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दूबे अंकल का बस चले तो पेट से ही आला और मशीन लेकर पैदा हो बच्चा

कल शाम हमारे घर पर एक करीबी रिश्तेदार का आना हुआ। वह जनाब बड़े चिंतित नज़र आ रहे थे। उनकी शक्ल पर शिकन कुछ यूँ विराजमान थी, मानो किसी फरेबी ने उनकी दोनों किडनियां ही निकाल ली हो। जिस पर गौर करते हुए मेरे पिता ने उनके परेशानी का कारण जानने की कोशिश की। तो इन महानुभाव ने बताया कि उनका लड़का तीसरी बार सी.पी.एम.टी. (कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट) की परीक्षा में बैठने वाला है और उन्हें डर है कि अगर कहीं इस बार लड़के को अच्छा मेडिकल कॉलेज नहीं मिला तो मुहल्ले मे बड़ी बदनामी होगी।

उनकी इस परेशानी को गंभीरता से लेते हुए मेरे पिता ने फिर बड़ी उत्सुकता से पूछा, “अगर इस बार अच्छा कॉलेज नहीं मिला तो फिर बच्चे ने आगे के लिए क्या सोचा है?”, तो उन्होंने बड़े विश्वास के साथ कहा, “मिश्रा जी! सोचना क्या है? अबकी बार तो मैं अपने बेटे का एडमिशन अच्छे कॉलेज में करा ही दूंगा, चाहे चालीस-पचास लाख डोनेशन ही क्यों ना देना पड़े।” फिर अपनी मूछों को ताव देते हुए जवाब को पूरा किया, “मैं अपने बेटे को डॉक्टर ही देखना चाहता हूँ”।

कितनी अजीब बात है ना, हमने अपने समाज में ऐसा रिवाज़ बना रखा है कि बेटा बेटी को इंजीनियर या डॉक्टर ही बनाना है। जिसके लिए हम लाखों रुपए डोनेशन देने को भी तैयार रहते हैं। पर हम कभी तसल्ली से बच्चे के बगल में बैठ कर यह जानने की कोशिश नहीं करते कि आखिर वह दिल से क्या करना चाहता है, किसमें उसकी रूचि है? नन्हें से परिंदों की उड़ान का दायरा हमने इस हद तक सीमित कर दिया है कि वो बस एक रिमोट का खिलौना बन कर रह गए हैं।

यह मामला आज इतना गंभीर हो चुका है कि बच्चे के जन्म लेते ही उसके अभिभावक यह फैसला सुना देते हैं, घर में इंजीनियर आया है या डॉक्टर आई है।

बच्चे को बचपन से ही यह घुट्टी पिलाई जाती है कि तुम्हें डॉक्टर या इंजीनियर ही बनना है। यह मेडिकल और इंजीनियरिंग का रसायन उनके दिमाग में कुछ यूं डाला जाता है कि उन्हें यह भी पता नहीं होता, इसके अलावा भी दुनिया में और भी बहुत कुछ करने को हैं। फिर एक दिन जब घर मे मेहमान आते हैं तो उसी 2 साल के बच्चे को बुलाकर बार-बार उससे पूछा जाता है, “बेटा तुम बड़े होकर क्या बनोगे?” और अगर बच्चे ने तुतलाते हुए कह दिया कि डॉक्टर या इंजीनियर, फिर अभिभावक को ऐसा सुख मिलता हैं मानो मेहमान के सामने भारत रत्न मिल गया हो।

और अगर कहीं वही मेहमान जाते-जाते यह कह दें कि बड़ा होनहार बच्चा है फिर तो भाई साहब, माँ बाप तब तक साँस नहीं लेंगे जब तक उसका आई.आई.टी. (इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी) या सी.पी.एम.टी. (कंबाइंड प्री मेडिकल टेस्ट)) का फॉर्म ना भरा दें।

जिस बच्चे को अभी इंजीनियर डॉक्टर का मतलब भी पता नहीं, उसके मुंह में हाथ डालकर उससे बुलवाया जाता है। फिर उस दिन से रोज उसे, उस जुर्म की सज़ा दी जाती है, असल में जो जुर्म उससे कराया गया था। हर बार जब उनका सामना न्यूक्लियर फिज़न , नम्बर थ्योरी, सेमिकन्डक्टर और काईनेटिक थ्योरी से होता है, तो वे यही सोचते हैं कि क्यों कह दिया था बचपन में डॉक्टर /इंजीनियर बनूंगा।

लालच दिखाकर, दबाव डालकर, आर्थिक परिस्थितियों का हवाला देकर, बचपन से ही डॉक्टर /इंजीनियर के नाम का रट्टा मरवा कर और अन्य तरीकों से उन्हें वह बनाने की कोशिश की जाती है, असल में जिसके लिए वो बने ही नहीं हैं। यह हमारी अज्ञानता है, और हम मान चुके हैं कि पैसा,विलासमय जीवन, समृद्धि और शौहरत सिर्फ़ इंजीनियर या डॉक्टर को ही मिलती हैं।

एक रोज़ मैं अपने परिवार के साथ एक शादी में गया जहाँ मेरी मुलाकात एक और विचित्र महानुभाव से हुई, इन्हें सब दूबे जी कह रहे थे। वह महाशय बड़े खुश थे, क्योंकि उनके बेटे को आई.आई.टी. में दाखिला मिल गया था। भाई साहब! वह इतने खुश थे कि शादी में आए लोगों को पकड़-पकड़ कर उन्हें अपने पुत्र की वीर गाथा सुना रहे थे। हम आपको बता दें कि ऐसे वाचाल लोग उस श्रेणी में आते हैं, जो हम जैसों को सुकून से जीने नहीं देते हैं। मतलब होता यूं है कि ये लोग तो पहले अपने पुत्र की गाथा हमारे माँ बाप को सुनाते हैं, फिर रोज़ सुबह शाम वही गाथा हमारे माँ बाप हमे सुनाते हैं, “दूबे जी के लड़के को आई.आई.टी. मे एडमिशन मिल गया, कुछ सीखो…. तुम भी कुछ सीखो…. उसके जैसी मेहनत करो…. ताकि मैं भी गर्व से कह सकूँ कि मेरा बेटा आई.आई.टी. कर रहा।”

हे भगवान! प्लीज़ तू दो मिनट के लिए नीचे उतर आ और इन्हें बस इतनी सी बात समझा दे कि मैं मिश्रा जी का लड़का हूँ, दूबे जी के लड़के की कॉपी नहीं।

खैर मुझे गालियां पड़ ही रही थी कि छौंक लगाने खुद दूबे जी आ गए। “अरे मिश्रा जी आपका लड़का क्या कर रहा?” मेरे पिता जी ने कहा कि “बड़ा होकर लेखक बनना चाहता है। फिजिक्स और केमिस्ट्री इसके पल्ले नहीं पड़ती थी, इसकी इच्छा थी पत्रकारिता पढ़ने की, वही पढ़ रहा है। यकीन मानिए दिल से लिखता है।” फिर दूबे जी भारत के नक्शे सा मुंह बनाते हुए कहते हैं, “वो सब तो ठीक है पर मिश्रा जी! कुछ ढंग का करा दिए होते, आखिर बच्चे के भविष्य का सवाल है।”

लो कर लो बात अब मुझे कोई ये बताए कि ये ढंग का क्या होता हैं? बड़ी शिद्दत से मेरी सार्वजनिक तौर पर बेइज्जती की ही जा रही थी, कि दूर खड़े तिवारी जी भी आनंद लेने चले आए। “अरे मिश्रा जी! मेरे बेटे का भी फिजिक्स और केमिस्ट्री मे बुरा हाल था, पर मैंने तो कुछ पैसे-वैसे देकर प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला करा दिया है। भाई मुझे इंजीनियरिंग के अलावा और कोई फालतू ताम-झाम समझ नहीं आता है। चार साल बाद जब नाम के आगे इंजीनियर लग जाएगा फिर तो समझो कोई ना कोई नौकरी तो पक्की ही है। पर लेखक (मोमोज सा मुँह सिकोड़ते हुए) बड़ा संघर्ष है।”

ये हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं? क्यों हर अभिभावक को अपने बच्चे में डॉक्टर या इंजीनियर ही दिखता है? आज अगर 100 में से करीब 40 बच्चे इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई करने के बजाय कुछ और पढ़ने की सोचते भी हैं, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें या तो अच्छा कॉलेज नहीं मिलता है या फिर उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं होती हैं कि वो लाखों रूपए का डोनेशन दे सकें।

मेरा ऐसा मानना है, कि अधिकांश अभिभावकों की रूचि को देखते हुए हमारे मानव संसाधन विकास मंत्रालय को बारहवीं कक्षा के पंजीकरण के साथ-साथ आई.आई.टी./सी.पी.एम.टी. का पंजीकरण भी अनिवार्य कर देना चाहिए। ज़ाहिर है कि बारहवीं मे हर साइंस साइड स्टूडेंट के अभिभावक यह फॉर्म तो ज़रूर भरवाते ही हैं, ऐसे में उन्हे आसानी हो जाएगी। सुनने में आपको यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है, मगर हकीकत यही कहती है कि अभिभावक अंजाने में ही सही पर अपने बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते आ रहे हैं।

बात शुरू यहाँ से होती है, जब अभिभावक अपनी झूठी शान और बचकानी मानसिकता के चलते अपने बच्चों को ज़बर्दस्ती ग्यारहवीं मे साइंस दिलाते हैं।

फिर बारहवीं का परिणाम आने से पहले आई.आई.टी./सीपीएमटी का फार्म भरा देते हैं। कॉलेज मिला तो मिला, नहीं तो दूबे जी के लड़के को देखकर कोटा भेज देते हैं तैयारी करने। भाई साहब! जिस बच्चे को साइन थीटा, कॉस थीटा ,बेंजीन, फिनोल और किर्चौफ्स लॅा का नाम सुनने से ही बुखार आता था, उसे तीन साल कोटा मे फिज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ पढ़ाते हैं। शायद यह सोचकर कि एक दिन कोई अजूबा होगा और मेरा बच्चा आइंस्टीन बन जाएगा। फिर तीन साल बाद गालियों के साथ उसे घर ले आते हैं, और या तो किसी प्राइवेट कॉलेज में लाखों रूपए देकर दाखिला करा देते हैं, या फिर घर बैठा कर बैंक की तैयारी कराते हैं।

कोटा में कोचिंग जाते स्टूडेंट्स

पर बच्चे की ये मुश्किलें दाखिले के बाद भी कम नहीं होती, वहाँ जाकर भी उसे वही फिज़िक्स, केमिस्ट्री और मैथ का ही सामना करना पड़ता है। परिणामस्वरूप 4 साल की डिग्री मे 8 बैक लग जाती हैं या तो बच्चा दो साल में ही कॉलेज छोड़ कर भाग जाता है। अंत मे फिर उसे हासिल गालियाँ ही होती हैं, मगर इस बार देने वालों की संख्या ज्यादा होती है। मामला अब यह होता है कि नाम के आगे इंजीनियर तो लग गया पर वेतन चपरासी से भी कम मिलती है।

पता है क्यों? क्योंकि वह जिस दौड़ में वर्षों से दौड़ रहा था, असल में तो वह दौड़ उसके मकसद की थी ही नहीं। वह कैसे एक अच्छा इंजीनियर बन जाता जब उसे मजा तो फोटोग्राफी / स्केच / डिज़ाइनिंग गेम्स/ पॉलिटिक्स आदि मे आता था। ये सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था मानो वह मरीज ईश्क का था और उसे दवाइयाँ कैंसर की खिलाई जा रही थी।

एस्पाईरिंग माइंड नेशनल एम्प्लॉयबिलिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के लगभग 650 कॉलेज के तकरीबन 1,50000 इंजीनियरिंग स्टूडेंस जो कि 2015 मे ग्रैजुएट हुए हैं, उनमें से 80% बेरोज़गार हैं। और इंजीनियरों के इस बिगड़े हुए हालात का सच यही है कि हर अभिभावक को अपने बच्चों में सिर्फ इंजीनियर या डॉक्टर ही दिखता है।

आज हमारे समाज का आलम यह है कि हर अभिभावक को अपने बेटी का हमराही भी इंजीनियर/डॉक्टर ही चाहिए। मेरे पड़ोस के सिंह साहब अपनी बेटी की शादी के लिए 30 लाख दहेज दे रहे हैं। जब मैंने उनसे इतनी बड़ी रकम दहेज में देने की वजह जानने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि “लड़का डॉक्टर है मेरी बेटी खुश रहेगी”। अब या तो मुझे कोई ये बताए कि किस किताब में लिखा है कि बेटी का विवाह इंजीनियर, डॉक्टर के साथ कराने पर वह 100% गारंटी के साथ खुश रहेगी, या कोई सिंह साहब को यह समझाए कि डॉक्टर/इंजीनियर होने से पहले ज़रूरी है कि वह एक अच्छा इंसान हो। जिसे बेटियों का सम्मान करना आता हो। आज हमारा समाज इतना विकसित हो चुका है कि हमने दूल्हों का भी रेट लिस्ट निर्धारित कर डाला है।

पहले तो हम रेट के अनुसार दूल्हा खरीदते हैं, फिर हम उस खरीदी हुई चीज़ से यह उम्मीद करते हैं कि वह मेरी बेटी को खुश रखेगा।
जिस तरह एक हाथ की पाँचों उंगलियाँ समान नहीं होती हैं, ठीक उसी तरह हमारे समाज का हर बच्चा, समान बौद्धिक शक्ति का नही होता है। हर बच्चे में अलग हुनर होता है जो कि उसे एक नई पहचान प्रदान करता है। बचपन में बच्चों में इतनी समझ नहीं होती है कि वो अपने लिए सही राह का चुनाव कर सकें, ऐसे में अभिभावकों का ही दायित्व होता है कि वो जानने की कोशिश करें कि उनके बच्चे की कुशलता किस क्षेत्र में है।

उसकी काबिलियत को समझने की कोशिश करें और उसे उसकी मंजिल की तरफ कदम बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करें। याद रखिए पैसे से या दबाव डालकर आप अपने बच्चे के नाम के आगे डॉक्टर /इंजीनियर तो लगवा सकते हैं, पर आप कभी उसे कुशल डॉक्टर /इंजीनियर नहीं बना सकते हैं। इसमें कोई शक नही है कि आपका बच्चा आपकी खुशी की खातिर इस दौड़ मे दौड़ेगा तो जरूर पर सच यही है कि उसकी यह दौड़ कभी मुकम्मल नही होगी। सारी उम्र वह सिर्फ दौड़ता ही रहेगा।

मुझे नहीं लगता कि आपको कोई खास असहजता होनी चाहिए यह बात मानने में कि “हर बच्चा बिल्कुल हीरे जैसा होता है, बेशकीमती!”, उन सब की अपनी चमक, अपनी अलग पहचान होती है। ऐसे में मुझे समझ नहीं आता है कि उनके हुनर की चमक को तराशने के बजाए, हम उस पर कालिख की लेप चढ़ाने मे क्यों व्यस्त हैं?

क्यों करते हैं आप अपने बच्चों की तुलना किसी और के बच्चों से? कभी ज़रा गौर करके देखिएगा तो आपको यह बात जरूर नजर आएगी कि जो सिंह साहब, दूबे जी, तिवारी जी, चौधरी जी, मिश्रा जी, किसी का भी बच्चा नहीं कर सकता है वो आप का बच्चा कर सकता है। बस आपको अपने नौनिहाल के उस काबिलियत को तलाशने और तराशने की ज़रूरत है।

कितनी अजीब बात है ना कि जिंदगी तो सब जीते हैं, कुछ शेर की तरह दहाड़ के जीते हैं तो कुछ गीदड़ की तरह दुबक कर जीते हैं। कुछ घुट-घुट कर जीते हैं तो कुछ मज़े में जीते हैं। कुछ अपना काम इसलिए करते है क्योंकि उन्हें मजा आता है, तो कुछ इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें करना ही है। जनाब आपका बच्चा भी एक दिन बुलंदियों पर होगा, बस एक बार उसे वह करने दीजिये जिसके लिए उसका जुनून है। देखिए तो कितना बड़ा है यह नीला आसमां, बस एक बार तो उसे पंख फैलाकर उड़ने दीजिये। उसे किसी सांचे मे ढालने से पहले ज़रा कल-कल कर के बह तो लेने दीजिये। उसे इंजीनियर या डॉक्टर बनाने के पहले उसे एक अच्छा इंसान बनाने की कोशिश तो कीजिये।

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