है कि आपको इंटरव्यू के लिए बुलाना है या नहीं? इसी जगह बहुत सारे लोग फेल हो जाते हैं। रेज़्युमे में की जाने वाली कुछ आम गलतियां हैं:

● funnybaby@gmail.com इस तरह की ईमेल का उपयोग करना

● टाइपिंग मिस्टेक्स करना

● गलत डेट्स लिखना

● बेकार डिज़ाइन का रिज्यूमे

● रेज़्युमे की जगह एक किताब लिख देना

● कुछ ज़्यादा ही पर्सनल डिटेल्स डाल देना

दोस्तों, बहुत सारी वजह है जिससे आपका रेज़्युमे रिजेक्ट हो सकता है। रेज़्युमे आपका फर्स्ट इम्प्रेशन है और अगर ये जॉब आपका सपना है, तो आपको एक आकर्षक रेज़्युमे बनाना ही होगा। एक ऐसा रेज़्युमे बनाएं जो आपको अलग पहचान दे। मगर जो फ्रेशर्स होते हैं, उनके पास एक्सपीरियंस सेक्शन में लिखने के लिए कुछ नहीं होता। इसलिए कई बार सारे फ्रेशर्स के रेज़्युमे एक ही जैसे दिखाई देते हैं।

अगर आप ऑनलाइन रेज़्युमे मेकर्स टूल ढूंढे तो आपका ये काम बहुत ही आसान हो जाएगा। आखिर जब आपका रेज़्युमे इतना अच्छा हो, तो कौन इसे नकार कर सकता है?

3. जॉब के लिए अप्लाई करें

ये एक बहुत ही मुख्य हिस्सा है और आपकी ड्रीम जॉब पाने पर एक बहुत बड़ा प्रभाव डालता है। नीचे दी गई कुछ टिप्स को ध्यान में रखें:

जॉब पोस्टिंग साइट्स पर अकाउंट बनाएं। इन्हीं साइट्स पर आपके रिक्रूटर आप जैसे उम्मीदवार को ढूंढ़ रहे होते हैं। जो भी जानकारी पूछी जाए उसे ध्यान से दें। एक बार आपका प्रोफाइल बन जाए तो जो जॉब्स आपसे मैच करे, वहां अप्लाई करें। Naukri.com, Monster.com, आदि कुछ प्रमुख वेबसाइट्स हैं।

सोशल मीडिया का उपयोग करें:

दोस्तों, सोशल मीडिया सिर्फ मस्ती के लिए नहीं है। चाहे वो Linkedin हो या Twitter, ये सभी सोशल मीडिया चैनल्स बहुत सारी जॉब्स के अवसर लेकर आते हैं। इसलिए सोशल मीडिया पर हमेशा एक साफ सुथरा और अपडेटेड प्रोफाइल रखें।

आप चाहें तो Facebook और Linkedin पर बहुत सारे ग्रुप्स भी जॉइन कर सकते हैं। जहां पर जॉब्स संबंधित अपडेट्स शेयर की जाती हैं। ट्वीटर पर अगर आप #Jobs सर्च करेंगे तो भी आपको बहुत सारी जॉब्स के बार में जानकारी मिल जाएगी।

अंत में, ध्यान रखें कि आप हर कंपनी में कहीं एक ही रेज़्युमे तो नहीं भेज रहे? अगर आप सभी कंपनी में एक ही रिज्यूमे भेज रहे हैं, तो ध्यान रहे कि आपको इंटरव्यू के लिए बुलाये जाने के चांसेज़ बहुत ही कम हैं। इसलिए जब भी आप किसी जॉब के लिए अप्लाई करें, जॉब के अनुसार ही स्किल्स एड करें और जो जॉब से मैच न करे, उन्हें हटाएं। इसके अलावा हर जॉब एप्पलीकेशन के साथ एक कवर लेटर भी भेजें।

4. नेटवर्किंग करें और कॉन्टैक्ट बनाएं

जॉब ढूंढते वक्त नेटवर्किंग का बहुत महत्त्व होता है। यह एक ऐसा स्टेप है, जो आपके आपके करियर के हर दौर में मदद करेगी। इसलिए दोस्तों, मस्ती छोड़ें और सही लोगों से जान-पहचान बनाएं। सोशल मीडिया पर जाएं, साइट्स पर जाएं, रिश्तेदार, दोस्त सबसे सलाह लें और सबसे सवाल करें। क्या पता उनमें से कोई आपकी पहचान एक अच्छी कंपनी में ही करा दे?

इसके अलावा आपके दिमाग में कोई एक कंपनी है, जिसके साथ काम करना आपका सपना है, उन्हें मेल करें और अपनी ये ख्वाहिश उनके सामने ज़ाहिर करें।

हो सकता है, उनके पास अभी आपके लिए कोई काम न हो लेकिन अगर उनके पास ऐसा कोई काम आता है तो उनके दिमाग में पहला ख्याल आपका ही आएगा। दोस्तों, इन सब कामों के लिए Linkedin एक आदर्श जगह है।

5. अच्छे से इंटरव्यू दें

एक बार आपको इंटरव्यू के लिए कॉल आ जाए, आपके पास एक सच्चा मौका होगा खुद की काबिलियत को साबित करने का। मगर बुरी बात ये है की 33 % लोग इंटरव्यू शुरू होने के 90 सेकेंड्स में ही ये तय कर लेते हैं कि आपको हायर करेंगे या नहीं? नीचे दी गई कुछ टिप्स यहां आपके काम आएंगी।

नेट पर बहुत सारे कॉमन सवाल मिल जाएंगे। उन्हें पहले से ही तैयार करके रखें। साथ ही कुछ एडवांस्ड क्वेश्चन्स भी देख लें। इंटरव्यू में अच्छे से जाएं। ध्यान रहे, इंटरव्यू सिर्फ आपके जवाबों के लिए नहीं है, बल्कि इंटरव्यू आपकी पर्सनालिटी देखने के भी काम आता है। इसलिए पहला नियम, हमेशा समय से जाएं। अगर आप किसी इमरजेंसी में फंस गए हैं, तो अपने इंटरव्यूअर को तुरंत बताएं।

घबराएं नहीं। हम सभी इंटरव्यूज़ से पहले बेचैन हो जाते हैं लेकिन कोशिश करें कि इंटरव्यू में आत्मविश्वासी दिखें। अगर आप जवाब जानते हैं तो विनम्रता से जवाब दे दें और अगर आपको जवाब नहीं पता, तो इधर-उधर की बात करने की बजाय शालीनता से उन्हें बता दें कि आप इसका जवाब नहीं जानते।

जिस भी कंपनी के लिए आप इंटरव्यू दे रहे हैं, उसके बार में पहले से कुछ जानकारी हासिल कर लें। उस कंपनी के मालिक, लोकेशंस, काम और प्रॉडक्ट्स के बारे में अगर आप पहले से जान लेंगे तो ये आपके इंटरव्यूअर को प्रभावित करेगा।

इसके अलावा अपने कपड़ों पर भी ध्यान दें। लड़कियों के लिए बहुत छोटे या बहुत टाइट कपड़े इम्प्रेशन खराब कर सकता है। इसी तरह लड़के पजामा या चप्पल में इंटरव्यू देने नहीं जा सकते। अगर आप चाहते हैं कि इन्टरव्यूअर आपको सीरियसली ले, तो आपको खुद को उसी तरह दिखाना होगा।

दोस्तों, ये किसी भी जॉब को पाने के 5 मुख्य पार्ट्स होते हैं। अगर आपने इन सभी में अच्छे से काम कर लिया तो आपकी ड्रीम आपको मिल कर रहेगी और ये भी ध्यान रखें कि अगर पहली बार में आपको आपकी जॉब नहीं मिलती तो इसका ये मतलब नहीं है कि कभी नहीं मिलेगी। मेहनत करें, खुद पर विश्वास रखें, तो जीत आपकी ही होगी।

I attended this workshop that was organised by Youth Ki Awaaz. The two-hour workshop was about how the media and political parties are spreading rumours for their own advantage.

Being good citizens of our beloved country India, we need to keep ourselves updated and aware of the whereabouts of the country. After attending the workshop, I understood how deep and serious the problem of spreading wrong or fake information is. Although only a few of us could attend the workshop, it is very important to understand the seriousness of the issue at hand. The most vital aspects that were discussed in the workshop have been mentioned below:

  • Misinformation
  • Disinformation
  • Fake news

There is a huge amount of data constantly being created in the field of information.

  • Over 50 crore blogs are written every day.
  • Around 35 crore photos are uploaded on Facebook each day.

There are huge numbers for us to analyse. Thus, we must take care before we share anything on the internet.

Representational image

The following are some of the effects of misinformation and disinformation:

  • Spreading of fear
  • Confusion
  • Can incite violence
  • Can cause health-related issues
  • Can compromise with a law-and-order situation

How To Understand Fake News

  • Misinformation
  • Rumour
  • Irrational thoughts
  • Propaganda

A filter bubble is a term coined by Internet activist Eli Pariser to refer to a state of intellectual isolation. Most social media sites provide information as per the search and history of its users. They display the content of the user’s family.

Echo chamber

Social media may limit one’s exposure to diverse perspectives and favour the formation of groups of like-minded users. This reinforces shared narratives, thus creating echo chambers.

How You Can Tune Your Inner Trust-O-Metre

Thinking and making decisions works like a barometer and once you get any sort of information, it affects our inner persona. So, we can call it our trust-o-meter as well.

There is a logical way to adopt any information.

How Can We Use Information In A Good Manner?

Before taking any news or piece of information tremendously, we must keep these three points in our mind.

  • C-credible
  • A-agenda
  • N-need

CAN must be used to scrutinise any information we find on the internet.

There are several ways to confirm the reliability of news, such as:

1. Visual assessment

2. Identifying the news outlets

3. Checking the web domain

4. Checking the About Us section of the website

5. Identifying the author

6. Identify the central message

7. Checking the spelling, grammar and punctuation of the article

8. Analysing the sources and quotes mentioned

9. Tracking other activities of the website

10. Turning to a fact-checking website

a person holding a phone in their hand

We must keep these five points in mind while sharing something on social media:

  • Who wrote the information?
  • What is the source of the information?
  • Where did it come from?
  • Why are you sharing this?
  • When was it published?

To conclude, I would like to say that all information in the  workshop was given to the participants in a scientific way. We must share it with others but with care. It impacts us at a larger scale and so, we must use this weapon smartly.

Love, compassion, humanity, pity and scientific knowledge must be at the centre before you share any news or information.

#TakeCareBeforeYouShare

Also read: Through Safety Apps And Open Platforms, Technology Can Address Gender-Based Violence

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Here are some topics to get you started

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An ambassador and trained facilitator under Eco Femme (a social enterprise working towards menstrual health in south India), Sanjina is also an active member of the MHM Collective- India and Menstrual Health Alliance- India. She has conducted Menstrual Health sessions in multiple government schools adopted by Rotary District 3240 as part of their WinS project in rural Bengal. She has also delivered training of trainers on SRHR, gender, sexuality and Menstruation for Tomorrow’s Foundation, Vikramshila Education Resource Society, Nirdhan trust and Micro Finance, Tollygunj Women In Need, Paint It Red in Kolkata.

Now as an MH Fellow with YKA, she’s expanding her impressive scope of work further by launching a campaign to facilitate the process of ensuring better menstrual health and SRH services for women residing in correctional homes in West Bengal. The campaign will entail an independent study to take stalk of the present conditions of MHM in correctional homes across the state and use its findings to build public support and political will to take the necessary action.

Saurabh has been associated with YKA as a user and has consistently been writing on the issue MHM and its intersectionality with other issues in the society. Now as an MHM Fellow with YKA, he’s launched the Right to Period campaign, which aims to ensure proper execution of MHM guidelines in Delhi’s schools.

The long-term aim of the campaign is to develop an open culture where menstruation is not treated as a taboo. The campaign also seeks to hold the schools accountable for their responsibilities as an important component in the implementation of MHM policies by making adequate sanitation infrastructure and knowledge of MHM available in school premises.

Read more about his campaign.

Harshita is a psychologist and works to support people with mental health issues, particularly adolescents who are survivors of violence. Associated with the Azadi Foundation in UP, Harshita became an MHM Fellow with YKA, with the aim of promoting better menstrual health.

Her campaign #MeriMarzi aims to promote menstrual health and wellness, hygiene and facilities for female sex workers in UP. She says, “Knowledge about natural body processes is a very basic human right. And for individuals whose occupation is providing sexual services, it becomes even more important.”

Meri Marzi aims to ensure sensitised, non-discriminatory health workers for the needs of female sex workers in the Suraksha Clinics under the UPSACS (Uttar Pradesh State AIDS Control Society) program by creating more dialogues and garnering public support for the cause of sex workers’ menstrual rights. The campaign will also ensure interventions with sex workers to clear misconceptions around overall hygiene management to ensure that results flow both ways.

Read more about her campaign.

MH Fellow Sabna comes with significant experience working with a range of development issues. A co-founder of Project Sakhi Saheli, which aims to combat period poverty and break menstrual taboos, Sabna has, in the past, worked on the issue of menstruation in urban slums of Delhi with women and adolescent girls. She and her team also released MenstraBook, with menstrastories and organised Menstra Tlk in the Delhi School of Social Work to create more conversations on menstruation.

With YKA MHM Fellow Vineet, Sabna launched Menstratalk, a campaign that aims to put an end to period poverty and smash menstrual taboos in society. As a start, the campaign aims to begin conversations on menstrual health with five hundred adolescents and youth in Delhi through offline platforms, and through this community mobilise support to create Period Friendly Institutions out of educational institutes in the city.

Read more about her campaign. 

A student from Delhi School of Social work, Vineet is a part of Project Sakhi Saheli, an initiative by the students of Delhi school of Social Work to create awareness on Menstrual Health and combat Period Poverty. Along with MHM Action Fellow Sabna, Vineet launched Menstratalk, a campaign that aims to put an end to period poverty and smash menstrual taboos in society.

As a start, the campaign aims to begin conversations on menstrual health with five hundred adolescents and youth in Delhi through offline platforms, and through this community mobilise support to create Period Friendly Institutions out of educational institutes in the city.

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A native of Bhagalpur district – Bihar, Shalini Jha believes in equal rights for all genders and wants to work for a gender-equal and just society. In the past she’s had a year-long association as a community leader with Haiyya: Organise for Action’s Health Over Stigma campaign. She’s pursuing a Master’s in Literature with Ambedkar University, Delhi and as an MHM Fellow with YKA, recently launched ‘Project अल्हड़ (Alharh)’.

She says, “Bihar is ranked the lowest in India’s SDG Index 2019 for India. Hygienic and comfortable menstruation is a basic human right and sustainable development cannot be ensured if menstruators are deprived of their basic rights.” Project अल्हड़ (Alharh) aims to create a robust sensitised community in Bhagalpur to collectively spread awareness, break the taboo, debunk myths and initiate fearless conversations around menstruation. The campaign aims to reach at least 6000 adolescent girls from government and private schools in Baghalpur district in 2020.

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A psychologist and co-founder of a mental health NGO called Customize Cognition, Ritika forayed into the space of menstrual health and hygiene, sexual and reproductive healthcare and rights and gender equality as an MHM Fellow with YKA. She says, “The experience of working on MHM/SRHR and gender equality has been an enriching and eye-opening experience. I have learned what’s beneath the surface of the issue, be it awareness, lack of resources or disregard for trans men, who also menstruate.”

The Transmen-ses campaign aims to tackle the issue of silence and disregard for trans men’s menstruation needs, by mobilising gender sensitive health professionals and gender neutral restrooms in Lucknow.

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A Computer Science engineer by education, Nitisha started her career in the corporate sector, before realising she wanted to work in the development and social justice space. Since then, she has worked with Teach For India and Care India and is from the founding batch of Indian School of Development Management (ISDM), a one of its kind organisation creating leaders for the development sector through its experiential learning post graduate program.

As a Youth Ki Awaaz Menstrual Health Fellow, Nitisha has started Let’s Talk Period, a campaign to mobilise young people to switch to sustainable period products. She says, “80 lakh women in Delhi use non-biodegradable sanitary products, generate 3000 tonnes of menstrual waste, that takes 500-800 years to decompose; which in turn contributes to the health issues of all menstruators, increased burden of waste management on the city and harmful living environment for all citizens.

Let’s Talk Period aims to change this by

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A former Assistant Secretary with the Ministry of Women and Child Development in West Bengal for three months, Lakshmi Bhavya has been championing the cause of menstrual hygiene in her district. By associating herself with the Lalana Campaign, a holistic menstrual hygiene awareness campaign which is conducted by the Anahat NGO, Lakshmi has been slowly breaking taboos when it comes to periods and menstrual hygiene.

A Gender Rights Activist working with the tribal and marginalized communities in india, Srilekha is a PhD scholar working on understanding body and sexuality among tribal girls, to fill the gaps in research around indigenous women and their stories. Srilekha has worked extensively at the grassroots level with community based organisations, through several advocacy initiatives around Gender, Mental Health, Menstrual Hygiene and Sexual and Reproductive Health Rights (SRHR) for the indigenous in Jharkhand, over the last 6 years.

Srilekha has also contributed to sustainable livelihood projects and legal aid programs for survivors of sex trafficking. She has been conducting research based programs on maternal health, mental health, gender based violence, sex and sexuality. Her interest lies in conducting workshops for young people on life skills, feminism, gender and sexuality, trauma, resilience and interpersonal relationships.

A Guwahati-based college student pursuing her Masters in Tata Institute of Social Sciences, Bidisha started the #BleedwithDignity campaign on the technology platform Change.org, demanding that the Government of Assam install
biodegradable sanitary pad vending machines in all government schools across the state. Her petition on Change.org has already gathered support from over 90000 people and continues to grow.

Bidisha was selected in Change.org’s flagship program ‘She Creates Change’ having run successful online advocacy
campaigns, which were widely recognised. Through the #BleedwithDignity campaign; she organised and celebrated World Menstrual Hygiene Day, 2019 in Guwahati, Assam by hosting a wall mural by collaborating with local organisations. The initiative was widely covered by national and local media, and the mural was later inaugurated by the event’s chief guest Commissioner of Guwahati Municipal Corporation (GMC) Debeswar Malakar, IAS.

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